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कोरोना मरीज की देखभाल होम आइसोलेशन में कैसे करें



 पिछले आलेख में आपने जाना कि होम आइसोलेशन का पालन करते हुए घर में किस प्रकार रहे। रहन-सहन,संयम-नियम,आहार और मानसिकता के संदर्भ में यथा सम्भव संक्षिप्त व सटीक विश्लेषण प्रस्तुत किया गया। दवाओं के दुष्प्रभाव और उनके सेवन से बढने वाली मृत्यु दर को देखते हुए इस नये आलेख के सृजन की आवश्यकता महसूस हुई। 

■ यद्यपि विभिन्न प्रान्तों की सरकारें संक्रमण दर में गिरावट के आंकड़े पेश कर रही हैं जैसे बिहार में मात्र 3.11%  बताया गया है तथापि वास्तविक स्थिति कुछ और ही है। इसीलिए लाकडाऊन बढाने की चर्चा सत्ता के गलियारों में चल रही है। दूसरी तरफ म्यूकर माइकोसिस (ब्लैक फंगस) को भी 22 मई को महामारी अधिनियम 1897 के तहत पैन्डेमिक घोषित कर दिया गया है। इसके मामले न केवल शहरों में बल्कि गावों में भी समान रूप से उजागर हो रहे हैं। अब इसकी मानिटरिंग एकीकृत रोग निगरानी कार्यक्रम ( ISDP) द्वारा की जायेगी। 

■ इसी क्रम में एक दूसरा कोरोना follow up रोग उभरने लगा है,जिसे व्हाइट फंगस कहा जा रहा है। इसका भी मूल कारण कमजोर इम्यूनिटी या कोरोना से कमजोर हुई इम्यूनिटी बताया गया है। वास्तव में यह एस्पर्जिलस जीनस के सैकड़ों फफून्दो(moulds) में से एक का संक्रमण है। डाक्टर लोग इस रोग को एस्पर्जिलोसिस भी कह रहे हैं और कम घातक बताते है। इसके लक्षणों में सबसे प्रमुख है शरीर, जीभ,मुँह पर सफेद चकत्ते उभरना।ब्लैक फंगस जहाँ शरीर के अंदरूनी हिस्से को रुग्ण करता है वहीं व्हाइट फंगस सामान्यतः शरीर के बाहरी हिस्से को प्रभावित करता है। ब्लैक फंगस के इलाज में सर्जरी की आवश्यकता पड सकती है मगर व्हाइट फंगस के इलाज में सर्जरी की आवश्यकता नहीं पड़ती। 

■ एक रोचक तथ्य : संसार के कुल साइट्रिक एसिड उत्पादन का 99% हिस्सा केवल एस्पर्जिलस नाइजर नामक फंगस के द्वारा होता है। केवल 1% उत्पादन नींबू और नींबू वर्गीय(citrus) फलों से होता है। 

■ एक कटु सत्य : आज जो भी महामारी इत्यादि फैल रही है वह मनुष्य द्वारा प्रकृति के साथ की जाने वाली स्वार्थपूर्ण छेडछाड का नतीजा है। 

■ कोरोना सीज़न-1यानि वर्ष 2020 में सोशल मीडिया और व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी के लाइफ टाईम स्टूडेंट्स द्वारा वायरल तथाकथित प्रतिरोधक या होम्योपैथिक वैक्सीन आर्सेनिक था। यह सीज़न-2 में भी वायरल है। यह सब देखकर स्वर्गीय हैनीमैन साहब की आत्मा जरूर रो रही होगी। यह एक गलत सलाह है ।इसके चक्कर में न पड़ें। 

■  होम आइसोलेशन का पालन करते हुए भी स्वच्छता का ध्यान रखें। कमरा, कपड़े, शरीर और खाना-पानी की स्वच्छता का विशेष रूप से ख्याल रखा जाना चाहिए। 

■ कोरोना सीज़न-2 में एस्पिडोस्पर्मा-Q का प्रचार चल रहा है। लोग 60-60 मिली की 4-4,5-5 शीशियाँ खरीद कर स्टाक कर रहे हैं। कालाबाजारी हो रही है,जिस प्रकार ऑक्सीजन सिलेंडर की होती है। दरअसल जिस कोरोना रोगी को सांस लेने में तकलीफ हो,ऑक्सीजन लेवल कम हो गया हो और तत्काल ऑक्सीजन सिलेंडर उपलब्ध न हो तो एस्पिडोस्पर्मा के सेवन से फायदा होता है। यह सांस में खींची गई हवा में से अपनी जरूरत के अनुसार ऑक्सीजन अवशोषित करने की क्षमता को बढ़ाने का काम करती है। इससे रक्त में ऑक्सीजन की मात्रा बढ़ जाती है और रोगी का हाँफना व सांस के लिए छटपटाना बंद हो जाता है। यह एक प्राण रक्षक औषधि है, स्थायी समाधान नहीं। स्थायी समाधान पाना है तो योग्य होम्योपैथ से सम्पर्क कर सकते हैं। 

■ एलोपैथिक पद्धति में अबतक कोरोना या कोविड19 की कोई सटीक (appropriate) दवा नहीं है। यह एक अकाट्य सत्य है। जो कुछ भी इलाज अस्पतालों में किया जा रहा है वह रोग के बजाय अलग-अलग लक्षणों का इलाज है। नतीजा लाखों रुपये खर्च करने के बाद भी जिन्दगी से हाथ धो लेना।हम 2020 से ही रैमडेसीवीर जैसी दवाओं के निरर्थक प्रयोग और जानलेवा प्रभाव के बारे में लोगों को आगाह करते रहे हैं। देर से ही सही बिहार सरकार की आँखे खुली तो सही। पटना के कुछ बडे अस्पतालों की शिकायत पर सरकार ने रैमडेसीवीर दवा की जाँच के आदेश दे दिए हैं।




ऐसी ही सच्चाई बयां करने के बाद अगले ही दिन रामदेव जी को बयान वापस लेना पड़ा है। सुना है सरकार में  कोई मंत्री हैं डाक्टर हरसबरधन,उन्हें घोर आपत्ति है कि एलोपैथी की बेइज्जती हो गई। अरे भाई रोग तो लक्षण समूह से भी गहरी और उँची चीज है। दम है तो रोग का इलाज ढूँढो फिर अधिकारपूर्वक रोगी को घेर कर रखना। लक्षणों के अनुसार ही चिकित्सा करनी है तो क्या होम्योपैथी खराब है। यह तो सम्यक् लक्षणों के आधार पर चयनित दवा से आरोग्य करती है। 

■ याद रखें : 96°F - 98°F शारीरिक तापमान को बुखार नहीं समझा जाता है। यह नार्मल ताप है। 99°F से 100°F के  बीच हल्का ज्वर माना जाता है। इस स्थिति में डाक्टर लोग दिन में 2-3 बार पेरासिटामोल खिला रहे हैं। इस प्रिस्क्रीप्शन को हाई फीवर के लिए बचा कर रखिये, अगर जीवित रहने की चाह है। विश्वास कीजिए नये अनुसंधान कुछ ही दिनों में मेरी सलाह की पुष्टि करेंगे। 

■ अब हम चर्चा करेंगे उन होमियोपैथिक दवाओं की जो सेफ हैं। कोरोना मरीजों के यथार्थ लक्षण समुच्चय से सम्यक् रूप से मेल खाने वाली इन दवाओं का प्रयोग कर सफल चिकित्सा की गई है। 


(1) ब्रायोनिया एल्बा-30 : एक रिसर्च प्रोजेक्ट के तहत आगरा के डाक्टर प्रदीप गुप्ता ने 50 कोरोना पाजिटिव रोगियों को उनके common symptoms के आधार पर  केवल ब्रायोनिया देकर 3-5 दिन में चंगा कर दिया। मगर जरूरी नहीं कि हर रोगी इसी दवा से ठीक हो जाए। परिवर्तनशील लक्षणों के अनुसार अन्य दवाओं की भी जरूरत पड़ सकती है। बुखार आने से पहले नासा-रंध्र शुष्क लगे,छींक आये, गले में खराश या दर्द हो, फिर धीरे-धीरे शरीर का ताप बढ़े,खुली हवा की चाह,हरकत से तकलीफ बढ़े और विश्राम से घटे तो ब्रायोनिया एल्बा की कुछ खुराकें देकर देखें। यह रोग को शान्त कर शरीर को राहत प्रदान करेगी। 

(2) बेलाडोना-30 : इसका प्रयोग तब करें जब आँखे  लाल,सिरदर्द, आँखों से पानी आना,तेज बुखार, जलन,मुँह-गला सूखने पर पानी पीने से घृणा, प्रकाश-शोर-स्पर्श से घृणा, सूखी खाँसी, डिसेन्ट्री इत्यादि लक्षणों का समूह मिले।4-4 घंटे पर एक बूँद दे सकते हैं। 



(3) इपिकाक-30 : उल्टियाँ, जी मिचलाना, सिरदर्द, बुखार, जीभ लाल या साफ,फेफड़ों में बलगम जमा हो और न निकलता हो,सुखी खाँसी हो तब इपिकाक-30 सुबह-शाम दो-तीन दिन तक सेवन करायें। 

(4) मैग्नीशिया म्योर-6 : मुँह-गला सूखता हो,नाक बंद या पनीला स्राव,गंधलोप, स्वादलोप, जुकाम के जैसे अन्य लक्षण, श्वास लेने में परेशानी, मुँह से सांस लेना पडता हो,भूख कम या बिलकुल न लगे,सूखी खाँसी, रात में लक्षण वृद्धि, छाती में दर्द, जलन,पीठ-नितम्बों और बाहों में अंदर की तरफ खीचने जैसा दर्द हो तो मैग म्यूर-6 हर 4 घंटे पर सेवन करायें। शर्तिया लाभ होगा। इसके अलावा भी बहुत सी दवाएं हैं जो लक्षणों के अनुसार अनुभवी चिकित्सकों द्वारा प्रयुक्त की जा सकतीं हैं। 

कोरोना वायरस अपडेट इन इण्डिया


 यदि बात करें पूरी दुनिया की तो कोरोना/ कोविड19 का प्रसार और संक्रमण 2020 में जिस तरह से हुआ उसके मुकाबले 2021 में उतना ज्यादा प्रभाव देखने को नहीं मिला। परन्तु भारत में स्थिति तुलनात्मक रूप से ठीक विपरीत रही।यहां कोविड 19 वायरस के नये स्ट्रेन का प्रसार और संक्रमण अत्यंत तीव्र गति से हो रहा है । भारतीयों के इम्यून सिस्टम की कड़ी परीक्षा लेते हुए यह पिछले साल की तुलना में अधिक जानें लेने लगा है। तो सवाल उठता है कि--


■ क्या एक साल में औसत भारतीय की इम्यूनिटी कम  हो गई है?

■ या फिर कोरोना वायरस ने रूप बदलते हुए बीमार करने की ताक़त बढा ली है?

अब तक  हुए अनुसंधान बताते हैं कि हमारी इम्यूनिटी अपनी जगह पूरी मजबूती से सिर उठाए खड़ी है और अन्य रोगों से दो-दो हाथ करने के लिए तैनात है।

  यह बात तो सर्वविदित है कि कोरोना वायरस का सबसे मुख्य गुण है रूप बदलने की क्षमता। अनुकूलन की यह अपूर्व शक्ति इसकी अमरता का असली राज है। इसी कारण एक सटीक और कारगर वैक्सीन का विकास संभव नहीं हो पा रहा है। आज विभिन्न फ़ार्मा कम्पनियों,विश्वविद्यालयों की शोधशालाओ और राजकीय अनुसंधान संस्थानों द्वारा जो भी कोविड19 के  वैक्सीन उपलब्ध कराए गए हैं कमोबेश पूरी दुनियां में उपयोग किया जा रहा है। परन्तु टीकाकरण के बाद भी कोरोना पोजिटिव होने की शिकायते मिल रही हैं। इस पर डाँक्टर और वैज्ञानिक कहते हैं कि टीके की वजह से बीमारी अपने उग्र रूप में नही सताती है । मगर यह महज नाकामियों को छुपाने की कोशिश भर है। 

* कोरोना सीज़न -1 में कहा जाता है कि साबुन से बार-बार हाथ धोएं ,सैनेटाईजर का बेवजह भी इस्तेमाल करते रहे। दो गज दूरी,मास्क है जरूरी। 

  🗣मेरा चैलेंज है उन तथाकथित डाक्टरों-वैज्ञानिको के लिए जो अवैज्ञानिक बातों का प्रचार कररहे हैं। वे साबित करें कि सैनेटाईजर से कोरोना वायरस नष्ट हो जाते हैं या साबुन से मर जाते हैं। 

* कोरोना सीज़न-2 में कहा जाता है कि ऑक्सीजन सिलेंडर  और रैमडेसीवीर दवा की कमी है वरना सबको बचा लेते। 

🗣सबसे पहले तो इस बात की पडताल होनी चाहिए कि रैमडेसीवीर दवा के प्रयोग से मरने वालों की संख्या बड़ी है या बचने वालो की।

🗣 दूसरी तरफ ऑक्सीजन के लिए जो हाहाकार मचा हुआ है ,उस पर भी तथ्यों के आधार पर विवेचन किया जाना जरूरी है। शरीर में ऑक्सीजन की कमी मापने के लिए एक गैजेट बाज़ार में खूब बिक रहा है और इसका नाम है ऑक्सीमीटर।महज एक ऊँगली पकड़ कर वह ऑक्सीजन लेवल बता देता है। है ना कमाल का गैजेट?खून में कितना ऑक्सीजन है यह शरीर के बाहर से ही बिना किसी कैमिकल एनालिसिस के बता रहा है ।भई वाह! गजब का जादू है!

⁉️ मनुष्य के फेफड़े कुछ इस प्रकार बने हुए हैं कि शुद्ध ऑक्सीजन के बजाय वातावरणीय गैसीय मिश्रण अर्थात् हवा में से अपनी जरूरत के अनुसार ऑक्सीजन अवशोषित कर लेते हैं। परन्तु कोरोना मरीजों में अक्सर यह क्षमता घट जाती है और वे श्वसन के लिए बेचैनी महसूस करते हैं। इसी स्थिति में कृत्रिम श्वसन हेतु ऑक्सीजन  सिलेंडर की जरूरत महसूस हो रही है। बाज़ार में एक दूसरा विकल्प भी मौजूद है - 'ऑक्सीजन कंसेन्ट्रेटर'।यह बिजली से संचालित होता है और हवा में उपस्थित 78% नाइट्रोजन : 21% ऑक्सीजन की कंसिस्टेन्सी को बदल कर ऑक्सीजन की सान्द्रता बहुत ज्यादा कर देता है। मध्यम एवं उच्च आय वाले लोग जो ऑक्सीमीटर और ऑक्सीजन कंसेन्ट्रेटर अफोर्ड कर सकते हैं, वे जान के डर से पैसे आसानी से ख़र्च कर रहे हैं। किसी के मौत का खौफ किसी और के लिए फायदे का सौदा बन गया है। 

◾खबर आ रही है कि कोरोना जांच में हर 8 में से 1 व्यक्ति positive निकल रहा है। जबकि 50% से अधिक संक्रमित तो घर में ही सेल्फ क्वारेन्टाइन का पालन करते हुए 10-15 दिन में ठीक हो जा रहे हैं, उन्हें न तो जांच जरूरी लगता है और न तथाकथित इलाज़। ब्रिटेन में किये गये परीक्षणों से पता चला है कि अब यह संक्रमण छुआ-छूत के साथ साथ हवा के माध्यम से भी फैल रहा है। यह बेहद खतरनाक बात है। क़ोई कहीं भी सुरक्षित नहीं है। संक्रमण दर के आंकड़े जो अब मई माह में छन कर आ रहे हैं उनके अनुसार गोवा में सर्वाधिक 48%,हरियाणा में 37%,पश्चिम बंगाल 33%,दिल्ली 32%,पुडुचेरी 30%,एमपी-छत्तीसगढ़-राजस्थान 29%,कर्नाटक-चंडीगढ़ 26% की उच्च संक्रमण दर है। जबकि औसत राष्ट्रीय संक्रमण दर 21% है। डब्लूएचओ के मानकों के अनुसार यह दर 5% हो तो नियंत्रण योग्य माना जाता है। सबसे उल्लेखनीय तथ्य तो यह है कि दुनिया भर के सभी कोरोना संक्रमित मरीजों में से लगभग 50 फ़ीसदी अकेले भारत में है। पिछले एक सप्ताह में पूरी दुनिया में कोरोना से होने वाली मौतों का 25% हिस्सा केवल भारत का है। 6 मई 2021 को देशभर में 414182 नये मामले और 3920 मौतें दर्ज की गई। 

👌 सब कुछ गलत ही नहीं हो रहा है, कुछ आशा की किरणें भी छन-छन कर आ रही हैं। बिहार सरकार अस्पतालों में डाक्टर,नर्स,लैब टेक्नीशियन, वार्ड ब्वाय इत्यादि की संविद पर आपात बहाली कर रही है ।वहीं रूस में एक खुराक वाले टीके का उपयोग शुरू हो गया है। इसका नाम स्पुतनिक लाइट रखा गया है। भारत में भी इसका उत्पादन होगा। कीमत $10 से कम है और 2° - 8° सेल्सियस ताप पर भंडारित की जा सकती है। परीक्षणों में 79% प्रभावी पाया गया है। क्योरवैक के नाम से एक जर्मन कंपनी ने आर एन ए आधारित वैक्सीन तैयार की है जिसे सामान्य फ्रीज़ में रखा जा सकता है। 

🚫वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन की भूमिका कल भी संदिग्ध थी,आज भी है।http://nbt.in/hqfDQY इसके तथाकथित मानकों को ज्यादा भाव देने की जरूरत नहीं है। फिटनेस का ध्यान रखें, शारीरिक सक्रियता बनाए रखें, थोड़ा बहुत योगाभ्यास जरूर करें,ताजे रसदार फलों का सेवन करते रहें। सबसे जरूरी बात - "जो डर गया, समझो मर गया"। फिल्म शोले का यह संवाद कोरोना के खिलाफ जंग का सबसे बड़ा मंत्र है। 

कोरोना काल: एक मूल्यांकन


🎯चाइना के वू हान क्षेत्र में वर्ष 2019 के उत्तरार्ध से ही सामान्य फ्लू से भिन्न श्वास संस्थान,शरीर के ताप नियन्त्रण एवम् समन्वय प्रणाली पर तीव्र प्रभाव डालने वाली संक्रामक बीमारी का प्रसार होने लगा था।बड़ी संख्या में मौतें भी होने लगी।पता चला कि यह रोग किसी नये प्रकार के वायरस के कारण उत्पन्न हो रहा है।WHO और चीनी लैब्स के प्रयास से पता चला कि यह नया वायरस एन्फ्लुएंज़ा उत्पन्न करने वाले लगभग 250 से 300 प्रकार के वायरसों के समूह में से ही निकल कर किस न किसी कारण से म्यूटेंट होकर कहर ढा रहा है।चूँकि इसका प्रकोप 2019में हुआ था तो WHO ने नाम दिया COVID-19! इसे वैज्ञानिक शब्दावली में सार्स-कोव 2 या नोवल कोरोना वायरस भी कहते हैं।

                  ✍✍    दर असल कोरोना शब्द लातीनी भाषा का है जिसका अर्थ मुकुट होता है।इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोप से देखने पर इसके इर्द-गिर्द उभरे हुए काँटो जैसे ढाँचे मुकुट का आभास कराते हैं।120 नैनो मीटर व्यास वाले इस वायरस की रासायनिक बनावट RNA,प्रोटीन और लिपिड के तानेबाने में गुथी है।उपरी परत लिपिड यानि वसा से बनी होती है।अन्य भाग प्रोटीन से तथा भीतरी भाग में जेनेटिक मटेरियल RNA से बना है।RNA आधारित वायरस में रूप बदलने की अद्भुत क्षमता होती है।अर्थात् यह सतत म्यूटेशन(उत्परिवर्तन) सक्षम वायरस है।इसीलिये कोरोना वायरसजन्य बीमारी के विरुद्ध  स्थायी समाधान पाना यानि सफल वैक्सीन बनाना सम्भव नहीं है।गरम पानी और साबुन से 1 मिनट तक अच्छी तरह रगड़ कर हाथ धोने की सलाह ड़ी जाती है क्यौंकि साबुन लिपिड अणु से बने वायरस के सुरक्षा परत को तोड़कर इसे नष्ट करने में सक्षम है।

                    🌎✍       2019 के अन्त तक कोरोना काफी हद तक चीन के वूहान प्रांत तक ही सीमित था।परन्तु तब न तो WHO और न चीन को खयाल आया कि संक्रमण क्षेत्र से बाहर आना और भीतर जाना रोक दिया जाय ताकि ग्लोबल स्प्रेड से बचाव सम्भव हो सके।

परिणाम: दिसंबर 2019से जनवरी 2020 तक पहले इटली व ईरान फिर योरोपीय देशों सहित USA ने फैलने लगा।इसी क्रम में भारत-USA जॉइंटवेंचर 'नमस्ते ट्रम्प' इवेंट 24-25 फ़रवरी 2020 आयोजित हुआ।सरदार पटेल स्टेडियम अहमदाबाद गुजरात में सम्पन्न 2 दिवसीय कार्यक्रम में 1 लाख से अधिक लोगों ने भाग लिया।भारत में कम्युनिटी स्प्रेड तो यही से शुरु हो गया।समय रहते रोकथाम के लिए जरूरी उपाय नही किये गये।और जब भारत में कोरोना फैला तो सारी दुनिया की तरह काफी तेजी से फैला।देश की राजधानी दिल्ली में जब हडकंप मचा तो इस विकराल आपदा के समय भी गंदी राजनीति का खेल खेला गया और 1-21मार्च 2020 के बीच निजामुद्दीन औलिया की मजार पर आयोजित हो रही तब्लीग जमात के सालाना अन्तर्राष्ट्रिय कॉन्फ़्रेस पर प्रशासनिक नाकामियों का ठीकरा फोड़ दिया।पूरी समस्या का दोष एक समुदाय विशेष पर थोप कर मीडिया ट्रायल में खलनायक,देशद्रोही और ना जाने क्या क्या साबित कर दिया।

               🙏'नमस्ते ट्रम्प' के ठीक एक माह बाद 24 मार्च 2020 को भारत सरकार ने 21 दिनॉ का प्रथम लॉक डाउन घोषित कर दिया।इसके पहले प्रधानमंत्री के आह्वान पर 22 मार्च को जनता कर्फ़्यू सेलेब्रेट किया गया।इसी दिन शाम को 5 बजे कोरोना के खिलाफ 'महान एतेहासिक' युद्धघोष किय गया 5 मिनट तक पुरे देश में घर-घर ताली-थाली,घंटा-घंटी बजाकर।प्रधानमंत्री ने कहा था कि कोरोना योद्धाओं के सम्मान में घरों की छत, बालकनी,बरामदे,विण्डो पर खड़े होकर ठीक 5 pm पर 5 मिनट के लिए ताली,थाली,घंटी,ड्रम आदि बजाये।यहां तक तो ठीक था पर पर कुछ तथाकथित वैज्ञानिकों ने ध्वनि के अनुनाद,मन्त्र चिकित्सा,विषाणुओं पर इनके प्रभाव इत्यादि को लेकर इस आयोजन के समर्थन में जबर्दस्त वैज्ञानिक एंगल खोज निकाला।इनमे प्रमुख थे IIT व BHU में काम करने वाले प्रो0 बी0एन0 द्विवेदी (भौतिकी) और इलाहाबाद केन्द्रीय विश्वविद्यालय के प्रो0 के0 एन0 उत्तम(भौतिकी)।इनके अनुसार घंटा-घंटी बजाने से वातावरण में कम्पन उत्पन्न होता है जो काफी दूर तक जाता है।इस कम्पन का फायदा यह है कि इसके क्षेत्र में आने वाले सभी जीवाणु,विषाणु और सूक्ष्म जीव आदि नष्ट हो जाते हैं,जिससे आसपास का वातावरण शुद्ध हो जाता है।मेरा तो विचार है कि भारत सरकार के विज्ञान एवम् प्रोद्योगिकी विभाग को इस 'मौलिक अनुसंधान ' के लिए इन वैज्ञानिकों को सम्मानित करते हुए नोबल पुरस्कार के लिए नामित करना चाहिए।कुछ लोगों का कहना है कि PM मोदी जी भी 'अविष्कार' करते रहे हैं।उदहारण के लिए गंदे नाले/गटर की गैस का ईंधन के रूप में इस्तेमाल कर चाय बनाने का मॉड्यूल।

                                     ⚓  लॉकडाउन 1 जो 25मार्च से 14 अप्रैल तक चला आपातकल के साथ कर्फ्यू का भी एहसास आम जनता को करा गया।इसी दरम्यान 5 अप्रैल को फिर PM  को कुछ करने का मन हुआ।'मन की बात' तो वे वैसे भी करते रहते हैं।टेलीविज़न पर प्रकट हुए और जनता से उनके 9 मिनट 9 बजे रात से माँग लिए। पूरे देश में 9 मिनट के लिए बिजली गुल कर के टॉर्च,मोमबत्तियाँ,चिराग,दीपक,मोबाईल से बालकनी,छत,घरों के दरवाज़े,खिड़कियो पर खड़े होकर रोशनी फैलाने की कोशिश की गई ।चैत महीन में दीवाली मना ली गई,वो भी भयानक आपदा,दुख और संकट की घड़ी में! सीता-राम-लक्ष्मण के वनवास पूर्ण कर अयोध्या लौटने की खुशी में मनायी गयी दीवाली को लोग हर साल कार्तिक माह की अमावस्या को परम्परा के रूप में सेलिब्रेट करते रहे हैं।इस लिहाज़ से देखा जाए तो मोदी जी ने अपने इस कार्य से क्रांतिकारी संदेश दिया है।परम्पराओ के नाम पर फिजूलखर्ची  नहीं करनी चाहिए और दुख,निराशा,भय के माहौल में नवीन साहस व उत्साह के सृजन हेतु 9 मिनट वाली दीवाली मनानी चाहिए । मगर अफसोस कि देश समझदार नही निकला।फिजुल्खर्ची बदस्तूर जारी है।फिर मोदी जी ने सोचा- ना रहेगा बांस,न  बजेगी बाँसुरी ।लॉकडाउन 1 से 4 तक 68 दिन और अन्लॉक 1 से 4 अबतक 102 दिन यानि कुल 170 दिन(6 महीने में 10 दिन कम ) ज्यादातर लोगों की कमाई शिफ्फर और जिन्दा रहने को खर्च पूरा होने के कारण जेबेँ खाली हो गई।लो अब कर लो फिजुल्खर्ची!!अगस्त माह में GDP पहली बार निगेटिव हुई।आज यह --23•9%तक गिर गई है।ये तो हालत की एक झलक मात्र है,ट्रेलर है।पिक्चर अभी बाकी है मेरे दोस्त।

कोरोना से कैसे बचें

कोरोना एक वायरसजन्य संक्रमणीय बीमारी है जिसे डब्ल्यू एच ओ (विश्व स्वास्थ्य संगठन) और विभिन्न देशों की स्वास्थ्य नियामक इकाइयों ने महामारी (epidemic) घोषित किया है और मजे की बात यह है कि  WHO की वेबसाइट पर पहले से दी गई 'महामारी' की परिभाषा के अनुसार यह महामारी है हीं नहीं। भारत में महामारी की आड़ में आपातकालीन विशेष प्रावधानों से युक्त एक प्रकार की 'इमरजेन्सी' लागू कर दी गई और नाम दिया गया 'लाकडाऊन'।पुलिस के बल बूते ऐसे प्रोटोकॉल लागू किये गये जिनसे अफरा तफरी, दहशत और प्रबल असुरक्षा का माहौल क्रिएट हो गया। करोड़ों लोगों को अपने रोजी-रोजगार छोड़ कर हजारों किलोमीटर पैदल, साईकिल, छोटी गाड़ियों से भूखे-प्यासे अपने मूल निवास स्थानों  की तरफ माइग्रेट करना पड़ा। 

नतीजा :- हजारों आदमी बीमारी के बजाय दुर्घटनाओं, विषम परिस्थितियों और हृदयहीन शासन के हाथों अपनी जान गवां बैठे। 

 ICMR द्वारा बताया गया कि जबतक प्रभावी वैक्सीन उपलब्ध नहीं हो जाता, तबतक वायरस के प्रसार और संक्रमण को रोकने के लिए निम्न गाइडलाइन का पूरी निष्ठा से पालन किया जाना जरूरी है - ● भौतिक दूरी/सोशल डिस्टेन्सिङ्ग(2गज की दूरी)

●कार्यस्थलो व जनसंकुल जगहों पर नाक-मुंह को ढकने वाले मास्को का प्रयोग 

●साबुन से हाथ धोना,हेन्डिन रब,सैनेटाईजर का उपयोग 

● चबाने योग्य धुआंरहित तम्बाकू के सेवन से और जहाँ तहाँ रूकने से बचना बहुत जरूरी है। 

●संतुलित आहार, शारीरिक सक्रियता, व्यायाम भी अत्यंत आवश्यक है। 

इन उपायों में से व्यक्ति से व्यक्ति की दूरी कम से कम 2 गज बनाए रखना पूरी तरह से वैज्ञानिक व व्यवहारिक है। साबुन से हाथ भी जरूरी है जब आप वायरस के संभावित स्रोत/सतह को छूते हैं। ये संभावित स्रोत करेन्सी नोट,सिक्के, दरवाजे के हैन्डल,बस,ट्रेन, ऑटो के पकडने योग्य हिस्से, दुकानों के काउंटर इत्यादि हो सकते हैं। यद्यपि मास्क के छिद्रों का आकार और वायरस का आकार कुछ इस अनुपत में होता है कि वायरस के लिए कोई रोक-टोक नहीं है। अर्थात मास्क व्यवहारिक रूप से बहुत कारगर निरोधक नहीं है ।उल्टे मंद सांस, दमा,खाँसी, क्रोनिक ब्रोन्को-न्यूमोनिया, हृदयरोग वाले लोगों के लिए कष्ट बढाने वाले साबित होते हैं। बावजूद इसके पुलिस का एकमात्र लक्ष्य बिना मास्क वाले लोगों को डंडे मारकर 'कोरोना वारियर' का तमगा हासिल करना रहता है। यानि मास्क कोरोना से बचाए या न बचाए, पुलिस के डंडे से जरूर बचा सकती है। 

           अंत में इतना जरूर कहना है कि मीडिया, सोशल मीडिया से पढ-सुनकर तथाकथित प्रतिरोधक/प्रतिषेध दवाओं का सेवन बिलकुल न करें। कोविड-19 से बचने के इतने ही उपाय सामान्यतः काफी हैं। अधिक व अद्यतन जानकारियों से लिए हमारे साथ बने रहें और ब्लॉग को सब्सक्राइब करें। कोरोना,सोशल डिस्टेन्सिङ्ग



E. Coli infection and its Homeopathic solutions

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