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जून माह में किये जाने वाले कृषि कार्य

 जून माह भारतीय पंचांग के अनुसार प्रायः ज्येष्ठ आषाढ़ के महीनों के मध्य आता हैं।इसी समय मॉनसून भी दस्तक देता है।इस वर्ष यानि 2021ई० में 3 जून को केरल और 10-12जून तक शेष भारत में मॉनसून का आगमन हो चुका हैं।और अच्छी खासी बारिस के आसार नजर आ रहे हैं।जमीन और हवा में काफी नमी है जो धान के बीज गिराने और विभिन्न खरीफ फसलों की बुआई के लिए उपयुक्त स्थिति हैं। 

कृषि क्षेत्र की एक सच्चाई जिसे अक्सर किसान भाई भूल जाते हैं,वो हैं-"किसान की मर्जी से मौसम नहीं बदलता,पर वे मौसम के अनुरूप खेती कर सकते हैं।"    

यदि उपरोक्त सूत्र वाक्य का मर्म समझ लें तो खेती लाभ का धंधा बन सकता हैं।मोटे तौर पर ज्यादातर लोग रूटीन खेती करते हैं और मौसम की 'गुगली' में फंस जाते हैं।खरीफ या जायद फसलों के लिहाज से मौसम तीन विकल्पों क्रमशः-बाढ़,सुखाड़ और संतुलित वर्षा में से एक ही उपलब्ध कराती हैं।इसलिए अपनी जमीन की प्रकृति,किस्म और आगामी मौसम पूर्वानुमान के अनुरूप फसल का चुनाव करें और स्मार्ट किसान बनें।आगे हम जानेंगे इस माह के कृषि कार्यो में से उन मुख्य कार्यो के बारे में,जो इस वर्ष की संभावित बरसात की मात्रा के अनुरूप हैं।

1.‌ अनाज की खेती:-


(i)धान - चावल जो पूरे एशिया और खास तौर पर भारत में भोजन का सबसे प्रमुख  घटक हैं,धान से ही प्राप्त होता हैं।इसकी इतनी ज्यादा प्रजातियाँ हैं कि सबकी चर्चा की जाए तो महाग्रंथ बन जाए। भारत में मुख्यतः ये धान के खेत हैं -- पर्वतीय-पठारी भागों के सीढ़ीदार खेत,मैदानी भागों के सामान्य,मध्यम,नीची और गहरी जमीन।इन में से गहरे जल जमाव वाली भूमि में सामान्यतः फरवरी से अप्रैल तक ही मूंग  और धान  की मिश्रित बोआई की जाती हैं,फिर वर्षा जल के जमाव से मूंग सूख कर सड़ जाती है और जैविक खाद की तरह उर्वरा शक्ति वढ़ाती हैं।धान जल स्तर के अनुरूप बढ़ता जाता हैं।इसके परंपरागत  किस्में  जागर,पाखर,जेसरिया ईत्यादि हैं जबकि उन्नत प्रभेद जानकी और सुधा हैं।शेष चारों भूमि में धान सीधी बुआई के बजाए नर्सरी तैयार कर बिचड़े कीचड़ में रोपने की विधि से लगाई जाती हैं।अभी नर्सरी में धान के बीज बोने का उपयुक्त समय हैं।बीज बोने के25 दिन बाद पौधे उखाड़ कर अच्छी तरह जुताई कर कीचड़(mud) बनाये गये खेत में रोप सकते हैं।रोपन के पूर्व फास्फेट की पूरी मात्रा पोटाश की आधी मात्रा और नाइट्रोजन की एक चौथाई मात्रा का प्रयोग करें।

(ii) मक्का - खरीफ मक्का की  खेती/बुआई साफ मौसम देख कर कर लें।फफून्दनाशी से बीजोपचार करना न भूलें।

(iii)मरूआ या रागी - खरीफ मरूआ की रोपाई जून में पूरा कर लें।गरमा मरूआ यदि रोपा हैं तो उपरिवेशन कर लें।यह सबसे अधिक फायदेमंद मोटा अनाज (millet)हैं।इसका हलवा और रोटी बनाई जाती हैं जो अत्यंत पौष्टिक व शक्तिवर्धक  खाद्य पदार्थ हैं।

(iv)ज्वार - बाजरे की बुआई भी जून माह में ही की जाती हैं।बिहार के आरा - बक्सर पूर्वी उत्तरप्रदेश,राजस्थान,मध्यप्रदेश में इसकी खेती  होती हैं।कम वर्षा वाले क्षेत्रों में अपेक्षाकृत  ऊँची भूमि में मोटे अनाज एवं पशुओं के चारे के लिए इन्हे उपजाया जाता है।

2. दलहन की खेती :- जून माह में मुख्यतः दो दलहन फसलें बोई जाती हैं।


अरहर+उड़द,अरहर+मक्का,उड़द+मक्का,अरहर+मरूआ,अरहर+मूँगफली,अरहर+मिश्रीकन्द,अरहर+साँवा।अरहर(pigeon pea)उच्च कोटि की दलहन प्रजाति हैं,जिसमें 21-26% तक प्रोटीन पायी जाती हैं।यह पूरे भारतवर्ष में लोकप्रिय हैं और कई  नामो से जाना जाता हैं;जैसे - तुअर,तूर,रहरी,अरहर,आदि।लिन्नियस नामकरण पद्घति के अनुसार इसे Cajanus cajan या Cajanus indicus कहते हैं। यह एक लम्बी अवधि की फसल है जो खेत में 9 महीने रंडरहती है। शुद्ध अरहर की फसल उगाने के लिए प्रति हेक्टेयर 20 कि०ग्रा० बीज की जरूरत होती है।मिश्रित खेती के लिए 15 कि०ग्रा० बीज पर्याप्त है।अकेले उत्तरप्रदेश में 30 लाख एकड़ से अधिक क्षेत्र में इसकी खेती होती है।उन्नत प्रभेद - प्रभात,बिहार,लक्ष्मी,BR-65,मालवीय अरहर-151उरद के उन्नत प्रभेद-T-9को जून-जलाई में बो सकते हैं।

3. तिलहन- खरीफ फसल में तिलहन के की विकल्प हैं।-तिल,सूरजमुखी,मूँगफली,एरंड/अंडी।अंडी एक अखाद्य तिलहन फसल हैं और इसकी बुआई जुलाई-अगस्त  में होती हैं।जबकि तिल,मूँगफली,सूरजमुखी खाद्य श्रेणी के तिलहन हैंऔर 15 जून से 15जुलाई के बीच बोए जा सकते हैं।मूँगफली  के लिए ऊँची,ह्लकी दोमर मिट्टी उपयुक्त हैं।तिल के लिए भी ऊँची जमीन  चाहिए  जिसमें जल जमाव न हो।कमोवेश सूर्यमुखी भी जल जमाव को बर्दाश्त  नहीं कर पाती हैं।

4. कन्दवर्गीय फसलें:-अदरक व हल्दी रोपने का समय मई तक ही हैं जो बीत चुका हैं।ओल की अगैती बुआई मार्च-अप्रैल  में हो चुकी हैं किन्तु मुख्य फसल जून माह में ही रोपाई जाती हैं।विस्तृत  जानकारी के लिए निम्नांकित  लिंक को क्लिक करें : ओल की खेती 

 खरीफ  अरबी मई-जून में ही रोपी जाती हैं,जबकि इसकी वसंतकालीन रोपाई फरवरी में होती हैं।12-15 क्विंटल प्रति हेक्टेयर बीज लगता हैंऔर उपज 80-100 क्विंटल तक होती हैं इसके कन्द के अलावा पत्तों की भी सब्जी बहुत स्वादिष्ट  होती हैं।130-140दिन में फसल खोदने के लिये तैयार हो जाती हैं।अच्छी कमाई के लिए  इसका खेती कर सकते हैं।जून के अंत से जुलाई भर मिश्रीकन्द  यानि केसऊर की खेती कर सकती हैं।सितम्बर  अरहर के साथ इसकी मिश्रित खेती सितम्बर माह में भी कर सकते हैं।जून- जुलाई में बोने पर बीज 15-20kg/hectare और अगस्त  में 30-40 kg/hectare और सितम्बर  में 50-60kg/hectare की दर से लगता हैं।जून-जुलाई में इसे मकई और अरहर के साथ भी लगा कर सकते हैं।मिश्रीकन्द की खेती के विशेष इच्छुक हैं तो कमेंट सेक्शन में लिखें।इस पर विस्तृत  एवं अनुभव सिद्ध तथ्यों से परिपूर्ण लेख उपलब्ध कराया जाएगा।

5. बरसाती सब्जियों की खेती :-ज्यादातर बरसाती सब्जियाँ गरमा और बरसाती दोनों रूपों में उगाई जाती हैं,जिसमें बैगन,भिण्डी,लौकी,खीरा,घिनौनी,करेला,नेनुआ,बोदी,पेठा और मिर्च प्रमुख हैं।इनमें से भिण्डी को छोड़कर शेष सभी के लिए थोड़ा सा जल जमाव  भी अत्यंत घातक हैं।इस तथ्य को ध्यान में रख कर ही उपयुक्त भूमि में इन फसलों को लगाए।ये सारी सब्जियाँ टेरेस गार्डन,लाॅन या बैकयार्ड किचन गार्डन के लिए भी बहुत उपयुक्त  हैं।


फूलगोभी(Cauliflower): जून माह में अगैती (early)प्रभेद का बीज नर्सरी में बोया जाता हैं।बिहार में प्रचलित नस्लें हैं-पटना अर्ली,पूसा कतकी,कुँआरी ।इनके अलावा कुछ  हाईब्रिड  नस्लें भी उपलब्ध हैं।छोटे स्तर पर गमलों में भी बीज बोया जा सकता हैं।बरसाती मौसम में उगते ही बेवकूफ की तरह लम्बे होकर मुरझाते हुए मर जाने की बीमारी अक्सर  अगात फूलगोभी की नर्सरी में पाई जाती हैं।इसके निराकरण  हेतु streptocycline नामक antibiotic दवा का प्रयोग  बीजोपचार तथा उगते के बाद स्प्रे के रूप में भी करना चाहिए।600-700  ग्राम बीज लगता हैं। यह उच्च लाभ देने वाली फसल हैं किन्तु विशेष देखभाल  की जरूरत पड़ती हैं।

 


बैंगन
(Egg plant/Brinjal):बैगन की मुख्य फसल हेतु जून महीने के अंत तक पौधशाला में बीजाई कर देनी चाहिए।वैसे 15  जुलाई तक भी कर सकते हैं।बैंगन की खेती पर विस्तृत व पूर्ण जानकारी के लिए alongwithroots.blogspot.com पर विजिट करते रहें।(शीघ्रप्रकाश्य)।

भिण्डी(Okra/Lady finger): बरसाती भिण्डी की बोआई  जून से जुलाई तक कर सकते हैं।एक हेक्टेयर क्षेत्रफल में 8-10 kg बीज लगता है।कतार से कतार की दूरी 50 सेमी और कतार में पौधे से पौधे की दूरी 40 सेमी रखें।

लौकी(Gourd): जून-जुलाई  में रोपी जाने वाली बरसाती लौकी नवंबर-दिसंबर तक फल देती है।खेतों में लगाने के लिए ऊँचे थाले बनाए जिनमें पहले से 2-3 kg सड़ी गोबर की खाद या वर्मी कम्पोस्ट के साथ 20 ग्राम यूरिया,25 ग्राम पोटाश  और 100 ग्राम सिंगल सुपर फास्फेट प्रति थाला मिला लें और तीन बीज  प्रत्येक में रोपें।गमलों या ग्रो बैग में  भी इसी प्रकार  रोप सकते हैं।मचान बनाना जरूरी हैं।


नेनुआ/घिउरा(Sweet Gourd/SpongeGourd)  :इसे बरसात में जुलाई महीने में 2m×1.5m की दूरी पर ऊँची बेड बना कर रोपते हैं।खाद एवं उर्वरक लौकी के समान प्रयोग  करें।यदि 1m चौड़ी व 20cm ऊँचे बेड बना कर रोपें तो बिना मचान बनाए भी उपज ले सकते हैं किन्तु मचान पर फलों की गुणवत्ता और उत्पादकता बढ़ जाती हैं।



तोरई/झिगुनी(RidgeGourd):जून-जलाई  माह में एकल या मिश्रित फसल के रूप में इसे लगाया जाता हैं।( गरमा तोरई फरवरी- मार्च में रोपी जाती हैं।) अरहर+मकई+ तोरई एक प्रचलित  फसल संयोजन हैं।एकल फसल के रूप में नेनुआ की तरह ही बेड बनाकर रोप सकते हैं।मचान बनाकर लताओं को उन पर फैलने दें।इससे उपज की मात्रा एवं गुणवत्ता बढ़ जाती हैं।खाद एवं उर्वरक की मात्रा कद्दू से आधी कर दें।उन्नत प्रभेद पंजाब सदाबहार,पूसा नसदार,सतपुतिया,PKM1,कोयम्बटूर-2 इत्यादि।

 खीरा(Cucumber): बरसाती खीरे की खेती 50 सेमी चौड़ी,20 सेमी ऊँची बेड व 50 सेमी चौड़ी नाली के अंतराल बनाकर 50-50 सेमी की दूरी पर 3-3 बीज रोपते हुए करें।खाद एवं उर्वरक का प्रयोग जुताई के समय ही कर दें।यह सावन-भादो के महीने में फल देता है।इस दौरान सामान्य माँग के अतिरिक्त व्रत-त्योहारों की भरमार होने से अत्यधिक माँग उत्पन्न हो जाती है जिससे मूल्य ज्यादा मिलता है।

करेला (BitterGourd): जून-जुलाई में मुख्यतः दो प्रकार के करेले रोपे जाते हैं - बारहमासी और हाईब्रिड। पुरानी भदई नस्लें अब लुप्तप्राय हैं।इसकी लताएँ जमीन पर फैल कर फल नही देती।मचान बनाकर ही उपज ले सकते हैं। कीटनाशक एवं फफून्दनाशी का आवश्यकतानुसार उपयोग करना पड़ता है। 

बरबटी/बोदी/बोरो(Long Beans): बोने का समय - जून से जुलाई तक। उन्नत प्रभेद - पूसा बरसाती,पूसा दोफसली, पूसा ऋतुराज। पौधे से पौधे की दूरी 15 सेमी,कतार से कतार की दूरी 25 सेमी। खाद एवं उर्वरक - कम्पोस्ट 4 क्विंटल/कट्ठा, यूरिया 1.4 kg/कट्ठा, म्यूरेट ऑफ पोटाश 1.5 kg/कट्ठा और सिंगल सुपर फास्फेट 5 kg/कट्ठा। (1 कट्ठा=1760 वर्ग फीट)

6. बागवानी : - आम,अमरूद, लीची,केला, नींबु, नारियल के पौधे लगाने का सबसे अधिक उपयुक्त समय 15 जून से 31 जुलाई तक है।यदि अप्रैल माह में गड्ढे खोदकर तैयार कर लिए गए हैं तो रोपने से 10-12 दिन पूर्व खाद-उर्वरक और मिट्टी का मिश्रण भरकर दबा दें।

7. वानिकी  : - गम्हार, जल गम्हार,बकाईन, करंज, बबूल, खैर के बीज पौधशाला में लगायें।

कोरोना मरीज की देखभाल होम आइसोलेशन में कैसे करें



 पिछले आलेख में आपने जाना कि होम आइसोलेशन का पालन करते हुए घर में किस प्रकार रहे। रहन-सहन,संयम-नियम,आहार और मानसिकता के संदर्भ में यथा सम्भव संक्षिप्त व सटीक विश्लेषण प्रस्तुत किया गया। दवाओं के दुष्प्रभाव और उनके सेवन से बढने वाली मृत्यु दर को देखते हुए इस नये आलेख के सृजन की आवश्यकता महसूस हुई। 

■ यद्यपि विभिन्न प्रान्तों की सरकारें संक्रमण दर में गिरावट के आंकड़े पेश कर रही हैं जैसे बिहार में मात्र 3.11%  बताया गया है तथापि वास्तविक स्थिति कुछ और ही है। इसीलिए लाकडाऊन बढाने की चर्चा सत्ता के गलियारों में चल रही है। दूसरी तरफ म्यूकर माइकोसिस (ब्लैक फंगस) को भी 22 मई को महामारी अधिनियम 1897 के तहत पैन्डेमिक घोषित कर दिया गया है। इसके मामले न केवल शहरों में बल्कि गावों में भी समान रूप से उजागर हो रहे हैं। अब इसकी मानिटरिंग एकीकृत रोग निगरानी कार्यक्रम ( ISDP) द्वारा की जायेगी। 

■ इसी क्रम में एक दूसरा कोरोना follow up रोग उभरने लगा है,जिसे व्हाइट फंगस कहा जा रहा है। इसका भी मूल कारण कमजोर इम्यूनिटी या कोरोना से कमजोर हुई इम्यूनिटी बताया गया है। वास्तव में यह एस्पर्जिलस जीनस के सैकड़ों फफून्दो(moulds) में से एक का संक्रमण है। डाक्टर लोग इस रोग को एस्पर्जिलोसिस भी कह रहे हैं और कम घातक बताते है। इसके लक्षणों में सबसे प्रमुख है शरीर, जीभ,मुँह पर सफेद चकत्ते उभरना।ब्लैक फंगस जहाँ शरीर के अंदरूनी हिस्से को रुग्ण करता है वहीं व्हाइट फंगस सामान्यतः शरीर के बाहरी हिस्से को प्रभावित करता है। ब्लैक फंगस के इलाज में सर्जरी की आवश्यकता पड सकती है मगर व्हाइट फंगस के इलाज में सर्जरी की आवश्यकता नहीं पड़ती। 

■ एक रोचक तथ्य : संसार के कुल साइट्रिक एसिड उत्पादन का 99% हिस्सा केवल एस्पर्जिलस नाइजर नामक फंगस के द्वारा होता है। केवल 1% उत्पादन नींबू और नींबू वर्गीय(citrus) फलों से होता है। 

■ एक कटु सत्य : आज जो भी महामारी इत्यादि फैल रही है वह मनुष्य द्वारा प्रकृति के साथ की जाने वाली स्वार्थपूर्ण छेडछाड का नतीजा है। 

■ कोरोना सीज़न-1यानि वर्ष 2020 में सोशल मीडिया और व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी के लाइफ टाईम स्टूडेंट्स द्वारा वायरल तथाकथित प्रतिरोधक या होम्योपैथिक वैक्सीन आर्सेनिक था। यह सीज़न-2 में भी वायरल है। यह सब देखकर स्वर्गीय हैनीमैन साहब की आत्मा जरूर रो रही होगी। यह एक गलत सलाह है ।इसके चक्कर में न पड़ें। 

■  होम आइसोलेशन का पालन करते हुए भी स्वच्छता का ध्यान रखें। कमरा, कपड़े, शरीर और खाना-पानी की स्वच्छता का विशेष रूप से ख्याल रखा जाना चाहिए। 

■ कोरोना सीज़न-2 में एस्पिडोस्पर्मा-Q का प्रचार चल रहा है। लोग 60-60 मिली की 4-4,5-5 शीशियाँ खरीद कर स्टाक कर रहे हैं। कालाबाजारी हो रही है,जिस प्रकार ऑक्सीजन सिलेंडर की होती है। दरअसल जिस कोरोना रोगी को सांस लेने में तकलीफ हो,ऑक्सीजन लेवल कम हो गया हो और तत्काल ऑक्सीजन सिलेंडर उपलब्ध न हो तो एस्पिडोस्पर्मा के सेवन से फायदा होता है। यह सांस में खींची गई हवा में से अपनी जरूरत के अनुसार ऑक्सीजन अवशोषित करने की क्षमता को बढ़ाने का काम करती है। इससे रक्त में ऑक्सीजन की मात्रा बढ़ जाती है और रोगी का हाँफना व सांस के लिए छटपटाना बंद हो जाता है। यह एक प्राण रक्षक औषधि है, स्थायी समाधान नहीं। स्थायी समाधान पाना है तो योग्य होम्योपैथ से सम्पर्क कर सकते हैं। 

■ एलोपैथिक पद्धति में अबतक कोरोना या कोविड19 की कोई सटीक (appropriate) दवा नहीं है। यह एक अकाट्य सत्य है। जो कुछ भी इलाज अस्पतालों में किया जा रहा है वह रोग के बजाय अलग-अलग लक्षणों का इलाज है। नतीजा लाखों रुपये खर्च करने के बाद भी जिन्दगी से हाथ धो लेना।हम 2020 से ही रैमडेसीवीर जैसी दवाओं के निरर्थक प्रयोग और जानलेवा प्रभाव के बारे में लोगों को आगाह करते रहे हैं। देर से ही सही बिहार सरकार की आँखे खुली तो सही। पटना के कुछ बडे अस्पतालों की शिकायत पर सरकार ने रैमडेसीवीर दवा की जाँच के आदेश दे दिए हैं।




ऐसी ही सच्चाई बयां करने के बाद अगले ही दिन रामदेव जी को बयान वापस लेना पड़ा है। सुना है सरकार में  कोई मंत्री हैं डाक्टर हरसबरधन,उन्हें घोर आपत्ति है कि एलोपैथी की बेइज्जती हो गई। अरे भाई रोग तो लक्षण समूह से भी गहरी और उँची चीज है। दम है तो रोग का इलाज ढूँढो फिर अधिकारपूर्वक रोगी को घेर कर रखना। लक्षणों के अनुसार ही चिकित्सा करनी है तो क्या होम्योपैथी खराब है। यह तो सम्यक् लक्षणों के आधार पर चयनित दवा से आरोग्य करती है। 

■ याद रखें : 96°F - 98°F शारीरिक तापमान को बुखार नहीं समझा जाता है। यह नार्मल ताप है। 99°F से 100°F के  बीच हल्का ज्वर माना जाता है। इस स्थिति में डाक्टर लोग दिन में 2-3 बार पेरासिटामोल खिला रहे हैं। इस प्रिस्क्रीप्शन को हाई फीवर के लिए बचा कर रखिये, अगर जीवित रहने की चाह है। विश्वास कीजिए नये अनुसंधान कुछ ही दिनों में मेरी सलाह की पुष्टि करेंगे। 

■ अब हम चर्चा करेंगे उन होमियोपैथिक दवाओं की जो सेफ हैं। कोरोना मरीजों के यथार्थ लक्षण समुच्चय से सम्यक् रूप से मेल खाने वाली इन दवाओं का प्रयोग कर सफल चिकित्सा की गई है। 


(1) ब्रायोनिया एल्बा-30 : एक रिसर्च प्रोजेक्ट के तहत आगरा के डाक्टर प्रदीप गुप्ता ने 50 कोरोना पाजिटिव रोगियों को उनके common symptoms के आधार पर  केवल ब्रायोनिया देकर 3-5 दिन में चंगा कर दिया। मगर जरूरी नहीं कि हर रोगी इसी दवा से ठीक हो जाए। परिवर्तनशील लक्षणों के अनुसार अन्य दवाओं की भी जरूरत पड़ सकती है। बुखार आने से पहले नासा-रंध्र शुष्क लगे,छींक आये, गले में खराश या दर्द हो, फिर धीरे-धीरे शरीर का ताप बढ़े,खुली हवा की चाह,हरकत से तकलीफ बढ़े और विश्राम से घटे तो ब्रायोनिया एल्बा की कुछ खुराकें देकर देखें। यह रोग को शान्त कर शरीर को राहत प्रदान करेगी। 

(2) बेलाडोना-30 : इसका प्रयोग तब करें जब आँखे  लाल,सिरदर्द, आँखों से पानी आना,तेज बुखार, जलन,मुँह-गला सूखने पर पानी पीने से घृणा, प्रकाश-शोर-स्पर्श से घृणा, सूखी खाँसी, डिसेन्ट्री इत्यादि लक्षणों का समूह मिले।4-4 घंटे पर एक बूँद दे सकते हैं। 



(3) इपिकाक-30 : उल्टियाँ, जी मिचलाना, सिरदर्द, बुखार, जीभ लाल या साफ,फेफड़ों में बलगम जमा हो और न निकलता हो,सुखी खाँसी हो तब इपिकाक-30 सुबह-शाम दो-तीन दिन तक सेवन करायें। 

(4) मैग्नीशिया म्योर-6 : मुँह-गला सूखता हो,नाक बंद या पनीला स्राव,गंधलोप, स्वादलोप, जुकाम के जैसे अन्य लक्षण, श्वास लेने में परेशानी, मुँह से सांस लेना पडता हो,भूख कम या बिलकुल न लगे,सूखी खाँसी, रात में लक्षण वृद्धि, छाती में दर्द, जलन,पीठ-नितम्बों और बाहों में अंदर की तरफ खीचने जैसा दर्द हो तो मैग म्यूर-6 हर 4 घंटे पर सेवन करायें। शर्तिया लाभ होगा। इसके अलावा भी बहुत सी दवाएं हैं जो लक्षणों के अनुसार अनुभवी चिकित्सकों द्वारा प्रयुक्त की जा सकतीं हैं। 

ऑनलाइन अर्निन्ग ऐप और यूट्यूब

 आजकल यूट्यूब पर ढेरों ऐसे चैनल ट्रेन्ड कर रहे हैं जो दावा करते हैं कि ऑनलाइन लघु  अर्निन्ग के 100% जेनुइन और कारगर ट्युटोरियल प्रोवाइड कर रहे हैं। इनके वीडियो देख कर मन में एक सवाल उठा कि क्या वाकई खाली समय में मोबाईल से इसप्रकार कमाई की जा सकती है?फिर हमने शुरू किया पड़ताल। 

             सबसे पहले तो ढेरों सब्स्कइबर वाले ऐसे तीन चैनल सब्स्क्राइब किए और इन पर उपलब्ध वीडियोज का अवलोकन किया। हर वीडियो में बिना किसी सीधे उपयोगिता सृजन के उटपटांग हरकतों से टाईमपास करते हुए रूपये और डालर कमाने की चर्चा थी।कुछ में पेमेन्ट प्रूफ की बात भी  की गई। किसी वीडियो का टाइटल होता है फलां ऐप से घर बैठे रोज़ कमाए 1500 रूपये  तो किसी का थंबनेल है-- विज्ञापन देखकर रोज 1200₹ कमाए। कोई कहता है $ में कमाई करें। 

                    दूसरे स्टेप में हमने ऐसी दो ऐप्स डाऊनलोड कर इन्स्टॉल की।रजिस्टर किया और जुट गये अर्निन्ग करने के प्रोसेस में। लाकडाऊन का समय था तो फ़ुरसत से कमाने की जुगाड़ में लग गए। सारे उपाय कर लिए पर एक-डेढ रूपये से अधिक न कमा पाया दिन भर में। उपर से तुर्रा यह कि कम से कम ••••••रूपये कमाने पर ही पेमेन्ट लगा सकते हैं। लगे हाथों बिना ऐप के डालर $ में कमाई कराने वाली तथाकथित साईट liteGPT.com की तहकीकात भी कर ली। एक सप्ताह की माथापच्ची के बाद हुई कमाई महज 0•13647$ ।इस प्रकार तथाकथित एच आर प्रोफेशनल्स,ऑनलाइन अर्निन्ग एजुकेटर्स और यूट्युबर्स के दावों की पोल खुल गयी। या साफ़ साफ़ कहें तो सारा खेल चैनल के व्यू,लाइक,कमेन्ट, सब्स्क्राइबर बढाने का है। इन्सानी फ़ितरत लालच का इस्तेमाल कर अपनी आमदनी बढाने का इससे अच्छा उदाहरण और क्या हो सकता है?

        यदि बगैर किसी स्किल के आप ऑनलाइन अर्निन्ग का ख्वाब देख रहे है तो ये बेहूदा खयाल ज़ेहन से निकाल फेकिए। 

              एक महत्वपूर्ण बात बात बताना तो भूल ही गया। ये सारे माइक्रो अर्निन्ग ऐप और साईटस कहीं न कहीं फिशिंग यानि इन्टरनेट फ्राड में भागीदार हैं या सहायक है। इनसे सावधान रहने की जरूरत है। मेरी इस सारी कवायद का परिणाम ये हुआ कि मेरा जी मेल अकाउंट हैक कर लिया गया। किसी Linux सिस्टम के द्वारा मेरे अकाउंट में साइन इन किया गया। यह बात जी मेल के सिक्योरिटी एलर्ट के माध्यम से पता चली। 

        

How to stay safe from Corona

 Corona is a viral communicable disease declared by the WHO (World Health Organization) and the health regulatory units of various countries as epidemic and, interestingly, the definition of 'epidemic' already given on the WHO website According to this it is not an epidemic. In the guise of an epidemic in India, a type of 'emergency' with special provisions was implemented and named 'Lakadoun'. With the help of police, such protocols were implemented which created an atmosphere of panic, panic and strong insecurity. Gone. Millions of people had to leave their livelihood and migrate thousands of kilometers on foot, bicycle, small trains to their native places thirsty.


Result: - Thousands of people lost their lives at the hands of accidents, odd conditions and heartless governance instead of disease.


 The ICMR stated that the following guidelines must be strictly followed to prevent the spread and infection of the virus until an effective vaccine is available - ● Physical distance / social distance (2 yards)


the use of chewable smokeless tobacco and stay where it is.

 Use of Moscow covering the nose and mouth at workplaces and public places


● Handwashing with soap, handin-rub, sanitizer use


● It is very important to avoid

● Balanced diet, physical activity, exercise is also very important.


Of these measures, maintaining at least 2 yards of distance from person to person is completely scientific and practical. Hands with soap are also necessary when you touch the potential source / surface of the virus. These possible sources could be currency notes, coins, door handles, buses, trains, handcuffs of autos, shop counters, etc. However, the shape of the mask and the size of the virus are somewhat similar in that there is no restriction to the virus. That is, the mask is not practically effective, and ulcers prove to be troublesome for people with slow breath, asthma, cough, chronic broncho-pneumonia, and heart disease. Despite this, the only goal of the police is to get the title of 'Corona Warrior' by killing people with no mask. That means, whether you can save the mask from corona or not, it can definitely protect it from police poles.


           In the end, it is definitely necessary to say that the media, after reading from the social media, should not consume so-called anti-prohibition / drugs at all. Similar measures to avoid Kovid-19 are generally enough. Stay tuned and subscribe to the blog for more and updated information. Corona, Social Distance

E. Coli infection and its Homeopathic solutions

 ई. कोलाई (E. coli) संक्रमण के लक्षण अलग-अलग हो सकते हैं, यह इस बात पर निर्भर करता है कि किस प्रकार का ई. कोलाई बैक्टीरिया संक्रमण कर रहा है...