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घर पर बीयर बनाने का इजी तरीका

 घर पर बीयर बनाना एक मजेदार और फायदेमंद शौक हो सकता है। आरंभ करने के लिए यहां एक बुनियादी मार्गदर्शिका दी गई है:



उपकरण और सामग्री:


एक शराब बनाने की किट (या एक बड़े बर्तन, किण्वन पोत, एयरलॉक, और कैप के साथ बोतलें / डिब्बे जैसे उपकरण के अलग-अलग टुकड़े)

माल्टेड जौ (या अन्य अनाज)

हॉप्स (स्वाद और कड़वाहट के लिए)

खमीर (शराब को शराब में किण्वित करने के लिए)

पानी


स्टेप्स :


  1. अपने सभी उपकरणों को साफ करें, जिसमें आपकी ब्रूइंग किट, किण्वन पात्र , बोतलें/डिब्बे और बीयर के संपर्क में आने वाले सभी बर्तन शामिल हैं। यह संदूषण को रोकने में मदद करेगा और यह सुनिश्चित करेगा कि आपकी बीयर पीने के लिए सुरक्षित है।


  1. एक बड़े बर्तन में लगभग 3 गैलन पानी गरम करें। जब यह लगभग 155-165°F (68-74°C) के तापमान तक पहुँच जाए, तो अपने कुचले हुए माल्टेड जौ (या अन्य अनाज) को पानी में डालें। इस प्रक्रिया को मैशिंग कहा जाता है और यह अनाज से चीनी निकालने में मदद करता है।


  1. लगभग एक घंटे के बाद, अनाज को बर्तन से हटा दें, तरल (जिसे अब वोर्ट कहा जाता है) को पीछे छोड़ दें। स्वाद और कड़वाहट के लिए वोर्ट में हॉप्स मिलाएं । हॉप्स की मात्रा और समय आपके द्वारा बनाई जा रही बीयर के प्रकार पर निर्भर करेगा।


  1. एक बार हॉप्स जुड़ जाने के बाद, लगभग एक घंटे के लिए वोर्ट को उबालें। यह इसे जीवाणुरहित करने और वांछित स्वाद बनाने में मदद करेगा।


  1. एक घंटा बीत जाने के बाद, बर्फ के स्नान या अन्य शीतलन विधि का उपयोग करके जितनी जल्दी हो सके वोर्ट( किण्वन से पहले ग्राउंड माल्ट या अन्य अनाज का मीठा आसव),को ठंडा करें। एक बार जब यह लगभग 70°F (21°C) के तापमान तक पहुँच जाता है, तो इसे एक कीटाणुरहित किण्वन बर्तन में स्थानांतरित करें।


  1. किण्वन पात्र  में खमीर मिलाएं और संदूषण को रोकने के दौरान गैसों को बाहर निकलने की अनुमति देने के लिए इसे एक एयरलॉक के साथ कवर करें। इसे लगभग एक हफ्ते तक या जब तक यीस्ट में बुलबुले बनना बंद न हो जाए, तब तक फरमेंट होने दें।


  1. एक बार जब बीयर का किण्वन समाप्त हो जाए, तो उसे स्वच्छ बोतलों या ढक्कन वाले डिब्बे में स्थानांतरित करें। बीयर को प्राकृतिक रूप से कार्बोनेट करने में मदद करने के लिए प्रत्येक बोतल/कैन में थोड़ी मात्रा में चीनी मिलाएं। बोतलों/डिब्बों को सील कर दें और उन्हें लगभग एक सप्ताह के लिए कमरे के तापमान पर रहने दें।


  1. एक हफ्ते के बाद, कार्बोनेशन प्रक्रिया को रोकने और आनंद लेने के लिए बियर को ठंडा करें!


ध्यान रखें कि बीयर बनाने की प्रक्रिया इस मूल गाइड की तुलना में अधिक जटिल हो सकती है, और कई विविधताएं और तकनीकें हैं जिनका उपयोग आप बियर के विभिन्न स्वादों और शैलियों को बनाने के लिए कर सकते हैं। कुछ अतिरिक्त शोध करना एक अच्छा विचार है और संभवतः अपना पहला बैच शुरू करने से पहले अनुभवी होमब्रेवर से सलाह लें।

हॉप्स क्या है ?


साधारण हॉप (common hops) '​कैनाबेसीए' (Cannabaceae) जीववैज्ञानिक कुल के (ह्युमुलस) वंश की एक जाति है। इसके मादा और नर पौधे अलग होते हैं और मादा पौधे के शंकुनुमा फूलों का प्रयोग बियर बनाने में किया जाता है, जिसे वह स्वाद और ख़ुशबू प्रदान करते हैं, हालांकि इनसे कुछ कड़वाहट भी आ जाती है। इन फूलों का सार कीटाणु-नाशक भी होता है और उस से पेयों को संरक्षित भी किया जाता है। यह विश्व के समशीतोष्ण इलाक़ों में लता के रूप में उगता है और भारत में यह हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में उगाया जाता है। बियर बनाने के लिए मादा पौधों को नर पौधों से दूर रखा जाता है क्योंकि बीज बनने से मादा फूलों का स्वाद बदल जाता है। पारंपरिक रूप से इस पौधा का प्रयोग औषधियों में भी किया जाता है

एक यूएस गैलन 3.785411784 लीटर के बराबर है।

आर्जीमोन मेक्सिकाना यानि भटकटैया : एक परिचय

 भटकटैया, सत्यानाशी,कन्टैया या मैक्सिकन प्रिक्ली पॉप्पी यह सारे नाम आर्जीमोन मैक्सिकना नामक पौधे के हैं।


 इसके बीज काली सरसों या राई के समान दिखते हैं और विषैले होते हैं। कटीले पत्तों और फलों वाले इस हर्ब का मूल स्थान यद्यपि मेक्सिको है किंतु संसार के विभिन्न भागों सहित भारत में भी हर जगह पाया जाता है। फलों,तने या पत्तों को तोड़ने अथवा काटने पर पारदर्शी पीले दूध जैसा निकलता है इसी कारण आयुर्वेद में इसे स्वर्णक्षीरी कहां गया है।

भावप्रकाश निघंटू नामक आयुर्वेदिक ग्रंथ के अनुसार यह पीला रस घाव, दाद ,कुष्ठ इत्यादि की चिकित्सा में अत्यंत उपयोगी है। विषाणु और कीटाणुओं का नाश करता है। न ठीक होने वाले घाव के इलाज में यह रामबाण औषधि है। मुनाफाखोर,लालची व्यापारी भटकटैया के बीजों का दुरुपयोग करते हैं। वे सरसों के साथ मिलाकर तेल निकालते हैं और मिलावटी सरसों का तेल शुद्ध तेल के नाम पर बेच लेते हैं। या मिलावटी तेल मौत का कारण भी बन सकता है। इससे एपिडेमिक ड्रॉप्सी यानी पेट की झिल्ली में पानी भरने का रोग उत्पन्न हो जाता है।

              चूँकि आर्जीमोन मैक्सिकना के बीज विषैले होते हैं इनसे निकलने वाला तेल मृत्यु अथवा गंभीर रोग का कारण बन सकता है इसलिए इसके अल्प मात्रा में सेवन के परिणाम स्वरूप उत्पन्न होने वाले लक्षणों का संग्रह कर एक होम्योपैथिक दवा के रूप में इसकी प्रूविंग की जा सकती है। इस प्रकार होम्योपैथिक चिकित्सा पद्धति में एक और भारतीय औषधि का समावेश हो सकेगा जो मानवता के कल्याण की दिशा में एक और कदम साबित होगा। इसके अतिरिक्त इसके रस यानी स्वर्णक्षीर के गुणों का अध्ययन आधुनिक वैज्ञानिक विधियों द्वारा किया जाना भी आवश्यक है। प्राचीन आयुर्वेदिक ग्रंथों में दिए गए विवरण के ऊपर मैं प्रश्नचिन्ह नहीं लगा रहा परंतु मेरा मानना है कि किसी चीज पर आंख मूंदकर विश्वास करना अंधविश्वास है। पुरातन को अद्यतन बनाना वास्तव में विज्ञान का एक कर्तव्य है।

   आर्जीमोन मैक्सिकना के साथ एक मिथक भी जुड़ा हुआ है। पुराने जमाने में रसायन वैज्ञानिक जिन्हें कीमियागर या अल्केमिस्ट कहा जाता था अपने अनुसंधान और ज्ञान को काफी गुप्त रखते थे। उनके मुख्यता तीन परम लक्ष्य थे : -  (1) ब्रह्मांड के साथ मनुष्य के संबंधों की खोज और मानवता के हित में इसका लाभ उठाना। (2) अमृत की खोज और (3) सीसा या तांबा जैसे कम मूल्य वाले धातुओं को सोना में परिवर्तित करने का उपाय ढूंढना।

                     भारत में भी कीमियागरों के देसी वर्जन पाए जाते थे जिन्हें रसज्ञ, रस-सिद्ध अथवा रसायनज्ञ कहा जाता था इनमें नागार्जुन का नाम उल्लेखनीय है। कहा जाता है कि उन्होंने सोना बनाने की विधि खोज ली थी जिसमें स्वर्णक्षीरी के उपयोग के विषय में कई स्थानों पर उल्लेख किया गया है। परंतु किसी भी ग्रंथ में सोना बनाने की संपूर्ण विधि लिखी हुई नहीं मिलती है,  केवल संकेत कथाएं और उल्लेख मिलते हैं। मध्यकाल के यूरोप और पश्चिम एशिया के कीमियागर अपने ज्ञान को अत्यंत गुप्त संकेतो में नोट करते थे किंतु आज की तारीख में उन्हें समझने वाला कोई नहीं है। इन संकेतों की कोई सार्वभौमिक भाषा भी नहीं है जिसकी सहायता से इन्हें डिकोड किया जा सके।इन सब तथ्यों की सहायता से हम अंततःइस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि सत्यानाशी का न केवल औषधीय महत्व था बल्कि रासायनिक प्रक्रियाओं में भी उपयोगी था।


साबूदाने का रहस्य

 दोस्तों आप सब साबूदाना से तो अवश्य परिचित होंगे। भारत में 40 के दशक से व्रत त्योहार उपवास में फलाहारी एवं पवित्र खाद्य पदार्थ के रूप में इसका उपयोग खूब होता रहा है। इसे सुपाच्य समझकर रोगियों के  पथ्याहार में शामिल किया जाता रहा है। परंतु क्या आपने कभी साबूदाने का पेड़ अथवा पौधा देखा है? या फिर इसे जमीन में रोपकर उगाने की कोशिश की है? आप ने भले ही कोशिश ना की हो पर मैंने जरूर की है। मगर मैं असफल रहा। समय के साथ यह 4जिज्ञासा परवान चढ़ती रही और अंततः मैं साबूदाना के रहस्य से परिचित हो गया। क्या आप सब दर्शक भी जानना चाहेंगे?

साबूदाना मुख्यता दो तरीके से फैक्ट्रियों में तैयार किया जाता है। यह किसी पेड़ का फल अथवा बीज नहीं है। सबसे पहले Sago Palm trees के तने से प्राप्त गूदे से बनाया जाता था। मूल रूप से अफ्रीकी उत्पत्ति वाले इस पौधे का तना बहुत मोटा होता है और इस मोटे तने के भीतर से गूदा निकालकर पीसा जाता है और पाउडर बनाया जाता है। इस पाउडर को फिल्टर कर गर्म करते हैं जिससे दाने बनते हैं। साबूदाना बनाने का सबसे मुख्य तरीका जो आज प्रचलित है सर्वथा अलग है। दक्षिण अमेरिकी मूल के कंद कसावा जिसकी खेती अफ्रीका महाद्वीप में सबसे अधिक की जाती है से सबसे अधिक साबूदाना बनाया जाता है। कसावा को टेपियोका रूट भी कहा जाता है भारत में भी कसावा से ही साबूदाना बनाया जाता है। दक्षिण भारत के तमिल नाडु इत्यादि राज्यों में साबूदाने का उत्पादन होता है। सालेम जिले में कसावा की खेती सबसे ज्यादा होती है और वही सबसे अधिक टेपियोका स्टार्च प्रोसेसिंग प्लांट हैं। इस प्रक्रिया में 4 से 6 महीने लगते हैं। इस दौरान साफ किए गए और पील किए हुए कंदों को मैश कर पानी में सड़ने या फर्मेंटेशन के लिए छोड़ दिया जाता है। बाद में जो लुगदी प्राप्त होती है उससे फाइबर को अलग कर जेली जैसी संरचना वाली स्टार्च एनरिच पदार्थ प्राप्त करते हैं। इसे मशीनों में डालकर दाना बनाया जाता है और सुखा कर ग्लूकोस एवं स्टार्च पाउडर की पॉलिश की जाती है जिससे मोतियों जैसे चमचमाते साबूदाने प्राप्त होते हैं। भारत में 40 के दशक में साबूदाना बनाने का उद्यम कुटीर उद्योग के रूप में शुरू हुआ था। किंतु आश्चर्य की बात है की शेष भारत में ज्यादातर लोग इससे अनभिज्ञ रहे।

यह सब जानने के बाद मेरे दिमाग में एक ही बात बार-बार आती है कि कसावा कंद को सड़ाकर आर्टिफिशियल तरीके से बनाया गया साबूदाना किस प्रकार पवित्र हुआ और उपवास के दौरान फलाहारी भोजन के योग्य माना गया? यदि किसी सुधि पाठक अथवा दर्शक इसका तर्कसंगत उत्तर ढूंढ कर कमेंट कर सकें तो बहुत आभार होगा।

पहले तो साबूदाने की खिचड़ी और खीर बनाई जाती थी किंतु अब इसकी बहुत सारी रेसिपी तैयार की जाती है और लोग मजे से उन्हें खाते हैं। साबूदाने का उपयोग ना केवल उपवास-फलाहार और रोगियों के पथ्याहार मैं बल्कि बहुत सारे फेवरेट रेसिपीज मैं भी किया जा रहा है। पापड़, तिलौड़ी, चाट- पकोड़े और विभिन्न प्रकार के व्यंजन में इसका उपयोग किया जा रहा है। लोग साबूदाने को पवित्र और धार्मिक उपयोग के योग्य मानते हैं। वे नहीं जानते की यह कितने गंदे प्रोसेस से तैयार होता है। यहां हम साबूदाने की पापड़ रेसिपी दे रहे हैं इसका उपयोग आप अगले उपवास के दौरान कर सकते हैं।

विधि

2 लीटर पानी में 100 ग्राम साबूदाना डालकर गर्म करते हैं। इसे तब तक पकाते हैं जब तक थी साबूदाना पूरी तरह से गल कर पानी को जेली जैसी ना बना दे। तब इसे चूल्हे से उतार लेते हैं गैस बंद कर देते हैं और छत पर साफ सूती कपड़ा बिछाकर कलछी से वह द्रव्य लेकर कपड़े के ऊपर छोटे-छोटे गोल धब्बे के रूप में फैलाते हैं और सूखने के लिए छोड़ देते। ऐसा करने से पहले मिश्रण में स्वादानुसार सेंधा नमक और थोड़ी मात्रा में गोल मिर्च पाउडर मिलाते हैं इससे नमकीन और चड़पड़ा स्वाद आता है। उपवास के दौरान कुछ लोग सेंधा नमक का प्रयोग शुद्ध मानते हैं और साधारण नमक का उपयोग अशुद्ध। कई दिनों तक सुखाने के बाद पापड़ तैयार हो जाता है जिसे सावधानीपूर्वक कपड़े से अलग कर लेते हैं और साफ सूखे डब्बे में स्टोर कर लेते हैं। जब भी खाने का मन हो इसे खाद्य तेल गरम कर तल लीजिये और मजे से खाइए। यह पापड़ बनाते समय शुरू में ही सावधानी बरतने की जरूरत होती है । जब साबूदाना पक रहा हो तब ध्यान रखें की इसका टेक्सचर बहुत अधिक गाढ़ा ना हो और ना बहुत ज्यादा ढीला। यदि तिलौड़ी बनानी है तो पानी कुछ कम डालें और मिश्रण को गाढ़ा होने दे तथा कुछ दाने ऐसे हो जो पूरी तरह गले ना हो। इस मिश्रण में स्वादानुसार सेंधा नमक और तिल मिला लें। तिल को पहले हल्का भून लें। जब मिश्रण ठंडा होकर हाथ सहने योग्य हो जाए तब छोटी-छोटी बड़ियों जैसे पिंड साफ कपड़े पर डालते चले जाएं और कई दिनों तक धूप में सुखाएं। जब यह तिलौड़ियाँ खूब सुख जाए तब कपड़े पर से इन्हें अलग कर ले और साफ-सूखे डिब्बे या मर्तबान में स्टोर कर ले। जब भी खाने का मन हो तो कढ़ाई में करू तेल गर्म करें,तिलौड़ियाँ डालें, ब्राउन होने तक तले और खाने का मजा ले।

मिश्रीकंद की खेती


 


हिंदी भाषी क्षेत्रों में universally मिश्रीकंद और बिहार में केसवर/ केसऊर के नाम से प्रसिद्ध यह कंद मीठा, स्वादिष्ट और स्वास्थ्यवर्धक गुणों से भरपूर होता है। इसमें लो कैलोरी,फाइबर,मिनरल्स और एंटीऑक्सीडेंट प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं। अंग्रेजी भाषा में इसे मैक्सिकन याम बिन(Maxican yam been) कहां जाता है। जीव विज्ञान की भाषा में इसका नाम पैकीराईजस इरोसस (Pachyrhizus erosus) रखा गया है। 17 वी शताब्दी के पहले तक इसका नामोनिशान तक भारत में नहीं था। 'गजरा-केसऊर' वाले सरस्वती माता के भक्तों के लिए यह हार्ट ब्रेकिंग न्यूज़ है कि मिश्रीकंद भारत की मौलिक पैदाइश नहीं है। लगभग 3000 वर्षों से भी पहले से मेक्सिको और लैटिन अमेरिकी देशों में इसका उपयोग खाद्य पदार्थ के रूप में किए जाने के पुरातात्विक प्रमाण उपलब्ध है। 17 वी शताब्दी में कुछ स्पेनिश नाविको और व्यापारियों ने मिश्रीकंद के बीज फिलीपींस में लाकर लगाए और वहीं से धीरे-धीरे लगभग पूरे एशिया में फैल गया। इस प्रकार प्रायः 18 वीं सदी से मिश्रीकंद भारत में प्रचलित हुआ। और तब से पंडे पुजारियों ने सरस्वती माता की पूजा में इसे अनिवार्य प्रसाद अवयव के रूप में शामिल कर लिया। वर्तमान परिदृश्य में इसका व्यापारिक महत्व बढ़ गया है। कभी कौड़ियों के मोल बिकने वाला यह कंद आज बाजार में अच्छी कीमत पर बिकता है। यद्यपि खेती को प्रायः घाटे का सौदा कहा जाता है परंतु फायदे वाली कुछ गिनी चुनी फसलों में से मिश्रीकंद भी अपना महत्वपूर्ण स्थान रखती है। इस आलेख में इसकी खेती के सभी पहलुओं पर प्रकाश डाला जाएगा।

रोपने का उचित समय : 1 जुलाई से 15 सितंबर।

उपयुक्त भूमि : उपजाऊ दोमट एवं बलुई दोमट मिट्टी वाली भूमि मिश्रीकंद की खेती के लिए उपयुक्त मानी जाती है। ध्यान रहे जिस जमीन का चुनाव इसकी खेती के लिए कर रहे हैं उसमें जलजमाव की संभावना ना हो।

उन्नत प्रभेद : राजेंद्र मिश्रीकंद-1 और 2, इनके अतिरिक्त विभिन्न प्रचलित स्थानीय किस्में।

खेत की तैयारी : 200 क्विंटल प्रति हेक्टेयर की दर से कंपोस्ट डालकर गहरी जुताई करें। यह जुताई रोटावेटर से ना करें। 1 सप्ताह बाद दूसरी जोताई करें और पाटा मारकर समतल कर ले। यदि खरपतवार ना हो और मिट्टी हल्की एवं भुरभुरी हो जाए तो दो ही जुताई  काफी है अन्यथा तीसरी जुताई की भी जरूरत पड़ सकती है। अनुशंसित मात्रा में रासायनिक उर्वरक डालकर ही अंतिम जुताई करें।

बीज की मात्रा : जुलाई महीने की बुवाई में 15 से 20 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर की दर से लगाएं। अगस्त महीने में बोना है तो बीज की मात्रा बढ कर 30 से 40 किलोग्राम हो जाती है। वही सितंबर माह में रोपने के लिए 50 से 60 किलोग्राम बीज लगता है। यहां स्पष्ट करना जरूरी है कि अगात खेती में बीज कम लगने का मुख्य कारण फसल की समय अवधि अधिक होना है जिससे पौधों के विकास फैलाव और कल्ले निकलने के लिए पर्याप्त समय मिल जाता है। अगस्त सितंबर में बोने से समय कम मिलता है और कल्ले निकलने का पर्याप्त अवसर नहीं मिलता। इसी कमी की पूर्ति के लिए बीज की मात्रा बढ़ाई जाती है।

खाद एवं उर्वरक : यहां सभी मात्राएं एक हेक्टेयर खेती के लिए बताई जा रही हैं। कंपोस्ट 200 क्विंटल, सिंगल सुपर फास्फेट 2.5 क्विंटल, यूरिया 1.75 क्विंटल और म्यूरेट ऑफ पोटाश (एम ओ पी) 1.35 क्विंटल। इसमें से आधी मात्रा यूरिया की बुवाई के समय देनी है और आधी 40 से 50 दिन बाद।

रोपन योजना (Plantation plan) : एकल फसल के रूप में मिश्रीकंद को निम्न प्रकार से रोपा जाता है - जुलाई महीने में कतार से कतार और पौधे से पौधे की दूरी 30 सेंटीमीटर रखी जाती है। अगस्त महीने में कतार से कतार की दूरी 30 सेंटीमीटर और पौधे से पौधों की दूरी 15 सेंटीमीटर रखी जाती है जबकि सितंबर महीने की रोपाई में यह दूरी घटकर 15 * 15 सेंटीमीटर रह जाती है।

खरपतवार नियंत्रण : रोपाई के लगभग 30 दिन बाद निराई गुड़ाई करना जरूरी है। क्योंकि बरसात के कारण अवांछित खरपतवार जल्द ही निकल आते हैं और फसली पौधे को दबाने लगते है। निराई का दूसरा लाभ यह है कि मिट्टी की ऊपरी परत हल्की और वात रंध्र से परिपूर्ण हो जाती है। यदि पुनः घास उग आए तो 50 से 60 दिन बाद फिर से निराई गुड़ाई करें।


अन्य आवश्यक क्रियाकलाप : जब पुष्प कलियाँ निकलने लगे तो यथासंभव उन्हें तोड़ दे। फलियां लग जाएंगी तो कंद बनने की प्रक्रिया बाधित होगी और उपज तीन चौथाई घट जाएगी। किंतु यदि आपका फोकस बीज उत्पादन पर है तो आप पुष्पदंडों को बिल्कुल ना तोड़े और यथासंभव फलन को प्रेरित करने वाला हार्मोन दवा मीराकुलान स्प्रे करें। बड़े पैमाने पर कंद के लिए खेती कर रहे हैं तो हाथ से पुष्पदंड को तोड़ना आसान काम नहीं है। इसके लिए रासायनिक विधि का उपयोग अधिक सुविधाजनक है। ऑक्सीन श्रेणी के हार्मोन 2, 4-डी का छिड़काव करके भी अपेक्षित परिणाम प्राप्त कर सकते हैं। इसके 0.004 % सॉल्यूशन का उपयोग करें।

पादप संरक्षण : मिश्रीकंद की जड़ को छोड़कर अधिकांश हिस्से विषैले होते हैं इसलिए इसकी फसल पर कीट पतंगों का ज्यादा प्रभाव नहीं पड़ता है। किंतु फफूंद जनित बीमारी पत्र लांछन हो सकती है । इसके नियंत्रण के लिए इंडोफिल एम - 45 दो ग्राम प्रति लीटर पानी में घोलकर स्प्रे करें। एक हेक्टेयर में यह दवा लगभग 2 किलोग्राम लगती है। एक हेक्टेयर में 1000 लीटर पानी लगता है।

सिंचाई : आमतौर पर नवंबर महीने तक खेतों में पर्याप्त नमी रहती है किंतु दिसंबर से जनवरी के बीच सिंचाई की आवश्यकता पढ़ सकती है। जब खेत में मिट्टी सूख कर दरारें पड़ने लगे तो सिंचाई कर दें अन्यथा कंद फटने लगते हैं और उपज में भी कमी आ जाती है। किंतु ध्यान रहे कहीं जलजमाव ना हो।

                       एकल फसल के अलावा मिश्रीकंद की खेती मिश्रित फसल के रूप में भी सफलतापूर्वक की जाती है। कुछ प्रचलित कंबीनेशन निम्नलिखित हैं - मिश्रीकंद + तुवर, मिश्रीकंद + मकई ,मिश्रीकंद + मकई+ अरहर।

लागत : जोताई बीज खाद उर्वरक लेबर कंपोनेंट पेस्टिसाइड्स सिंचाई इत्यादि के ऊपर मुख्य रूप से खर्च होता है जो इस प्रकार है :

          जुताई - ₹1,500

खाद एवं उर्वरक - ₹27,000

              बीज - ₹18,000

    लेबर कंपोनेंट - ₹15,000

हार्मोन फंगीसाइड - ₹2,000 

            सिंचाई -- ₹3500

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       कुल खर्च = ₹81,000

आमदनी(income) : न्यूनतम उपज 400 क्विंटल और न्यूनतम थोक विक्रय दर 1,200 रुपया प्रति क्विंटल लें तो ₹4,80,000 प्राप्त होते हैं। इस प्रक्रिया के दौरान 81,000 रुपए का 8 महीने का ब्याज ग्रामीण महाजनी दर से ₹32,400 होता हैं। और यदि किसान का अपना खेत नहीं है तो एक हेक्टेयर का किराया ₹25,000 लगेगा। इस प्रकार एक हेक्टेयर मिश्रीकंद की खेती पर कुल खर्च बैठता है ₹1,38,400/- । इसे कुल प्राप्ति में से घटाने पर शुद्ध लाभ ₹3,41,600 आता है।

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