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साबूदाने का रहस्य

 दोस्तों आप सब साबूदाना से तो अवश्य परिचित होंगे। भारत में 40 के दशक से व्रत त्योहार उपवास में फलाहारी एवं पवित्र खाद्य पदार्थ के रूप में इसका उपयोग खूब होता रहा है। इसे सुपाच्य समझकर रोगियों के  पथ्याहार में शामिल किया जाता रहा है। परंतु क्या आपने कभी साबूदाने का पेड़ अथवा पौधा देखा है? या फिर इसे जमीन में रोपकर उगाने की कोशिश की है? आप ने भले ही कोशिश ना की हो पर मैंने जरूर की है। मगर मैं असफल रहा। समय के साथ यह 4जिज्ञासा परवान चढ़ती रही और अंततः मैं साबूदाना के रहस्य से परिचित हो गया। क्या आप सब दर्शक भी जानना चाहेंगे?

साबूदाना मुख्यता दो तरीके से फैक्ट्रियों में तैयार किया जाता है। यह किसी पेड़ का फल अथवा बीज नहीं है। सबसे पहले Sago Palm trees के तने से प्राप्त गूदे से बनाया जाता था। मूल रूप से अफ्रीकी उत्पत्ति वाले इस पौधे का तना बहुत मोटा होता है और इस मोटे तने के भीतर से गूदा निकालकर पीसा जाता है और पाउडर बनाया जाता है। इस पाउडर को फिल्टर कर गर्म करते हैं जिससे दाने बनते हैं। साबूदाना बनाने का सबसे मुख्य तरीका जो आज प्रचलित है सर्वथा अलग है। दक्षिण अमेरिकी मूल के कंद कसावा जिसकी खेती अफ्रीका महाद्वीप में सबसे अधिक की जाती है से सबसे अधिक साबूदाना बनाया जाता है। कसावा को टेपियोका रूट भी कहा जाता है भारत में भी कसावा से ही साबूदाना बनाया जाता है। दक्षिण भारत के तमिल नाडु इत्यादि राज्यों में साबूदाने का उत्पादन होता है। सालेम जिले में कसावा की खेती सबसे ज्यादा होती है और वही सबसे अधिक टेपियोका स्टार्च प्रोसेसिंग प्लांट हैं। इस प्रक्रिया में 4 से 6 महीने लगते हैं। इस दौरान साफ किए गए और पील किए हुए कंदों को मैश कर पानी में सड़ने या फर्मेंटेशन के लिए छोड़ दिया जाता है। बाद में जो लुगदी प्राप्त होती है उससे फाइबर को अलग कर जेली जैसी संरचना वाली स्टार्च एनरिच पदार्थ प्राप्त करते हैं। इसे मशीनों में डालकर दाना बनाया जाता है और सुखा कर ग्लूकोस एवं स्टार्च पाउडर की पॉलिश की जाती है जिससे मोतियों जैसे चमचमाते साबूदाने प्राप्त होते हैं। भारत में 40 के दशक में साबूदाना बनाने का उद्यम कुटीर उद्योग के रूप में शुरू हुआ था। किंतु आश्चर्य की बात है की शेष भारत में ज्यादातर लोग इससे अनभिज्ञ रहे।

यह सब जानने के बाद मेरे दिमाग में एक ही बात बार-बार आती है कि कसावा कंद को सड़ाकर आर्टिफिशियल तरीके से बनाया गया साबूदाना किस प्रकार पवित्र हुआ और उपवास के दौरान फलाहारी भोजन के योग्य माना गया? यदि किसी सुधि पाठक अथवा दर्शक इसका तर्कसंगत उत्तर ढूंढ कर कमेंट कर सकें तो बहुत आभार होगा।

पहले तो साबूदाने की खिचड़ी और खीर बनाई जाती थी किंतु अब इसकी बहुत सारी रेसिपी तैयार की जाती है और लोग मजे से उन्हें खाते हैं। साबूदाने का उपयोग ना केवल उपवास-फलाहार और रोगियों के पथ्याहार मैं बल्कि बहुत सारे फेवरेट रेसिपीज मैं भी किया जा रहा है। पापड़, तिलौड़ी, चाट- पकोड़े और विभिन्न प्रकार के व्यंजन में इसका उपयोग किया जा रहा है। लोग साबूदाने को पवित्र और धार्मिक उपयोग के योग्य मानते हैं। वे नहीं जानते की यह कितने गंदे प्रोसेस से तैयार होता है। यहां हम साबूदाने की पापड़ रेसिपी दे रहे हैं इसका उपयोग आप अगले उपवास के दौरान कर सकते हैं।

विधि

2 लीटर पानी में 100 ग्राम साबूदाना डालकर गर्म करते हैं। इसे तब तक पकाते हैं जब तक थी साबूदाना पूरी तरह से गल कर पानी को जेली जैसी ना बना दे। तब इसे चूल्हे से उतार लेते हैं गैस बंद कर देते हैं और छत पर साफ सूती कपड़ा बिछाकर कलछी से वह द्रव्य लेकर कपड़े के ऊपर छोटे-छोटे गोल धब्बे के रूप में फैलाते हैं और सूखने के लिए छोड़ देते। ऐसा करने से पहले मिश्रण में स्वादानुसार सेंधा नमक और थोड़ी मात्रा में गोल मिर्च पाउडर मिलाते हैं इससे नमकीन और चड़पड़ा स्वाद आता है। उपवास के दौरान कुछ लोग सेंधा नमक का प्रयोग शुद्ध मानते हैं और साधारण नमक का उपयोग अशुद्ध। कई दिनों तक सुखाने के बाद पापड़ तैयार हो जाता है जिसे सावधानीपूर्वक कपड़े से अलग कर लेते हैं और साफ सूखे डब्बे में स्टोर कर लेते हैं। जब भी खाने का मन हो इसे खाद्य तेल गरम कर तल लीजिये और मजे से खाइए। यह पापड़ बनाते समय शुरू में ही सावधानी बरतने की जरूरत होती है । जब साबूदाना पक रहा हो तब ध्यान रखें की इसका टेक्सचर बहुत अधिक गाढ़ा ना हो और ना बहुत ज्यादा ढीला। यदि तिलौड़ी बनानी है तो पानी कुछ कम डालें और मिश्रण को गाढ़ा होने दे तथा कुछ दाने ऐसे हो जो पूरी तरह गले ना हो। इस मिश्रण में स्वादानुसार सेंधा नमक और तिल मिला लें। तिल को पहले हल्का भून लें। जब मिश्रण ठंडा होकर हाथ सहने योग्य हो जाए तब छोटी-छोटी बड़ियों जैसे पिंड साफ कपड़े पर डालते चले जाएं और कई दिनों तक धूप में सुखाएं। जब यह तिलौड़ियाँ खूब सुख जाए तब कपड़े पर से इन्हें अलग कर ले और साफ-सूखे डिब्बे या मर्तबान में स्टोर कर ले। जब भी खाने का मन हो तो कढ़ाई में करू तेल गर्म करें,तिलौड़ियाँ डालें, ब्राउन होने तक तले और खाने का मजा ले।

कोरोना काल: एक मूल्यांकन


🎯चाइना के वू हान क्षेत्र में वर्ष 2019 के उत्तरार्ध से ही सामान्य फ्लू से भिन्न श्वास संस्थान,शरीर के ताप नियन्त्रण एवम् समन्वय प्रणाली पर तीव्र प्रभाव डालने वाली संक्रामक बीमारी का प्रसार होने लगा था।बड़ी संख्या में मौतें भी होने लगी।पता चला कि यह रोग किसी नये प्रकार के वायरस के कारण उत्पन्न हो रहा है।WHO और चीनी लैब्स के प्रयास से पता चला कि यह नया वायरस एन्फ्लुएंज़ा उत्पन्न करने वाले लगभग 250 से 300 प्रकार के वायरसों के समूह में से ही निकल कर किस न किसी कारण से म्यूटेंट होकर कहर ढा रहा है।चूँकि इसका प्रकोप 2019में हुआ था तो WHO ने नाम दिया COVID-19! इसे वैज्ञानिक शब्दावली में सार्स-कोव 2 या नोवल कोरोना वायरस भी कहते हैं।

                  ✍✍    दर असल कोरोना शब्द लातीनी भाषा का है जिसका अर्थ मुकुट होता है।इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोप से देखने पर इसके इर्द-गिर्द उभरे हुए काँटो जैसे ढाँचे मुकुट का आभास कराते हैं।120 नैनो मीटर व्यास वाले इस वायरस की रासायनिक बनावट RNA,प्रोटीन और लिपिड के तानेबाने में गुथी है।उपरी परत लिपिड यानि वसा से बनी होती है।अन्य भाग प्रोटीन से तथा भीतरी भाग में जेनेटिक मटेरियल RNA से बना है।RNA आधारित वायरस में रूप बदलने की अद्भुत क्षमता होती है।अर्थात् यह सतत म्यूटेशन(उत्परिवर्तन) सक्षम वायरस है।इसीलिये कोरोना वायरसजन्य बीमारी के विरुद्ध  स्थायी समाधान पाना यानि सफल वैक्सीन बनाना सम्भव नहीं है।गरम पानी और साबुन से 1 मिनट तक अच्छी तरह रगड़ कर हाथ धोने की सलाह ड़ी जाती है क्यौंकि साबुन लिपिड अणु से बने वायरस के सुरक्षा परत को तोड़कर इसे नष्ट करने में सक्षम है।

                    🌎✍       2019 के अन्त तक कोरोना काफी हद तक चीन के वूहान प्रांत तक ही सीमित था।परन्तु तब न तो WHO और न चीन को खयाल आया कि संक्रमण क्षेत्र से बाहर आना और भीतर जाना रोक दिया जाय ताकि ग्लोबल स्प्रेड से बचाव सम्भव हो सके।

परिणाम: दिसंबर 2019से जनवरी 2020 तक पहले इटली व ईरान फिर योरोपीय देशों सहित USA ने फैलने लगा।इसी क्रम में भारत-USA जॉइंटवेंचर 'नमस्ते ट्रम्प' इवेंट 24-25 फ़रवरी 2020 आयोजित हुआ।सरदार पटेल स्टेडियम अहमदाबाद गुजरात में सम्पन्न 2 दिवसीय कार्यक्रम में 1 लाख से अधिक लोगों ने भाग लिया।भारत में कम्युनिटी स्प्रेड तो यही से शुरु हो गया।समय रहते रोकथाम के लिए जरूरी उपाय नही किये गये।और जब भारत में कोरोना फैला तो सारी दुनिया की तरह काफी तेजी से फैला।देश की राजधानी दिल्ली में जब हडकंप मचा तो इस विकराल आपदा के समय भी गंदी राजनीति का खेल खेला गया और 1-21मार्च 2020 के बीच निजामुद्दीन औलिया की मजार पर आयोजित हो रही तब्लीग जमात के सालाना अन्तर्राष्ट्रिय कॉन्फ़्रेस पर प्रशासनिक नाकामियों का ठीकरा फोड़ दिया।पूरी समस्या का दोष एक समुदाय विशेष पर थोप कर मीडिया ट्रायल में खलनायक,देशद्रोही और ना जाने क्या क्या साबित कर दिया।

               🙏'नमस्ते ट्रम्प' के ठीक एक माह बाद 24 मार्च 2020 को भारत सरकार ने 21 दिनॉ का प्रथम लॉक डाउन घोषित कर दिया।इसके पहले प्रधानमंत्री के आह्वान पर 22 मार्च को जनता कर्फ़्यू सेलेब्रेट किया गया।इसी दिन शाम को 5 बजे कोरोना के खिलाफ 'महान एतेहासिक' युद्धघोष किय गया 5 मिनट तक पुरे देश में घर-घर ताली-थाली,घंटा-घंटी बजाकर।प्रधानमंत्री ने कहा था कि कोरोना योद्धाओं के सम्मान में घरों की छत, बालकनी,बरामदे,विण्डो पर खड़े होकर ठीक 5 pm पर 5 मिनट के लिए ताली,थाली,घंटी,ड्रम आदि बजाये।यहां तक तो ठीक था पर पर कुछ तथाकथित वैज्ञानिकों ने ध्वनि के अनुनाद,मन्त्र चिकित्सा,विषाणुओं पर इनके प्रभाव इत्यादि को लेकर इस आयोजन के समर्थन में जबर्दस्त वैज्ञानिक एंगल खोज निकाला।इनमे प्रमुख थे IIT व BHU में काम करने वाले प्रो0 बी0एन0 द्विवेदी (भौतिकी) और इलाहाबाद केन्द्रीय विश्वविद्यालय के प्रो0 के0 एन0 उत्तम(भौतिकी)।इनके अनुसार घंटा-घंटी बजाने से वातावरण में कम्पन उत्पन्न होता है जो काफी दूर तक जाता है।इस कम्पन का फायदा यह है कि इसके क्षेत्र में आने वाले सभी जीवाणु,विषाणु और सूक्ष्म जीव आदि नष्ट हो जाते हैं,जिससे आसपास का वातावरण शुद्ध हो जाता है।मेरा तो विचार है कि भारत सरकार के विज्ञान एवम् प्रोद्योगिकी विभाग को इस 'मौलिक अनुसंधान ' के लिए इन वैज्ञानिकों को सम्मानित करते हुए नोबल पुरस्कार के लिए नामित करना चाहिए।कुछ लोगों का कहना है कि PM मोदी जी भी 'अविष्कार' करते रहे हैं।उदहारण के लिए गंदे नाले/गटर की गैस का ईंधन के रूप में इस्तेमाल कर चाय बनाने का मॉड्यूल।

                                     ⚓  लॉकडाउन 1 जो 25मार्च से 14 अप्रैल तक चला आपातकल के साथ कर्फ्यू का भी एहसास आम जनता को करा गया।इसी दरम्यान 5 अप्रैल को फिर PM  को कुछ करने का मन हुआ।'मन की बात' तो वे वैसे भी करते रहते हैं।टेलीविज़न पर प्रकट हुए और जनता से उनके 9 मिनट 9 बजे रात से माँग लिए। पूरे देश में 9 मिनट के लिए बिजली गुल कर के टॉर्च,मोमबत्तियाँ,चिराग,दीपक,मोबाईल से बालकनी,छत,घरों के दरवाज़े,खिड़कियो पर खड़े होकर रोशनी फैलाने की कोशिश की गई ।चैत महीन में दीवाली मना ली गई,वो भी भयानक आपदा,दुख और संकट की घड़ी में! सीता-राम-लक्ष्मण के वनवास पूर्ण कर अयोध्या लौटने की खुशी में मनायी गयी दीवाली को लोग हर साल कार्तिक माह की अमावस्या को परम्परा के रूप में सेलिब्रेट करते रहे हैं।इस लिहाज़ से देखा जाए तो मोदी जी ने अपने इस कार्य से क्रांतिकारी संदेश दिया है।परम्पराओ के नाम पर फिजूलखर्ची  नहीं करनी चाहिए और दुख,निराशा,भय के माहौल में नवीन साहस व उत्साह के सृजन हेतु 9 मिनट वाली दीवाली मनानी चाहिए । मगर अफसोस कि देश समझदार नही निकला।फिजुल्खर्ची बदस्तूर जारी है।फिर मोदी जी ने सोचा- ना रहेगा बांस,न  बजेगी बाँसुरी ।लॉकडाउन 1 से 4 तक 68 दिन और अन्लॉक 1 से 4 अबतक 102 दिन यानि कुल 170 दिन(6 महीने में 10 दिन कम ) ज्यादातर लोगों की कमाई शिफ्फर और जिन्दा रहने को खर्च पूरा होने के कारण जेबेँ खाली हो गई।लो अब कर लो फिजुल्खर्ची!!अगस्त माह में GDP पहली बार निगेटिव हुई।आज यह --23•9%तक गिर गई है।ये तो हालत की एक झलक मात्र है,ट्रेलर है।पिक्चर अभी बाकी है मेरे दोस्त।

E. Coli infection and its Homeopathic solutions

 ई. कोलाई (E. coli) संक्रमण के लक्षण अलग-अलग हो सकते हैं, यह इस बात पर निर्भर करता है कि किस प्रकार का ई. कोलाई बैक्टीरिया संक्रमण कर रहा है...