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E. Coli infection and its Homeopathic solutions

 ई. कोलाई (E. coli) संक्रमण के लक्षण अलग-अलग हो सकते हैं, यह इस बात पर निर्भर करता है कि किस प्रकार का ई. कोलाई बैक्टीरिया संक्रमण कर रहा है। हालांकि, कुछ सामान्य लक्षण अक्सर देखे जाते हैं:

सबसे सामान्य लक्षण:

  • दस्त: यह सबसे आम लक्षण है। दस्त पानी जैसा हो सकता है, और कुछ मामलों में, इसमें खून भी आ सकता है (जिसे खूनी दस्त कहते हैं)।
  • पेट में ऐंठन या दर्द: पेट में तेज दर्द, मरोड़ या पेट में कोमलता महसूस हो सकती है।
  • मतली और उल्टी: कुछ लोगों को मतली और उल्टी भी आ सकती है।
  • कमजोर या हल्का बुखार: आमतौर पर बुखार या तो नहीं होता है या हल्का (101° F से कम) होता है, लेकिन कभी-कभी यह अधिक भी हो सकता है।
  • थकान: सामान्य से अधिक थकान महसूस होना।

ई. कोलाई O157:H7 स्ट्रेन के विशिष्ट लक्षण (जो अधिक गंभीर होता है):

यह स्ट्रेन "शिगा टॉक्सिन" नामक एक शक्तिशाली विषैला पदार्थ पैदा करता है, जो आंतों की परत को नुकसान पहुंचाता है। इसके लक्षण आमतौर पर बैक्टीरिया के संपर्क में आने के 3-4 दिनों के बाद शुरू होते हैं, लेकिन 1 से 10 दिनों तक भी लग सकते हैं।

  • गंभीर पेट दर्द और ऐंठन: पेट में बहुत तेज दर्द और मरोड़।
  • खूनी दस्त: दस्त जो पहले पानी जैसा शुरू होता है और 24 घंटों के भीतर खूनी हो सकता है।
  • दस्त की आवृत्ति: दिन में कई बार गंभीर दस्त होना।
  • शौच की लगातार इच्छा: अक्सर शौच करने की इच्छा महसूस होती है, लेकिन ऐसा कर पाना मुश्किल हो सकता है।
  • बुखार: आमतौर पर नहीं होता या हल्का होता है।

मूत्र पथ के संक्रमण (Urinary Tract Infection - UTI) में ई. कोलाई के लक्षण:

ई. कोलाई महिलाओं में मूत्र पथ के संक्रमण का सबसे आम कारण है। इसके लक्षणों में शामिल हैं:

  • बार-बार पेशाब करने की इच्छा: बार-बार पेशाब करने की तीव्र इच्छा होना।
  • पेशाब करते समय दर्द या जलन: पेशाब करते समय जलन या दर्द महसूस होना।
  • पेट के निचले हिस्से में दर्द: पेल्विक एरिया या पेट के निचले हिस्से में दर्द।
  • बादल जैसा या दुर्गंधयुक्त मूत्र: पेशाब का रंग सामान्य से अलग या उसमें तेज गंध होना।
  • बुखार और ठंड लगना: अगर संक्रमण किडनी तक फैल जाता है तो तेज बुखार, ठंड लगना, मतली और उल्टी जैसे लक्षण हो सकते हैं।

गंभीर जटिलताएँ (दुर्लभ):

कुछ लोगों में, खासकर छोटे बच्चों (5 साल से कम) और बड़े वयस्कों (65 साल से अधिक) में, ई. कोलाई O157:H7 के कारण एक गंभीर और जानलेवा स्थिति विकसित हो सकती है जिसे हेमोलिटिक यूरेमिक सिंड्रोम (Hemolytic Uremic Syndrome - HUS) कहते हैं। इसके लक्षण आमतौर पर शुरुआती लक्षणों के एक सप्ताह बाद दिखाई देते हैं और इसमें शामिल हैं:

  • पेशाब कम होना
  • अत्यधिक थकान
  • चेहरे का पीला पड़ना या गुलाबी रंग का न होना (एनीमिया के कारण)
  • अस्पष्टीकृत चोट लगना या त्वचा पर छोटे लाल धब्बे
  • पेशाब में खून आना
  • गुर्दे का काम करना बंद कर देना (किडनी फेलियर)
  • दिल की धड़कन तेज होना
  • चक्कर आना और भ्रम
  • दौरे पड़ना

ई. कोली के लिए होम्योपैथिक उपचार आम तौर पर विशिष्ट लक्षणों और व्यक्ति की समग्र संरचना के आधार पर व्यक्तिगत होता है। एक योग्य होम्योपैथ सबसे उपयुक्त उपाय निर्धारित करने के लिए विस्तृत केस इतिहास लेगा। ई. कोली संक्रमण से जुड़े लक्षणों के लिए कुछ सामान्य रूप से सुझाए गए होम्योपैथिक उपचारों में शामिल हैं:

 आर्सेनिकम एल्बम: खराब भोजन खाने के बाद दिखाई देने वाले लक्षणों के लिए अक्सर विचार किया जाता है, खासकर दस्त, उल्टी, ऐंठन और बार-बार पानी के छोटे घूंट पीने की इच्छा के साथ।

वेराट्रम एल्बम: अगर लक्षण आर्सेनिकम एल्बम के समान हैं, लेकिन ठंडे पसीने के साथ हैं, तो इस पर विचार किया जा सकता है। 

एलो सोकोट्रिना: संभावित रूप से उपयोगी जब दस्त अनैच्छिक हो, बलगम और रक्त के साथ हो और पेट में काफी दर्द हो।

 कोल्चिकम ऑटमनेल: बलगम की उल्टी और बहुत गहरे रंग के मूत्र के लिए विचार किया जा सकता है, जो किडनी की समस्या का संकेत हो सकता है।

 मर्क्यूरियस सोलुबिलिस: ई. कोली के लिए कुछ होम्योपैथिक तैयारियों में उल्लेख किया गया है, खासकर खूनी दस्त, मतली और उल्टी जैसे लक्षणों के लिए। 

कैलियम म्यूरिएटिकम

China

क्रॉट टी.

Rheum

पोडो.

कैंथरिस: कुछ अध्ययनों से पता चलता है कि यह ई. कोली-प्रेरित सिस्टिटिस (मूत्र पथ के संक्रमण) में प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया को संशोधित कर सकता है।

कोलीबैसिलिनम: ई. कोली से बना एक होम्योपैथिक नोसोड, कभी-कभी ई. कोली के कारण होने वाले आवर्ती मूत्र पथ के संक्रमण के मामलों में उपयोग किया जाता है।

महत्वपूर्ण विचार:

ई. कोली O157:H7 के लिए आमतौर पर एंटीबायोटिक्स की सिफारिश नहीं की जाती है क्योंकि वे हेमोलिटिक यूरेमिक सिंड्रोम (HUS) जैसी जटिलताओं के जोखिम को बढ़ा सकते हैं। प्राथमिक पारंपरिक उपचार हाइड्रेशन और सहायक देखभाल पर केंद्रित है।

लक्षणों की गंभीरता: यदि आप या आपके किसी परिचित में ई. कोली संक्रमण के लक्षण हैं (विशेष रूप से खूनी दस्त, पेट में तेज दर्द, लगातार उल्टी, या निर्जलीकरण के लक्षण), तो तुरंत पारंपरिक चिकित्सा देखभाल लें। ई. कोली O157:H7 हेमोलिटिक यूरेमिक सिंड्रोम (HUS) जैसी गंभीर जटिलताओं को जन्म दे सकता है, जिसके लिए तत्काल चिकित्सा हस्तक्षेप की आवश्यकता होती है।

आर्जीमोन मेक्सिकाना यानि भटकटैया : एक परिचय

 भटकटैया, सत्यानाशी,कन्टैया या मैक्सिकन प्रिक्ली पॉप्पी यह सारे नाम आर्जीमोन मैक्सिकना नामक पौधे के हैं।


 इसके बीज काली सरसों या राई के समान दिखते हैं और विषैले होते हैं। कटीले पत्तों और फलों वाले इस हर्ब का मूल स्थान यद्यपि मेक्सिको है किंतु संसार के विभिन्न भागों सहित भारत में भी हर जगह पाया जाता है। फलों,तने या पत्तों को तोड़ने अथवा काटने पर पारदर्शी पीले दूध जैसा निकलता है इसी कारण आयुर्वेद में इसे स्वर्णक्षीरी कहां गया है।

भावप्रकाश निघंटू नामक आयुर्वेदिक ग्रंथ के अनुसार यह पीला रस घाव, दाद ,कुष्ठ इत्यादि की चिकित्सा में अत्यंत उपयोगी है। विषाणु और कीटाणुओं का नाश करता है। न ठीक होने वाले घाव के इलाज में यह रामबाण औषधि है। मुनाफाखोर,लालची व्यापारी भटकटैया के बीजों का दुरुपयोग करते हैं। वे सरसों के साथ मिलाकर तेल निकालते हैं और मिलावटी सरसों का तेल शुद्ध तेल के नाम पर बेच लेते हैं। या मिलावटी तेल मौत का कारण भी बन सकता है। इससे एपिडेमिक ड्रॉप्सी यानी पेट की झिल्ली में पानी भरने का रोग उत्पन्न हो जाता है।

              चूँकि आर्जीमोन मैक्सिकना के बीज विषैले होते हैं इनसे निकलने वाला तेल मृत्यु अथवा गंभीर रोग का कारण बन सकता है इसलिए इसके अल्प मात्रा में सेवन के परिणाम स्वरूप उत्पन्न होने वाले लक्षणों का संग्रह कर एक होम्योपैथिक दवा के रूप में इसकी प्रूविंग की जा सकती है। इस प्रकार होम्योपैथिक चिकित्सा पद्धति में एक और भारतीय औषधि का समावेश हो सकेगा जो मानवता के कल्याण की दिशा में एक और कदम साबित होगा। इसके अतिरिक्त इसके रस यानी स्वर्णक्षीर के गुणों का अध्ययन आधुनिक वैज्ञानिक विधियों द्वारा किया जाना भी आवश्यक है। प्राचीन आयुर्वेदिक ग्रंथों में दिए गए विवरण के ऊपर मैं प्रश्नचिन्ह नहीं लगा रहा परंतु मेरा मानना है कि किसी चीज पर आंख मूंदकर विश्वास करना अंधविश्वास है। पुरातन को अद्यतन बनाना वास्तव में विज्ञान का एक कर्तव्य है।

   आर्जीमोन मैक्सिकना के साथ एक मिथक भी जुड़ा हुआ है। पुराने जमाने में रसायन वैज्ञानिक जिन्हें कीमियागर या अल्केमिस्ट कहा जाता था अपने अनुसंधान और ज्ञान को काफी गुप्त रखते थे। उनके मुख्यता तीन परम लक्ष्य थे : -  (1) ब्रह्मांड के साथ मनुष्य के संबंधों की खोज और मानवता के हित में इसका लाभ उठाना। (2) अमृत की खोज और (3) सीसा या तांबा जैसे कम मूल्य वाले धातुओं को सोना में परिवर्तित करने का उपाय ढूंढना।

                     भारत में भी कीमियागरों के देसी वर्जन पाए जाते थे जिन्हें रसज्ञ, रस-सिद्ध अथवा रसायनज्ञ कहा जाता था इनमें नागार्जुन का नाम उल्लेखनीय है। कहा जाता है कि उन्होंने सोना बनाने की विधि खोज ली थी जिसमें स्वर्णक्षीरी के उपयोग के विषय में कई स्थानों पर उल्लेख किया गया है। परंतु किसी भी ग्रंथ में सोना बनाने की संपूर्ण विधि लिखी हुई नहीं मिलती है,  केवल संकेत कथाएं और उल्लेख मिलते हैं। मध्यकाल के यूरोप और पश्चिम एशिया के कीमियागर अपने ज्ञान को अत्यंत गुप्त संकेतो में नोट करते थे किंतु आज की तारीख में उन्हें समझने वाला कोई नहीं है। इन संकेतों की कोई सार्वभौमिक भाषा भी नहीं है जिसकी सहायता से इन्हें डिकोड किया जा सके।इन सब तथ्यों की सहायता से हम अंततःइस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि सत्यानाशी का न केवल औषधीय महत्व था बल्कि रासायनिक प्रक्रियाओं में भी उपयोगी था।


कोरोना वायरस अपडेट इन इण्डिया


 यदि बात करें पूरी दुनिया की तो कोरोना/ कोविड19 का प्रसार और संक्रमण 2020 में जिस तरह से हुआ उसके मुकाबले 2021 में उतना ज्यादा प्रभाव देखने को नहीं मिला। परन्तु भारत में स्थिति तुलनात्मक रूप से ठीक विपरीत रही।यहां कोविड 19 वायरस के नये स्ट्रेन का प्रसार और संक्रमण अत्यंत तीव्र गति से हो रहा है । भारतीयों के इम्यून सिस्टम की कड़ी परीक्षा लेते हुए यह पिछले साल की तुलना में अधिक जानें लेने लगा है। तो सवाल उठता है कि--


■ क्या एक साल में औसत भारतीय की इम्यूनिटी कम  हो गई है?

■ या फिर कोरोना वायरस ने रूप बदलते हुए बीमार करने की ताक़त बढा ली है?

अब तक  हुए अनुसंधान बताते हैं कि हमारी इम्यूनिटी अपनी जगह पूरी मजबूती से सिर उठाए खड़ी है और अन्य रोगों से दो-दो हाथ करने के लिए तैनात है।

  यह बात तो सर्वविदित है कि कोरोना वायरस का सबसे मुख्य गुण है रूप बदलने की क्षमता। अनुकूलन की यह अपूर्व शक्ति इसकी अमरता का असली राज है। इसी कारण एक सटीक और कारगर वैक्सीन का विकास संभव नहीं हो पा रहा है। आज विभिन्न फ़ार्मा कम्पनियों,विश्वविद्यालयों की शोधशालाओ और राजकीय अनुसंधान संस्थानों द्वारा जो भी कोविड19 के  वैक्सीन उपलब्ध कराए गए हैं कमोबेश पूरी दुनियां में उपयोग किया जा रहा है। परन्तु टीकाकरण के बाद भी कोरोना पोजिटिव होने की शिकायते मिल रही हैं। इस पर डाँक्टर और वैज्ञानिक कहते हैं कि टीके की वजह से बीमारी अपने उग्र रूप में नही सताती है । मगर यह महज नाकामियों को छुपाने की कोशिश भर है। 

* कोरोना सीज़न -1 में कहा जाता है कि साबुन से बार-बार हाथ धोएं ,सैनेटाईजर का बेवजह भी इस्तेमाल करते रहे। दो गज दूरी,मास्क है जरूरी। 

  🗣मेरा चैलेंज है उन तथाकथित डाक्टरों-वैज्ञानिको के लिए जो अवैज्ञानिक बातों का प्रचार कररहे हैं। वे साबित करें कि सैनेटाईजर से कोरोना वायरस नष्ट हो जाते हैं या साबुन से मर जाते हैं। 

* कोरोना सीज़न-2 में कहा जाता है कि ऑक्सीजन सिलेंडर  और रैमडेसीवीर दवा की कमी है वरना सबको बचा लेते। 

🗣सबसे पहले तो इस बात की पडताल होनी चाहिए कि रैमडेसीवीर दवा के प्रयोग से मरने वालों की संख्या बड़ी है या बचने वालो की।

🗣 दूसरी तरफ ऑक्सीजन के लिए जो हाहाकार मचा हुआ है ,उस पर भी तथ्यों के आधार पर विवेचन किया जाना जरूरी है। शरीर में ऑक्सीजन की कमी मापने के लिए एक गैजेट बाज़ार में खूब बिक रहा है और इसका नाम है ऑक्सीमीटर।महज एक ऊँगली पकड़ कर वह ऑक्सीजन लेवल बता देता है। है ना कमाल का गैजेट?खून में कितना ऑक्सीजन है यह शरीर के बाहर से ही बिना किसी कैमिकल एनालिसिस के बता रहा है ।भई वाह! गजब का जादू है!

⁉️ मनुष्य के फेफड़े कुछ इस प्रकार बने हुए हैं कि शुद्ध ऑक्सीजन के बजाय वातावरणीय गैसीय मिश्रण अर्थात् हवा में से अपनी जरूरत के अनुसार ऑक्सीजन अवशोषित कर लेते हैं। परन्तु कोरोना मरीजों में अक्सर यह क्षमता घट जाती है और वे श्वसन के लिए बेचैनी महसूस करते हैं। इसी स्थिति में कृत्रिम श्वसन हेतु ऑक्सीजन  सिलेंडर की जरूरत महसूस हो रही है। बाज़ार में एक दूसरा विकल्प भी मौजूद है - 'ऑक्सीजन कंसेन्ट्रेटर'।यह बिजली से संचालित होता है और हवा में उपस्थित 78% नाइट्रोजन : 21% ऑक्सीजन की कंसिस्टेन्सी को बदल कर ऑक्सीजन की सान्द्रता बहुत ज्यादा कर देता है। मध्यम एवं उच्च आय वाले लोग जो ऑक्सीमीटर और ऑक्सीजन कंसेन्ट्रेटर अफोर्ड कर सकते हैं, वे जान के डर से पैसे आसानी से ख़र्च कर रहे हैं। किसी के मौत का खौफ किसी और के लिए फायदे का सौदा बन गया है। 

◾खबर आ रही है कि कोरोना जांच में हर 8 में से 1 व्यक्ति positive निकल रहा है। जबकि 50% से अधिक संक्रमित तो घर में ही सेल्फ क्वारेन्टाइन का पालन करते हुए 10-15 दिन में ठीक हो जा रहे हैं, उन्हें न तो जांच जरूरी लगता है और न तथाकथित इलाज़। ब्रिटेन में किये गये परीक्षणों से पता चला है कि अब यह संक्रमण छुआ-छूत के साथ साथ हवा के माध्यम से भी फैल रहा है। यह बेहद खतरनाक बात है। क़ोई कहीं भी सुरक्षित नहीं है। संक्रमण दर के आंकड़े जो अब मई माह में छन कर आ रहे हैं उनके अनुसार गोवा में सर्वाधिक 48%,हरियाणा में 37%,पश्चिम बंगाल 33%,दिल्ली 32%,पुडुचेरी 30%,एमपी-छत्तीसगढ़-राजस्थान 29%,कर्नाटक-चंडीगढ़ 26% की उच्च संक्रमण दर है। जबकि औसत राष्ट्रीय संक्रमण दर 21% है। डब्लूएचओ के मानकों के अनुसार यह दर 5% हो तो नियंत्रण योग्य माना जाता है। सबसे उल्लेखनीय तथ्य तो यह है कि दुनिया भर के सभी कोरोना संक्रमित मरीजों में से लगभग 50 फ़ीसदी अकेले भारत में है। पिछले एक सप्ताह में पूरी दुनिया में कोरोना से होने वाली मौतों का 25% हिस्सा केवल भारत का है। 6 मई 2021 को देशभर में 414182 नये मामले और 3920 मौतें दर्ज की गई। 

👌 सब कुछ गलत ही नहीं हो रहा है, कुछ आशा की किरणें भी छन-छन कर आ रही हैं। बिहार सरकार अस्पतालों में डाक्टर,नर्स,लैब टेक्नीशियन, वार्ड ब्वाय इत्यादि की संविद पर आपात बहाली कर रही है ।वहीं रूस में एक खुराक वाले टीके का उपयोग शुरू हो गया है। इसका नाम स्पुतनिक लाइट रखा गया है। भारत में भी इसका उत्पादन होगा। कीमत $10 से कम है और 2° - 8° सेल्सियस ताप पर भंडारित की जा सकती है। परीक्षणों में 79% प्रभावी पाया गया है। क्योरवैक के नाम से एक जर्मन कंपनी ने आर एन ए आधारित वैक्सीन तैयार की है जिसे सामान्य फ्रीज़ में रखा जा सकता है। 

🚫वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन की भूमिका कल भी संदिग्ध थी,आज भी है।http://nbt.in/hqfDQY इसके तथाकथित मानकों को ज्यादा भाव देने की जरूरत नहीं है। फिटनेस का ध्यान रखें, शारीरिक सक्रियता बनाए रखें, थोड़ा बहुत योगाभ्यास जरूर करें,ताजे रसदार फलों का सेवन करते रहें। सबसे जरूरी बात - "जो डर गया, समझो मर गया"। फिल्म शोले का यह संवाद कोरोना के खिलाफ जंग का सबसे बड़ा मंत्र है। 

वर्तमान परिदृश्य में कैसे जियें

 आधुनिकता के दौड़ में दुनिया सरल से जटिल, सादगी से विलासिता की ओर अग्रसर है। विभिन्न वैज्ञानिक आविष्कारों, तकनीक के उपयोग से जीवन को आरामदेह और सहज बनाने में मदद मिली है। परन्तु किसी भी चीज की अति अच्छी नहीं होती है। विकास के बेलगाम रथ पर सवार तथाकथित सभ्य समाज की जो रोजाना की जीवन शैली संघटित हुई है वो कुछ ज्यादा ही असंतुलनकारी साबित हो रही है। उच्च पोषक मानकों के अनुरूप और अच्छा भोजन गटकने के बावजूद स्वास्थ्य ठीक नहीं रहता। ढीला शरीर, मोटा पेट,झुके कंधे, गंजी खोपड़ी, डायबीटीस-ब्लडप्रेशर से पीड़ित हांफता काँपता शरीर और चिता-तनावयुक्त अन्यमनस्क चिड़चिड़ा दिमाग लिए घूम रहा है आज हर इन्सान।  कैंसर, हृदय रोग, मनोविकार जैसे विरल रोगों से ग्रसित होने वालों की संख्या में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है।

 क्या हैं  इन सब विसंगतियों के मूल में?

क्या आपने कभी सोचा है?

यदि नहीं सोचा तो अब सोंच लीजिए। 

क्योकि सवाल आपकी जिन्दगी का है।

वरना भेड़ और आप के बीच क्या अंतर रह जाएगा?

मेरा मानना है कि चर्चा कीजिए अपने आप से।दूसरों के साथ बिलकुल नहीं। गलतियाँ इनसान से हीं होती हैं। अपने आप से कन्फेस करें और यथासंभव गलतियो को सुधारने की एक इमानदार कोशिश कर के देखें। कोई अन्य हमारी गलतियाँ बताए तो 'ईगो हर्ट' होता है। हमारा मन सीधे तौर पर नाग की भांति व्यवहार करता है। या यूँ कहें कि यहां पर भी न्यूटन के गति का तीसरा नियम लागू होता है -- "प्रत्येक क्रिया के बराबर और विपरीत प्रतिक्रिया होती है "।
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E. Coli infection and its Homeopathic solutions

 ई. कोलाई (E. coli) संक्रमण के लक्षण अलग-अलग हो सकते हैं, यह इस बात पर निर्भर करता है कि किस प्रकार का ई. कोलाई बैक्टीरिया संक्रमण कर रहा है...