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Celery in Hindi

सेलरी यानि अजमोद(Apium graveolens) भूमध्यसागरीय और मध्य पूर्व क्षेत्रों का मूल निवासी है। प्राचीन ग्रीस और रोम में इसके उपयोग का इतिहास मिलता है।आजकल यूरोप और अमेरिका में सब्जी सलादऔर सूप के रूप  में यह प्रचलित है।इसके पत्ते धनिया के पत्तों जैसे दिखते हैं किंतु इसके डंठल मांसल लंबे और विकसित होते हैं जबकि धनिया धनिया पत्ती के डंठल पतले और कमजोर होते हैं।स्वाद और सुगंध में भी यह धनिया से बिल्कुल अलग है।यह स्वाद में हल्का साल्टी और क्रंची होता है जबकि धनिया के पत्तों में तीखी विशिष्ट स्वाद और सुगंध होती है । भारत में भी अब कुछ पश्चिमी प्रभाव वाले क्षेत्र एवं ठंडे पर्वतीय स्थलों में इसे उपजाया और भोजन में शामिल किया जाने लगा है। भारत के हाई प्रोफाइल फैशनेबल लोग जिनकी पॉकेट में काफी पैसा है वह इसके संभावित ग्राहक हो सकते हैं। यानी सैलरी की खेती में अच्छी कमाई की जबरदस्त संभावना है।अभी बहुत लोग इससे परिचित भी नहीं है इसलिए अभी मौका है क्योंकि मोटी कमाई किसी काम में शुरुआत में ही होती है।इसका प्रचलन हो जाएगा तो मूल्य भी घट जाएगा।

                                  तो आईए जानते हैं इसकी खेती के तौर तरीके और फायदे : 

उपयुक्त परिस्थितियां

  1. ठंडा मौसम 

  2. हल्की क्षारीय मिट्टी जिसका pH मान 6 से 6.5 के बीच हो 

  3. मृदा में नमी हो किन्तु जल जमाव की संभावना नहीं रहे 

  4. जीवांश युक्त मृदा 

बीज 🙂 उच्च गुणवत्ता के अंकुरण सक्षम बीजों का प्रयोग करें। इसके लिए पहले तो स्थानीय विक्रेताओं से संपर्क करें। यदि न मिले तो किसी ऑनलाइन इ-कॉमर्स प्लेटफॉर्म से विश्वस्त सेलर देखकर खरीदें। केवल कीमत से कोई राय बनाने की बजाय उपभोक्ताओं के रिव्यू भी देखें।

नर्सरी : खूब अच्छी तरह तैयार नमी और ह्यूमसयुक्त मिटटी वाली नर्सरी बेड बनायें। सतह से 1/8 इंच गहराई में बीजों को बोयें। चूँकि इसके बीज बहुत छोटे होते हैं इसलिए ज्यादा गहराई में बोने पर उग नहीं पाएंगे। 

रोपण : जब नर्सरी में पौधे तीन-चार पत्तों के हो जाएँ तो इनका प्रत्यारोपण 12" अंतराल वाले कतारों में 8" - 8" दुरी पर करें। प्रत्यारोपण के दौरान प्रत्येक पौधे की हल्की सिंचाई अवश्य करें।

सिंचाई : 15 दिन बाद से आवश्यकतानुसार हलकी सिंचाई करें।

उपरिवेशन : प्रत्येक सिंचाई के बाद नाइट्रोजन युक्त  उर्वरक से उपरिवेशन करें।

मिट्टी चढ़ाना (healing) : सिंचाई और उपरिवेशन के 5 - 7 दिन बाद  निराई और पौधों की जड़ों के चारो और मिट्टी चढ़ाना जरुरी है। 

ब्लैंचिंग : कटाई से 2 - 3 सप्ताह पूर्व कागज से डंठलों को लपेट कर बांध दें। इससे सीधे प्रकाश से बचाव होगा और कोमलता बढ़ने के साथ कड़वाहट में कमी आएगी। 

कटाई (harvesting) : रोपण के 85 से लेकर 120 दिन बाद से कटाई की जा सकती है।  डंठल काटने के कुछ दिन बाद पुनः नए डंठल और पत्ते आ जाते हैं। इसलिए हार्वेस्टिंग अनेक बार की जा सकती है। 


भोजन में अजमोद (celery ) को शामिल करने के फायदे : 

हृदय को स्वस्थ रखने में सहायक 

पाचन तंत्र को मदद करता है। 

याद्दाश्त को बूस्ट करता है। 

सूजन कम करता है।  

वजन कम रखने में सहायक

रक्त शर्करा नियंत्रण में सहायक                                      


किसे नहीं लेना चाहिए : 

 इसमें ऑक्सेलेट्स पाए जाते हैं जो किडनी स्टोन एवं किडनी से सम्बंधित रोगों से पीड़ित लोगों के लिए उपयुक्त नहीं है।

Irritable Bowel Syndrome = IBS से पीड़ित लोगों के लिए भी यह ज्यादा उपयुक्त नहीं है।  

कुछ लोगों को इससे एलर्जी हो सकती है। जैसे छींके ,नाक बहना , मुँह और जीभ में खुजली इत्यादि। 



पालक घर पर उगाए

पालक एक पत्तेदार सब्जी है जिसे गमलों, बगीचों, बालकनियों, पिछवाड़े और छतों पर उगाया जा सकता है। यह एक बहुपयोगी सब्जी है जिसे सलाद में कच्चा भी परोसा जा सकता है या साइड डिश के रूप में पकाया जा सकता है।पालक-पनीर की लोकप्रियता से तो सभी वाकिफ हैं।



कहाँ उगायें? : गमला

- गमले: पालक अच्छी जल निकासी वाले गमलों और बर्तनों में अच्छी तरह से उगता है जिससे उसमें पानी का जमाव नहीं होता है। पालक लगाने का सबसे अच्छा समय पतझड़ या सर्दियों के महीनों में होता है जब मौसम बहुत गर्म नहीं होता है।

बीज कहाँ से लें?

स्थानीय बीज दुकान जो विश्वसनीय हों अथवा ऑनलाइन मर्चेंट से ले सकते हैं।यहाँ लें

उपयुक्त स्थान 

- गार्डन: पालक को बगीचों की सीमाओं पर अच्छी तरह से लगाया जाता है जहां सूरज की रोशनी और इसके बढ़ने के लिए जगह होती है। इसे काफी गहराई तक लगाने की जरूरत है ताकि इसके आसपास के अन्य पौधों द्वारा परेशान किए बिना इसके बढ़ने के लिए जगह हो।

- बालकनी: अगर आपके घर में जगह सीमित है तो पालक उगाने के लिए बालकनी एक बेहतरीन जगह है क्योंकि आमतौर पर ये काफी छोटी होती हैं। आपको अच्छी धूप प्रदान करने की आवश्यकता है और सुनिश्चित करें कि पौधों को फैलने और ठीक से बढ़ने के लिए पर्याप्त जगह है ताकि वे न हों

घर पर पालक उगाना मुश्किल नहीं है। आपको बस एक बर्तन, थोड़ी मिट्टी और थोड़ा पानी चाहिए।

स्टेप्स:

1) बर्तन को खाद मिट्टी और कोकोपिट से भरें और सुनिश्चित करें कि उसके बीच में एक जल निकासी छेद हो।

2) बीजों को गमले के अंदर डालें, उन्हें मिट्टी और पानी से अच्छी तरह ढक दें।

3) गमले को धूप वाली जगह पर या अपनी बालकनी या छत के ऊपर रखें

4) जैसे ही पालक बढ़ने लगे, इसे स्वस्थ रखने के लिए हर कुछ हफ्तों में खाद डालें और सिंचाई करें।

घर पर पालक उगाने का सबसे आसान तरीका है गमलों में।

पालक को गमलों में उगाने की सबसे अच्छी बात यह है कि आप इसे कहीं भी रख सकते हैं, यहां तक कि बालकनी या पिछवाड़े में भी। और तो और, अगर आपको पौधों को अपने किचन गार्डन में और अपने घर से दूर ले जाने की आवश्यकता है, तो यह काफी आसान काम भी होगा।

सबसे पहले, एक बर्तन चुनें और इसे मिट्टी से भर दें (जैविक खाद का उपयोग करना सबसे अच्छा है)। आकार की बात करें तो पालक के बीज के लिए 10-15 सेमी गहरा बर्तन ठीक रहेगा। बीजों को लगभग 5-6 सेंटीमीटर की दूरी पर रोपें क्योंकि इससे उन्हें अंकुरित होने पर बढ़ने के लिए जगह मिलेगी और फिर भी उनकी पत्तियों को फैलने के लिए पर्याप्त जगह मिल जाएगी। इस बात का ध्यान रखें कि उन्हें कितने पानी की जरूरत है और वाष्पित होने पर और मिलाते रहें।

 अगर आप ताजा पालक की अपनी फसल उगाना चाहते हैं, तो प्रक्रिया शुरू करने से पहले आपको कुछ चीजें जाननी होंगी।

पहली चीज़ जिसकी आपको आवश्यकता होगी वह है पालक उगाने के लिए एक कंटेनर। यह या तो एक बर्तन या मिट्टी के साथ एक उठा हुआ बिस्तर हो सकता है। आपको अपने कंटेनर में मिट्टी डालनी चाहिए और उसके कंटेनर के नीचे एक समान परत बनाने के लिए प्रतीक्षा करनी चाहिए। फिर आपको मिट्टी की परत के ऊपर कुछ खाद डालनी चाहिए और इसे तब तक मिलाना चाहिए जब तक कि यह आपके कंटेनर या उठी हुई क्यारी की सतह पर समान रूप से वितरित न हो जाए- यह आपके पौधों को बढ़ने के साथ पोषक तत्व प्रदान करेगा।

अंत में, आपको अपने बीजों को खाद की परत के ऊपर एक दूसरे से लगभग 2 इंच की दूरी पर छोटी पंक्तियों में लगाना होगा- सुनिश्चित करें कि प्रति वर्ग फुट में 3 से अधिक पंक्तियाँ नहीं हैं, ताकि यह एक दूसरे से अधिक न हो और उनका दम घुटो!

घर में सब्जियां उगाना एक संतुष्टिदायक अनुभव हो सकता है। लेकिन आपको इसके साथ आने वाली चुनौतियों के लिए तैयार रहने की जरूरत है। तो, आप अपना पालक कैसे उगाएंगे?

घर पर सब्जियां उगाने के दो विकल्प हैं: गमले में लगाना या सीधे मिट्टी में लगाना। सबसे अच्छा विकल्प आपकी जीवनशैली और आपके पास किस प्रकार की जगह उपलब्ध है, इस पर निर्भर करता है।

पालक उगाना अपेक्षाकृत आसान और सीधा है, लेकिन घर पर इसकी खेती करते समय कुछ बातों का ध्यान रखना चाहिए। पालक आमतौर पर बर्तनों में उगाए जाते हैं क्योंकि उन्हें बनाए रखना और इधर-उधर ले जाना आसान होता है।

पालक उगाना आसान है, आपको केवल यह जानने की जरूरत है कि क्या आवश्यकताएं हैं। इसका स्वाद मीठा, अखरोट जैसा होता है। इसे सलाद में, या टैकोस या सैंडविच के हिस्से के रूप में सबसे अच्छा खाया जाता है। आप इसे कुछ क्रंच के लिए सूप या चावल के व्यंजन में भी डाल सकते हैं।

घर पर सब्जियाँ उगाना कई तरीकों से और घर के आसपास कई सतहों पर किया जा सकता है जैसे बालकनी पर, आपकी डेस्क पर, कंटेनरों में या आपकी छत पर भी। आप अपने पौधों से क्या चाहते हैं इस पर निर्भर करता है कि आप उन्हें किस तरह से उगाना चाहते हैं!

पालक उगाने के लिए कुछ अच्छी जगहों में आपका किचन गार्डन शामिल है जहाँ उन्हें बहुत सारी रोशनी मिलेगी और साथ ही खाना पकाने के लिए पर्याप्त जगह होगी! पालक के लिए बालकनी भी सही है क्योंकि इसे सुबह की धूप और दोपहर की धूप मिलती है लेकिन हो सकता है कि शाम की धूप ज्यादा न मिले इसलिए इन्हें यहां लगाते समय इस बात का ध्यान रखें!

मिश्रीकंद की खेती


 


हिंदी भाषी क्षेत्रों में universally मिश्रीकंद और बिहार में केसवर/ केसऊर के नाम से प्रसिद्ध यह कंद मीठा, स्वादिष्ट और स्वास्थ्यवर्धक गुणों से भरपूर होता है। इसमें लो कैलोरी,फाइबर,मिनरल्स और एंटीऑक्सीडेंट प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं। अंग्रेजी भाषा में इसे मैक्सिकन याम बिन(Maxican yam been) कहां जाता है। जीव विज्ञान की भाषा में इसका नाम पैकीराईजस इरोसस (Pachyrhizus erosus) रखा गया है। 17 वी शताब्दी के पहले तक इसका नामोनिशान तक भारत में नहीं था। 'गजरा-केसऊर' वाले सरस्वती माता के भक्तों के लिए यह हार्ट ब्रेकिंग न्यूज़ है कि मिश्रीकंद भारत की मौलिक पैदाइश नहीं है। लगभग 3000 वर्षों से भी पहले से मेक्सिको और लैटिन अमेरिकी देशों में इसका उपयोग खाद्य पदार्थ के रूप में किए जाने के पुरातात्विक प्रमाण उपलब्ध है। 17 वी शताब्दी में कुछ स्पेनिश नाविको और व्यापारियों ने मिश्रीकंद के बीज फिलीपींस में लाकर लगाए और वहीं से धीरे-धीरे लगभग पूरे एशिया में फैल गया। इस प्रकार प्रायः 18 वीं सदी से मिश्रीकंद भारत में प्रचलित हुआ। और तब से पंडे पुजारियों ने सरस्वती माता की पूजा में इसे अनिवार्य प्रसाद अवयव के रूप में शामिल कर लिया। वर्तमान परिदृश्य में इसका व्यापारिक महत्व बढ़ गया है। कभी कौड़ियों के मोल बिकने वाला यह कंद आज बाजार में अच्छी कीमत पर बिकता है। यद्यपि खेती को प्रायः घाटे का सौदा कहा जाता है परंतु फायदे वाली कुछ गिनी चुनी फसलों में से मिश्रीकंद भी अपना महत्वपूर्ण स्थान रखती है। इस आलेख में इसकी खेती के सभी पहलुओं पर प्रकाश डाला जाएगा।

रोपने का उचित समय : 1 जुलाई से 15 सितंबर।

उपयुक्त भूमि : उपजाऊ दोमट एवं बलुई दोमट मिट्टी वाली भूमि मिश्रीकंद की खेती के लिए उपयुक्त मानी जाती है। ध्यान रहे जिस जमीन का चुनाव इसकी खेती के लिए कर रहे हैं उसमें जलजमाव की संभावना ना हो।

उन्नत प्रभेद : राजेंद्र मिश्रीकंद-1 और 2, इनके अतिरिक्त विभिन्न प्रचलित स्थानीय किस्में।

खेत की तैयारी : 200 क्विंटल प्रति हेक्टेयर की दर से कंपोस्ट डालकर गहरी जुताई करें। यह जुताई रोटावेटर से ना करें। 1 सप्ताह बाद दूसरी जोताई करें और पाटा मारकर समतल कर ले। यदि खरपतवार ना हो और मिट्टी हल्की एवं भुरभुरी हो जाए तो दो ही जुताई  काफी है अन्यथा तीसरी जुताई की भी जरूरत पड़ सकती है। अनुशंसित मात्रा में रासायनिक उर्वरक डालकर ही अंतिम जुताई करें।

बीज की मात्रा : जुलाई महीने की बुवाई में 15 से 20 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर की दर से लगाएं। अगस्त महीने में बोना है तो बीज की मात्रा बढ कर 30 से 40 किलोग्राम हो जाती है। वही सितंबर माह में रोपने के लिए 50 से 60 किलोग्राम बीज लगता है। यहां स्पष्ट करना जरूरी है कि अगात खेती में बीज कम लगने का मुख्य कारण फसल की समय अवधि अधिक होना है जिससे पौधों के विकास फैलाव और कल्ले निकलने के लिए पर्याप्त समय मिल जाता है। अगस्त सितंबर में बोने से समय कम मिलता है और कल्ले निकलने का पर्याप्त अवसर नहीं मिलता। इसी कमी की पूर्ति के लिए बीज की मात्रा बढ़ाई जाती है।

खाद एवं उर्वरक : यहां सभी मात्राएं एक हेक्टेयर खेती के लिए बताई जा रही हैं। कंपोस्ट 200 क्विंटल, सिंगल सुपर फास्फेट 2.5 क्विंटल, यूरिया 1.75 क्विंटल और म्यूरेट ऑफ पोटाश (एम ओ पी) 1.35 क्विंटल। इसमें से आधी मात्रा यूरिया की बुवाई के समय देनी है और आधी 40 से 50 दिन बाद।

रोपन योजना (Plantation plan) : एकल फसल के रूप में मिश्रीकंद को निम्न प्रकार से रोपा जाता है - जुलाई महीने में कतार से कतार और पौधे से पौधे की दूरी 30 सेंटीमीटर रखी जाती है। अगस्त महीने में कतार से कतार की दूरी 30 सेंटीमीटर और पौधे से पौधों की दूरी 15 सेंटीमीटर रखी जाती है जबकि सितंबर महीने की रोपाई में यह दूरी घटकर 15 * 15 सेंटीमीटर रह जाती है।

खरपतवार नियंत्रण : रोपाई के लगभग 30 दिन बाद निराई गुड़ाई करना जरूरी है। क्योंकि बरसात के कारण अवांछित खरपतवार जल्द ही निकल आते हैं और फसली पौधे को दबाने लगते है। निराई का दूसरा लाभ यह है कि मिट्टी की ऊपरी परत हल्की और वात रंध्र से परिपूर्ण हो जाती है। यदि पुनः घास उग आए तो 50 से 60 दिन बाद फिर से निराई गुड़ाई करें।


अन्य आवश्यक क्रियाकलाप : जब पुष्प कलियाँ निकलने लगे तो यथासंभव उन्हें तोड़ दे। फलियां लग जाएंगी तो कंद बनने की प्रक्रिया बाधित होगी और उपज तीन चौथाई घट जाएगी। किंतु यदि आपका फोकस बीज उत्पादन पर है तो आप पुष्पदंडों को बिल्कुल ना तोड़े और यथासंभव फलन को प्रेरित करने वाला हार्मोन दवा मीराकुलान स्प्रे करें। बड़े पैमाने पर कंद के लिए खेती कर रहे हैं तो हाथ से पुष्पदंड को तोड़ना आसान काम नहीं है। इसके लिए रासायनिक विधि का उपयोग अधिक सुविधाजनक है। ऑक्सीन श्रेणी के हार्मोन 2, 4-डी का छिड़काव करके भी अपेक्षित परिणाम प्राप्त कर सकते हैं। इसके 0.004 % सॉल्यूशन का उपयोग करें।

पादप संरक्षण : मिश्रीकंद की जड़ को छोड़कर अधिकांश हिस्से विषैले होते हैं इसलिए इसकी फसल पर कीट पतंगों का ज्यादा प्रभाव नहीं पड़ता है। किंतु फफूंद जनित बीमारी पत्र लांछन हो सकती है । इसके नियंत्रण के लिए इंडोफिल एम - 45 दो ग्राम प्रति लीटर पानी में घोलकर स्प्रे करें। एक हेक्टेयर में यह दवा लगभग 2 किलोग्राम लगती है। एक हेक्टेयर में 1000 लीटर पानी लगता है।

सिंचाई : आमतौर पर नवंबर महीने तक खेतों में पर्याप्त नमी रहती है किंतु दिसंबर से जनवरी के बीच सिंचाई की आवश्यकता पढ़ सकती है। जब खेत में मिट्टी सूख कर दरारें पड़ने लगे तो सिंचाई कर दें अन्यथा कंद फटने लगते हैं और उपज में भी कमी आ जाती है। किंतु ध्यान रहे कहीं जलजमाव ना हो।

                       एकल फसल के अलावा मिश्रीकंद की खेती मिश्रित फसल के रूप में भी सफलतापूर्वक की जाती है। कुछ प्रचलित कंबीनेशन निम्नलिखित हैं - मिश्रीकंद + तुवर, मिश्रीकंद + मकई ,मिश्रीकंद + मकई+ अरहर।

लागत : जोताई बीज खाद उर्वरक लेबर कंपोनेंट पेस्टिसाइड्स सिंचाई इत्यादि के ऊपर मुख्य रूप से खर्च होता है जो इस प्रकार है :

          जुताई - ₹1,500

खाद एवं उर्वरक - ₹27,000

              बीज - ₹18,000

    लेबर कंपोनेंट - ₹15,000

हार्मोन फंगीसाइड - ₹2,000 

            सिंचाई -- ₹3500

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       कुल खर्च = ₹81,000

आमदनी(income) : न्यूनतम उपज 400 क्विंटल और न्यूनतम थोक विक्रय दर 1,200 रुपया प्रति क्विंटल लें तो ₹4,80,000 प्राप्त होते हैं। इस प्रक्रिया के दौरान 81,000 रुपए का 8 महीने का ब्याज ग्रामीण महाजनी दर से ₹32,400 होता हैं। और यदि किसान का अपना खेत नहीं है तो एक हेक्टेयर का किराया ₹25,000 लगेगा। इस प्रकार एक हेक्टेयर मिश्रीकंद की खेती पर कुल खर्च बैठता है ₹1,38,400/- । इसे कुल प्राप्ति में से घटाने पर शुद्ध लाभ ₹3,41,600 आता है।

8 महीने में निवेश का लगभग 250% रिटर्न देने वाला यह काम करने को कहा जाए तो क्या आप करना चाहेंगे ?

बरसाती भिण्डी की खेती

 भिंडी को लेडीज फिंगर या ओकरा(okra) भी कहते हैं। अपने विशिष्ट गुणों के कारण यह एक लोकप्रिय सब्जी है। साल में भिंडी की दो फसलें उगाई जाती हैं पहली फरवरी-मार्च में गरमा फसल और दूसरी जून-जुलाई में बरसाती। यहां हम बरसाती भिंडी की खेती कैसे करें इस विषय पर सभी जरूरी जानकारियां और व्यवहारिक अनुभव शेयर कर रहे हैं।


खेत की तैयारी : लगभग 200 क्विंटल प्रति हेक्टेयर की दर से कंपोस्ट डालकर गहरी जुताई करें जिससे खरपतवार मिट्टी के नीचे चले जाएं। दूसरी जुताई में रासायनिक उर्वरक अनुशंसित मात्रा में डालें। दूसरी जुताई यथासंभव रोटावेटर से करें।

खेत का चयन : 6.4 से लेकर 7 पीएच मान वाली हल्की दोमट मिट्टी युक्त ऊंची भूमि में बरसाती भिंडी की खेती करें। जलजमाव से छोटे पौधे गल जाते हैं तथा बड़े पौधों की उत्पादकता घट जाती है।

उर्वरक की मात्रा : सिंगल सुपर फास्फेट यानी एसएसपी 3.5 क्विंटल प्रति हेक्टेयर एवं 80 किलोग्राम यूरिया अथवा 1.5 क्विंटल डीएपी प्रति हेक्टेयर और म्यूरेट ऑफ पोटाश 1 क्विंटल प्रति हेक्टेयर प्रयोग करें।

बीज की मात्रा : 8 से 10 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर अथवा 150 ग्राम से 200 ग्राम प्रति कट्ठा। 


उन्नत प्रभेद : परभणी क्रांति, केएच- 312, सेलेक्शन- 8 ,सेलेक्शन -10, एचबीएच -142, भवानी, कृष्णा तथा भिन्न-भिन्न कंपनियों के पीतशिरा प्रतिरोधी हाइब्रिड किस्में।

 संरचना : 60 सेमी चौड़ी बेड के अंतराल पर 15 सेमी गहरी और 40 सेमी चौड़ी नाली बनाएं यह संरचना यथासंभव पूरब से पश्चिम दिशा में बनाएं इससे क्यारियों में धूप ज्यादा अच्छे से लगेगी। बेड के दोनों किनारों से 5 - 5 सेमी छोड़कर बिजाई करें ताकि पौधों की दो कतारों के बीच 50 सेमी का अंतराल रहे।


बीज का उपचार : यदि सवेरे रोपना है तो बीज रात में भिगो दें। सुबह 5:00 बजे पानी से निकाल ले और थीरम नामक फंगीसाइड के सॉल्यूशन में उपचारित कर छांव में सुखा लें। एक किलोग्राम बीज के उपचार हेतु 2 ग्राम थीरम के साथ 2 ग्राम स्ट्रेप्टोसाइक्लिन का भी व्यवहार करें।


बिजाई : एक कतार में पौधों से पौधों की दूरी 30 से 40 सेमी रखें और एक स्थान पर 3 या 4 बीज रोपें। यदि सभी उग जाएं तब भी कोई दिक्कत नहीं है। बाद में निकोनी के दौरान कमजोर पौधे को हटाया जा सकता है। एक बेड पर दो कतार लगाएं। बरसाती फसल के लिए प्रायः अंकुरित बीज रोपना अनिवार्य नहीं है क्योंकि जमीन और वातावरण में बहुत अधिक आर्द्रता होती है । केवल फफूंद और बैक्टीरिया संक्रमण से बचा कर रखने की जरूरत है।

खरपतवार नियंत्रण : बिजाई के 15 से 20 दिन बाद पहली निराई करें। खरपतवार हटाने के साथ-साथ मिट्टी भुरभुरी करना भी जरूरी है। जड़ों के विकास के लिए यह अति आवश्यक है। खरपतवार फसल को कमजोर कर देते हैं वह पौधों के हिस्से की पोषक सामग्री भी हजम कर जाते हैं। केमिकल तरीकों से यथासंभव बचे रहें। यह तरीका इको फ्रेंडली नहीं है। पहली निकोनी के साथ ही यूरिया 80 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से डालें। दूसरी निकोनी इसके 20 से 30 दिन बाद इतनी ही मात्रा में यूरिया डालकर करें। उत्पादन : 45वे से 60वें दिन के बीच भिंडी की तुराई आरंभ हो जाती है । यह प्रभेद विशेष तथा परिवर्तनशील भौतिक मौसमी घटकों पर निर्भर करता है कि रोपाई के कितने दिन बाद फल प्राप्त होगा। फसल अवधि में कुल उत्पादन औसतन 90 से 100 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होता है।

निवेश एवं आमदनी : उपरोक्त विधि से खेती करने पर सभी खर्चों को जोड़कर 80,000 से 85,000 रुपए प्रति हेक्टेयर निवेश होता है। यदि सब कुछ ठीक-ठाक रहे तो उत्पादन 100 क्विंटल तक हो सकता है। यद्यपि भिंडी का बाजार मूल्य परिवर्तनशील है फिर भी औसत न्यूनतम होलसेल रेट ₹15 प्रति की किलोग्राम रखें तो कुल प्राप्ति ₹1,05,000 हो सकती है। यानी ₹20,000 का न्यूनतम शुद्ध लाभ प्राप्त होगा। किंतु यदि यथासंभव अधिक से अधिक उत्पाद को स्थानीय खुदरा बाजार में किसान सीधे उपभोक्ता को बेचे तब संपूर्ण विक्रय मूल्य दो लाख से अधिक आता है। भिंडी की खेती एक प्रकार का जुआ है।

नोट : -- कुछ अन्य बाह्य कारकों का भी ध्यान रखना पड़ता है। आवारा पशु और नीलगाय इसके सबसे बड़े दुश्मन है। यदि खेत को चारों तरफ से बांस और जाली की सहायता से सुरक्षित कर सकें तो पूरा लाभ उठा सकते हैं।

 रोग एवं कीट नियंत्रण : मुख्य रोग पीतशिरा रोग है एक बार संक्रमित होने पर कोई इलाज नहीं है। इसलिए बीज उसी नस्ल का चुने जो वायरस से होने वाले पीतशिरा रोग से प्रभावित नहीं होता है। फल एवं तना छेदक कीड़ों और अन्य हानिकारक कीटों के नियंत्रण के लिए मालाथियान 50 ईसी 20 एमएल दवा 10 लीटर पानी में घोलकर प्रति कट्ठा की दर से छिड़काव करें। मालाथिऑन के स्थान पर इंडोसल्फान 35 ईसी का उपयोग कर सकते हैं। तनाछेदक एवं फलछेदक अधिक परेशान करें तो फुराडॉन 3 जी दानेदार दवा आधा किलोग्राम प्रति कट्ठा की दर से पूरे खेत में छीट दें । यदि पत्तों पर जाल बुनकर क्षति पहुंचाने वाली मकड़ी या रेड माइट का प्रकोप हो तो डाईकोफॉल 18.5 ईसी 1.5 लीटर प्रति हेक्टेयर की दर से 1000 लीटर पानी में डाइल्यूट कर स्प्रे करें। डायकोफॉल के बजाय सॉल्युबल सल्फर का भी प्रयोग कर सकते हैं। रेड माइट नामक मकड़िया बहुत छोटी छोटी होती है जिन्हें बहुत ध्यान से देखने पर ही पता चलता है। इनका प्रकोप बरसाती भिंडी में कम होता है। 

                    सावधानियां : कीटनाशकों अथवा फफूंद नाशी के प्रयोग से पूर्व फल तोड़ ले और स्प्रे के कम से कम 7 दिन बाद ही अगली तुड़ाई करें। क्योंकि यह रसायन जहरीले होते हैं और इनके अवशेष शरीर में उपद्रव मचा देते हैं अतः इनसे बचने के उपायों का सतर्कता से पालन करना चाहिए। इसके अतिरिक्त फलों की तुराई में यह भी सतर्कता बरतनी चाहिए की पूर्ण परिपक्व होने से पहले ही फलों को तोड़ लें। फल की लंबाई तो बढ़ जाए किंतु यह नरम रहे तभी तोड़ ले। रेशे कड़े हो जाने पर बिक्री में परेशानी आती है साथ ही भिंडी के ढेर में कुछ कठोर रेशे वाले परिपक्व फल दिख जाने पर मूल्य कम हो जाता है। फसल से पूरा लाभ लेने के लिए इन छोटी-छोटी बातों का बड़ा ध्यान रखना पड़ता है । फल तोड़ने में पौधे क्षतिग्रस्त ना हो इसके लिए चाकू या ब्लेड से फल का डंठल काटे। बड़े खेतों से फल तुराई के लिए हाथों पर प्लास्टिक के डिस्पोजेबल दस्ताने लगाएं क्योंकि भिंडी के पत्तों और फलों पर खुजली व इरिटेशन उत्पन्न करने वाले रोम होते हैं।

बैंगन की उन्नत खेती


बैंगन (Brinjal) सोलेनेसी (Solanaceae) कुल का एक पौधा है जिसके फल भारत ही नही दुनियाभर में सब्ज़ी के तौर पर लोकप्रिय हैं।इसके कुल वैश्विक उत्पादन में अकेले भारत का योगदान 27% है,जबकि चीन शीर्ष पर है।

गुण(Qualities) :  यह शरीर में कोलेस्ट्राल घटाने में मददगार सिद्ध हुआ है।सुपाच्य है और स्वादिष्ट भी।हृदय रोग से बचाता है और उच्च रक्तचाप को नियंत्रित रखने में सहायक है।सब्जियों का राजा कहलाता है।

 दोष(Drawbacks) :  लोक प्रचलित मान्यता है कि बैंगन खाने से खुजली बढती है। मगर जिसे पहले से खुजली नही है उसे कोई फर्क नही पड़ता। 

चूंकी बैंगन हर मौसम में उपलब्ध रहता है तो जाहिर सी बात है कि इसे वर्ष में एक से अधिक बार रोपा जाता होगा। यह खरीफ, रबी और गरमा तीनो मौसम में रोपा जाता है।

खरीफ : जून-जुलाई में बीजाई कर जुलाई-अगस्त में रोपाई, यह मुख्य फसल है।जब नर्सरी में 5-7 इंच के पौधे हो जाए तब उखाड़ कर खेत में लगाएं।

● रबी : अक्टूबर में बीजाई और नवम्बर माह में रोपाई। 

● गरमा : फरवरी मध्य से मार्च तक बीजाई और मार्च-अप्रैल तक रोपाई। 

स्थानीय जलवायु की विशिष्टता के अनुरूप उपरोक्त समय से कुछ भिन्न शेड्यूल भी हो सकते हैं।

पौधशाला में बीज गिराकर बिचड़े तैयार करना उन्हीं किसानों के लिए उपयुक्त व व्यवहारिक है जो व्यवसायिक पैमाने पर बैंगन की खेती करना चाहते हैं, अन्यथा छोटे पैमाने पर, टेरेस गार्डन में या बैकयार्ड किचन गार्डन में रोपने के लिए तैयार बिचड़े खरीद लेना सुविधाजनक होता है।परन्तु मनपसंद प्रभेद के लिए स्वयं बीजाई कर पौधे तैयार करना श्रेष्ठ विधि है।

प्रचलित देशी किस्में : -- गुच्छेदार हरा,कचबचिया/सतपुतिया,गुच्छेदार सफेद इत्यादि। 

उन्नत किस्में : -- पूसा पर्पल लॉङ्ग (PPL),चाइनीज लॉन्ग पर्पल F-1,ब्रिंजल ब्लैक ब्यूटी,व्हाइट ऑब्लॉङ्ग राउंड, नीलम,राजेन्द्र बैंगन-1,राजेन्द्र बैंगन-2,पूसा क्रांति,पूसा अनमोल, पंत ऋतुराज, पंत सम्राट, कल्याणपुर टी-3,  US-1004 हाइब्रिड F-1 इत्यादि। इनमें से पूसा क्रांति और ब्लैक ब्यूटी गोल और वजनदार होते हैं।ये भर्ता/चोखा के लिए ज्यादा उपयुक्त होते हैं तथा बाजार में अपेक्षाकृत महँगे बिकते हैं।PPL,नीलम और राजेन्द्र बैंगन अधिक प्रचलन में हैं।चाइनीज मिर्च की तरह चाइनीज बैंगन भी लोकप्रिय हो रहा है।

खेत की तैयारी - पहली जुताई गहरी होनी चाहिए। जुताई से पहले ही 200 क्विंटल/हेक्टेयर की दर से कम्पोस्ट डाल दें।दूसरी जुताई रोपने से दो-तीन दिन पूर्व करें और अनुशंसित मात्रा में रासायनिक उर्वरक भी डाल दें। 

रोपने का तरीका : - गरमा बैंगन (फरवरी-मार्च) 60 सेमी ×45 सेमी के फॉर्मेट में रोपते हैं, जबकि मुख्य फसल (जून-जुलाई) 75 सेमी × 60 सेमी के फॉर्मेट में।प्रति थाला 6 इंच के दायरे में 2-3 बिचड़े लगाएं।ये तो हुई खेतों में बैंगन लगाने की विधि, अब हम शहरी और गार्डेनिंग का शौक रखने वाले पाठकों की रूचि का ध्यान रखते हुए टेरेस एवं लॉन गार्डेनिंग के तहत गमलों, ग्रो बैग्स या बेकार पड़े खाली प्लास्टिक के डिब्बों में बैंगन उपजाने की विधि जानेंगे। जो भी पॉट्स लें उनके बॉटम में जल निकासी के लिए छिद्र होने चाहिए। यदि नही हैं तो कर लें।ग्रो बैग्स जो आजकल चलन में हैं और बाजार या ई-कॉमर्स प्लेटफार्म्स पर उपलब्ध हैं, उनमें जल निकासी की समुचित व्यवस्था बनी होती है। पॉट्स के बॉटम में जो छिद्र हैं उन पर सीधे मिट्टी डालने के बजाए पहले टुटे हुए मिट्टी के बर्तन या खपरों के टुकड़े डालें ताकि मिट्टी से छिद्र बंद न हो। यदि पूरा पॉट केवल खेत या गार्डन की मिट्टी से भर देंगे तो अपेक्षित परिणाम प्राप्त नही होगा।सही बढवार के लिए मिट्टी,खाद और softening agents (मृदुकारक घटक) का उचित मिश्रण जरूरी है। यदि आप पहले से कोई उपयुक्त मिश्रण इस्तेमाल कर रहे हैं तो ठीक है अन्यथा गार्डन स्वाएल, कोको पिट और वर्मी कम्पोस्ट तीनो बराबर मात्रा में मिलाकर पॉट्स को भरें। पौधा रोपें और सिंचाई करें।रोपने से पहले जड़ों पर थीरम 75% पाउडर छिड़कें या बेवेस्टीन के 0.5%  घोल में कुछ देर डुबोकर रखें। 

अनुशंसित उर्वरक  : - प्रति हेक्टेयर 3-3.5 क्विंटल सिंगल सुपर फास्फेट, 1 क्विंटल म्यूरेट ऑफ पोटाश और 0.8 क्विंटल यूरिया अंतिम जुताई में दें।इतनी ही मात्रा यूरिया की रोपने के 30 वें और 60 वें दिन डालें।कम क्षेत्र में बैंगन की खेती करना हो तो इस प्रकार समझें : SSP 6-7 kg,MOP 2kg, यूरिया 1.6 kg प्रति कट्ठा।(10,000 वर्ग मीटर = 1 हेक्टेयर; लगभग 50 कट्ठा = 1 हेक्टेयर)

सिंचाई : - मुख्य फसल के लिए प्रायः सिंचाई की आवश्यकता नही पड़ती।नवम्बर से मई तक आवश्यकतानुसार सिंचाई कर सकते हैं।ध्यान रहे जड़ों के पास जल जमाव न हो।


खरपतवार नियंत्रण
: - रासायनिक विधि का प्रयोग न करें।पारंपरिक तरीका अपनाते हुए खुरपी-कुदाल से घास निकालें,मिट्टी भुरभुरी करें।50-60 दिन बाद दूसरी निराई के बाद कतार पर मिट्टी चढायें। बगल के चित्र को जूम कर देखें कि कैसा करना है।

कीट प्रबंधन : - बैंगन की फसल में फल छेदक और तना छेदक कीड़ा ज्यादा लगता है।यह अग्रस्थ कलिकाओं को नष्ट कर फलन को बाधित कर देता है।जो फुनगियां मुरझाई हुई दिखे उन्हें यथासंभव तोड़कर हटा दें और मालाथिऑन 50 EC 20ml दवा प्रति कट्ठा 10 लीटर पानी में घोल कर छिड़काव करें।इसके स्थान पर इंडोसल्फान 35 EC का भी प्रयोग कर सकते हैं।फुराडान 3जी दानेदार दवा 500 ग्राम प्रति कट्ठा की दर से पौधों के पास डालें।

स्पेशल टिप्स : अधिक उपज, शीघ्र फलन और गुणवत्ता वृद्धि के लिए समय-समय पर माईक्रो-न्यूट्रिएन्ट्स और हार्मोन का foliar spray(पर्णीय छिड़काव) कर सकते हैं।

उपज : उपरोक्त तरीके से खेती कर एक सीजन में 250 - 300 क्विंटल/हेक्टेयर उपज प्राप्त कर सकते हैं।

लागत एवं लाभ : वर्तमान दरों के सापेक्ष 1 हेक्टेयर बैंगन की खेती करने में 1 लाख रूपए खर्च होते हैं। कुल न्यूनतम उपज 250 क्विंटल मानें और थोक मूल्य दर 10/- प्रति किलोग्राम लें तो उत्पाद का कुल मूल्य 2,50,000/- ढाई लाख रूपए  बनता है।इस प्रकार 100-120 दिन में 1,50,000/- डेढ लाख रूपए शुद्ध लाभ प्राप्त होता है। 150% का लाभ कुछ कम है क्या?तुलना करें ओल की खेती

ओल की खेती

 


🎃एक बहुवर्षीय भूमिगत रूपांतरित तने या घनकंद के रूप वाली सब्जी जिसे उत्तर भारत में 'ओल','सूरन' या 'जिमीकंद' आदि नामों से जाना जाता है और अंग्रेजी में Elephant Foot कहलाता है,एंटीऑक्सीडेंट्स और औषधीय गुणों से लबालब भरा हुआ है। कुछ लोगों को लगता है कि यह  yam  है पर वास्तव में रतालू को yam  कहा जाता है जो एक लता वर्गीय पौधे के पर्व-संधियों पर और कंद के रूप में प्राप्त होता है। ओल को वैज्ञानिक भाषा में Amorpholus ceompenulatus कहा जाता है। 

            🥔      ओल न केवल एक लोकप्रिय स्वादिष्ट सब्जी है बल्कि औषधीय गुणों से भरपूर कंद भी है। बवासीर के मरीजों के लिए यह ज्यादा ही फायदेमंद होता है। मिनरल्स और फाईबर्स के साथ-साथ काफी मात्रा में एंटीऑक्सीडेंट का सुलभ प्राकृतिक स्रोत भी है। दो-तीन दशक पहले तक यह आमतौर पर Backyard kitchen-garden का हिस्सा हुआ करता था किन्तु बढती माँग को देखते हुए अब इसकी खेती भी होने लगी है। व्यवसायिक पैमाने पर खेती के लिए इसके उच्च उपज क्षमता वाले प्रजातियों की पहचान की गई है और इन्हीं को रोना जाता है। कम उपज वाले प्रभेद जिनमें ऑक्जेलेट्स अधिक होते हैं और गले में प्रायः तकलीफ़ पहुँचाने का काम करते हैं, अब यूपी-बिहार के बैकयार्ड किचनगार्डन में सीमित रह गए हैं।मगर इनमें औषधीय गुण ज्यादा हैं। 

उन्नत प्रभेद -- गजेन्द्र,, त्रिवेन्द्रमी,हैदराबादी, मद्रासी ।

भूमि का चयन :-- हल्की दोमट,बलुई,ह्युमसयुक्त ऊँची जमीन जिसमें बरसात का पानी नहीं रुकता है,ओल के लिए सर्वश्रेष्ठ है। उसर भूमि में भी इसकी खेती की जा सकती है। आम-लीची आदि के बगीचों में छायादार परिस्थितियों में भी यह अच्छी तरह उगती और उपज देती है। 

🧭रोपने का सही समय : -- मार्च-अप्रैल या जून।

🎯बीज का आकार :-- 500 ग्राम के आसपास के कंद या कंद के टुकड़े। प्रत्येक टुकड़े में मुख्य अंकुर का कुछ भाग रहना चाहिए। इससे पुष्ट पौधे प्राप्त होते हैं । किन्तु यदि घरेलू प्रभेद का उपयोग करना चाहें तो 200-250 ग्राम के कंद या कंद के टुकड़े आरोप सकते हैं। 

💥पौधे से पौधे की दूरी :-- 75 सेमी ×75 सेमी(500 ग्राम के कंद या कंद के टुकड़े रोपने के लिए), बगीचों में यह दूरी 1 मी × 1 मी उपयुक्त है। 

👌बीजोपचार :-- बाविस्टिन या इमीसान-6 की मात्रा  2.5 ग्राम/लिटर पानी में घोल कर 15-20 मिनट तक बीज कंद को डुबो कर रखें। इस घोल में स्ट्रेप्टोसाइक्लीन 1/2 ग्राम प्रति लीटर की दर से मिला देना चाहिए।यह एक एंटीबायोटिक है जो पौधों में होने वाले बैक्टीरिया जनित रोगों का निवारण करता है। 

🌿बीज की मात्रा  : -- 80 से 100 क्विंटल प्रति हेक्टेयर (1 हेक्टेयर =100 मीटर × 100 मीटर =10000 वर्ग मीटर )         प्रयोग के लिए एक कट्ठा में  लगाना चाहते हैं तो 1.6 - 2 क्विंटल बीज लगेगा। 

🟢खाद एवं उर्वरक : -- जुताई के साथ खाद देने के बजाय प्रत्येक पौधे को लक्षित कर प्रति गड्ढा 3 किलोग्राम सड़ी गोबर अथवा 1 किलोग्राम वर्मी कम्पोस्ट ,38 ग्राम सिंगल सुपर फॉस्फेट, 20 ग्राम अमोनियम सल्फेट या 10 ग्राम यूरिया, 16 ग्राम पोटैशियम सल्फेट मिट्टी में मिलाकर कंद का रोपण करें। इससे उर्वरक का पूरा लाभ तो पौधे को मिलता हीं है लागत खर्च में कमी भी होती है। रोपण के 80-90 दिन बाद नेत्रजनीय उर्वरक से उपरिवेशन करना जरूरी है। 

🌵🌾☘निकाई-गुडाई (खरपतवार निकालना एवं मिट्टी की उपरी परत ढीली करना) : -- पहली बार 50-60 दिन की अवस्था में, दूसरी बार 90-100 दिन की अवस्था में। पहली निकौनी के दौराञन पौधे के पास मिट्टी चढाना जरूरी है। 

🚰 सिंचाई: -- वैसे तो आमतौर पर ओल की खेती में सिंचाई की जरूरत नहीं पड़ती है किन्तु सूखे की स्थिति में मई-जून के महीने में नमी बहुत कम हो जाने पर हल्की सिंचाई कर सकते हैं पर जल जमाव न हो।

📆 इस फसल की अवधि अन्य फसलों की तुलना में अधिक है । 9-10 माह में कंद खुदाई के लिए तैयार हो जाते हैं

💲💱उपज :-- सामान्यतः रोपे गये कंद के वजन के 8-10 गुणा उपज की अपेक्षा रहती है। विभिन्न कृषि अनुसंधान संस्थानों, कृषि महाविद्यालयों में किये गये परीक्षणों से भिन्न-भिन्न उपज संबंधी आकड़े (data) प्राप्त हुए हैं। पूसा कृषि विश्वविद्यालय समस्तीपुर, बिहार के  अनुसार कम से कम 400-500 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उपज होती है। 

🔁🏛 आय-व्यय :-- एक हेक्टेयर में अनुमानित लागत =₹ 4,50,000                                                                      400 क्विंटल न्यूनतम उपज प्राप्त होने पर फसल का न्यूनतम मूल्य =₹ 8,00,000                                                          शुद्ध लाभ=₹ 3,50,000 ( 77%)

मृदा की गुणवत्ता, मौसम की अनुकूलता एवं उचित देखभाल से उपज और मुनाफे में वृद्धि की अपार संभावनाएं हैं।  Tips: रोगों का काल है जिमीकंद, जानें इसके 5 फायदे  via zeenews - https://zeenews.india.com/hindi/health/health-benefits-of-jimikand-in-hindi-know-the-five-benefits-of-jimikand-spup/889218

जून माह में किये जाने वाले कृषि कार्य

 जून माह भारतीय पंचांग के अनुसार प्रायः ज्येष्ठ आषाढ़ के महीनों के मध्य आता हैं।इसी समय मॉनसून भी दस्तक देता है।इस वर्ष यानि 2021ई० में 3 जून को केरल और 10-12जून तक शेष भारत में मॉनसून का आगमन हो चुका हैं।और अच्छी खासी बारिस के आसार नजर आ रहे हैं।जमीन और हवा में काफी नमी है जो धान के बीज गिराने और विभिन्न खरीफ फसलों की बुआई के लिए उपयुक्त स्थिति हैं। 

कृषि क्षेत्र की एक सच्चाई जिसे अक्सर किसान भाई भूल जाते हैं,वो हैं-"किसान की मर्जी से मौसम नहीं बदलता,पर वे मौसम के अनुरूप खेती कर सकते हैं।"    

यदि उपरोक्त सूत्र वाक्य का मर्म समझ लें तो खेती लाभ का धंधा बन सकता हैं।मोटे तौर पर ज्यादातर लोग रूटीन खेती करते हैं और मौसम की 'गुगली' में फंस जाते हैं।खरीफ या जायद फसलों के लिहाज से मौसम तीन विकल्पों क्रमशः-बाढ़,सुखाड़ और संतुलित वर्षा में से एक ही उपलब्ध कराती हैं।इसलिए अपनी जमीन की प्रकृति,किस्म और आगामी मौसम पूर्वानुमान के अनुरूप फसल का चुनाव करें और स्मार्ट किसान बनें।आगे हम जानेंगे इस माह के कृषि कार्यो में से उन मुख्य कार्यो के बारे में,जो इस वर्ष की संभावित बरसात की मात्रा के अनुरूप हैं।

1.‌ अनाज की खेती:-


(i)धान - चावल जो पूरे एशिया और खास तौर पर भारत में भोजन का सबसे प्रमुख  घटक हैं,धान से ही प्राप्त होता हैं।इसकी इतनी ज्यादा प्रजातियाँ हैं कि सबकी चर्चा की जाए तो महाग्रंथ बन जाए। भारत में मुख्यतः ये धान के खेत हैं -- पर्वतीय-पठारी भागों के सीढ़ीदार खेत,मैदानी भागों के सामान्य,मध्यम,नीची और गहरी जमीन।इन में से गहरे जल जमाव वाली भूमि में सामान्यतः फरवरी से अप्रैल तक ही मूंग  और धान  की मिश्रित बोआई की जाती हैं,फिर वर्षा जल के जमाव से मूंग सूख कर सड़ जाती है और जैविक खाद की तरह उर्वरा शक्ति वढ़ाती हैं।धान जल स्तर के अनुरूप बढ़ता जाता हैं।इसके परंपरागत  किस्में  जागर,पाखर,जेसरिया ईत्यादि हैं जबकि उन्नत प्रभेद जानकी और सुधा हैं।शेष चारों भूमि में धान सीधी बुआई के बजाए नर्सरी तैयार कर बिचड़े कीचड़ में रोपने की विधि से लगाई जाती हैं।अभी नर्सरी में धान के बीज बोने का उपयुक्त समय हैं।बीज बोने के25 दिन बाद पौधे उखाड़ कर अच्छी तरह जुताई कर कीचड़(mud) बनाये गये खेत में रोप सकते हैं।रोपन के पूर्व फास्फेट की पूरी मात्रा पोटाश की आधी मात्रा और नाइट्रोजन की एक चौथाई मात्रा का प्रयोग करें।

(ii) मक्का - खरीफ मक्का की  खेती/बुआई साफ मौसम देख कर कर लें।फफून्दनाशी से बीजोपचार करना न भूलें।

(iii)मरूआ या रागी - खरीफ मरूआ की रोपाई जून में पूरा कर लें।गरमा मरूआ यदि रोपा हैं तो उपरिवेशन कर लें।यह सबसे अधिक फायदेमंद मोटा अनाज (millet)हैं।इसका हलवा और रोटी बनाई जाती हैं जो अत्यंत पौष्टिक व शक्तिवर्धक  खाद्य पदार्थ हैं।

(iv)ज्वार - बाजरे की बुआई भी जून माह में ही की जाती हैं।बिहार के आरा - बक्सर पूर्वी उत्तरप्रदेश,राजस्थान,मध्यप्रदेश में इसकी खेती  होती हैं।कम वर्षा वाले क्षेत्रों में अपेक्षाकृत  ऊँची भूमि में मोटे अनाज एवं पशुओं के चारे के लिए इन्हे उपजाया जाता है।

2. दलहन की खेती :- जून माह में मुख्यतः दो दलहन फसलें बोई जाती हैं।


अरहर+उड़द,अरहर+मक्का,उड़द+मक्का,अरहर+मरूआ,अरहर+मूँगफली,अरहर+मिश्रीकन्द,अरहर+साँवा।अरहर(pigeon pea)उच्च कोटि की दलहन प्रजाति हैं,जिसमें 21-26% तक प्रोटीन पायी जाती हैं।यह पूरे भारतवर्ष में लोकप्रिय हैं और कई  नामो से जाना जाता हैं;जैसे - तुअर,तूर,रहरी,अरहर,आदि।लिन्नियस नामकरण पद्घति के अनुसार इसे Cajanus cajan या Cajanus indicus कहते हैं। यह एक लम्बी अवधि की फसल है जो खेत में 9 महीने रंडरहती है। शुद्ध अरहर की फसल उगाने के लिए प्रति हेक्टेयर 20 कि०ग्रा० बीज की जरूरत होती है।मिश्रित खेती के लिए 15 कि०ग्रा० बीज पर्याप्त है।अकेले उत्तरप्रदेश में 30 लाख एकड़ से अधिक क्षेत्र में इसकी खेती होती है।उन्नत प्रभेद - प्रभात,बिहार,लक्ष्मी,BR-65,मालवीय अरहर-151उरद के उन्नत प्रभेद-T-9को जून-जलाई में बो सकते हैं।

3. तिलहन- खरीफ फसल में तिलहन के की विकल्प हैं।-तिल,सूरजमुखी,मूँगफली,एरंड/अंडी।अंडी एक अखाद्य तिलहन फसल हैं और इसकी बुआई जुलाई-अगस्त  में होती हैं।जबकि तिल,मूँगफली,सूरजमुखी खाद्य श्रेणी के तिलहन हैंऔर 15 जून से 15जुलाई के बीच बोए जा सकते हैं।मूँगफली  के लिए ऊँची,ह्लकी दोमर मिट्टी उपयुक्त हैं।तिल के लिए भी ऊँची जमीन  चाहिए  जिसमें जल जमाव न हो।कमोवेश सूर्यमुखी भी जल जमाव को बर्दाश्त  नहीं कर पाती हैं।

4. कन्दवर्गीय फसलें:-अदरक व हल्दी रोपने का समय मई तक ही हैं जो बीत चुका हैं।ओल की अगैती बुआई मार्च-अप्रैल  में हो चुकी हैं किन्तु मुख्य फसल जून माह में ही रोपाई जाती हैं।विस्तृत  जानकारी के लिए निम्नांकित  लिंक को क्लिक करें : ओल की खेती 

 खरीफ  अरबी मई-जून में ही रोपी जाती हैं,जबकि इसकी वसंतकालीन रोपाई फरवरी में होती हैं।12-15 क्विंटल प्रति हेक्टेयर बीज लगता हैंऔर उपज 80-100 क्विंटल तक होती हैं इसके कन्द के अलावा पत्तों की भी सब्जी बहुत स्वादिष्ट  होती हैं।130-140दिन में फसल खोदने के लिये तैयार हो जाती हैं।अच्छी कमाई के लिए  इसका खेती कर सकते हैं।जून के अंत से जुलाई भर मिश्रीकन्द  यानि केसऊर की खेती कर सकती हैं।सितम्बर  अरहर के साथ इसकी मिश्रित खेती सितम्बर माह में भी कर सकते हैं।जून- जुलाई में बोने पर बीज 15-20kg/hectare और अगस्त  में 30-40 kg/hectare और सितम्बर  में 50-60kg/hectare की दर से लगता हैं।जून-जुलाई में इसे मकई और अरहर के साथ भी लगा कर सकते हैं।मिश्रीकन्द की खेती के विशेष इच्छुक हैं तो कमेंट सेक्शन में लिखें।इस पर विस्तृत  एवं अनुभव सिद्ध तथ्यों से परिपूर्ण लेख उपलब्ध कराया जाएगा।

5. बरसाती सब्जियों की खेती :-ज्यादातर बरसाती सब्जियाँ गरमा और बरसाती दोनों रूपों में उगाई जाती हैं,जिसमें बैगन,भिण्डी,लौकी,खीरा,घिनौनी,करेला,नेनुआ,बोदी,पेठा और मिर्च प्रमुख हैं।इनमें से भिण्डी को छोड़कर शेष सभी के लिए थोड़ा सा जल जमाव  भी अत्यंत घातक हैं।इस तथ्य को ध्यान में रख कर ही उपयुक्त भूमि में इन फसलों को लगाए।ये सारी सब्जियाँ टेरेस गार्डन,लाॅन या बैकयार्ड किचन गार्डन के लिए भी बहुत उपयुक्त  हैं।


फूलगोभी(Cauliflower): जून माह में अगैती (early)प्रभेद का बीज नर्सरी में बोया जाता हैं।बिहार में प्रचलित नस्लें हैं-पटना अर्ली,पूसा कतकी,कुँआरी ।इनके अलावा कुछ  हाईब्रिड  नस्लें भी उपलब्ध हैं।छोटे स्तर पर गमलों में भी बीज बोया जा सकता हैं।बरसाती मौसम में उगते ही बेवकूफ की तरह लम्बे होकर मुरझाते हुए मर जाने की बीमारी अक्सर  अगात फूलगोभी की नर्सरी में पाई जाती हैं।इसके निराकरण  हेतु streptocycline नामक antibiotic दवा का प्रयोग  बीजोपचार तथा उगते के बाद स्प्रे के रूप में भी करना चाहिए।600-700  ग्राम बीज लगता हैं। यह उच्च लाभ देने वाली फसल हैं किन्तु विशेष देखभाल  की जरूरत पड़ती हैं।

 


बैंगन
(Egg plant/Brinjal):बैगन की मुख्य फसल हेतु जून महीने के अंत तक पौधशाला में बीजाई कर देनी चाहिए।वैसे 15  जुलाई तक भी कर सकते हैं।बैंगन की खेती पर विस्तृत व पूर्ण जानकारी के लिए alongwithroots.blogspot.com पर विजिट करते रहें।(शीघ्रप्रकाश्य)।

भिण्डी(Okra/Lady finger): बरसाती भिण्डी की बोआई  जून से जुलाई तक कर सकते हैं।एक हेक्टेयर क्षेत्रफल में 8-10 kg बीज लगता है।कतार से कतार की दूरी 50 सेमी और कतार में पौधे से पौधे की दूरी 40 सेमी रखें।

लौकी(Gourd): जून-जुलाई  में रोपी जाने वाली बरसाती लौकी नवंबर-दिसंबर तक फल देती है।खेतों में लगाने के लिए ऊँचे थाले बनाए जिनमें पहले से 2-3 kg सड़ी गोबर की खाद या वर्मी कम्पोस्ट के साथ 20 ग्राम यूरिया,25 ग्राम पोटाश  और 100 ग्राम सिंगल सुपर फास्फेट प्रति थाला मिला लें और तीन बीज  प्रत्येक में रोपें।गमलों या ग्रो बैग में  भी इसी प्रकार  रोप सकते हैं।मचान बनाना जरूरी हैं।


नेनुआ/घिउरा(Sweet Gourd/SpongeGourd)  :इसे बरसात में जुलाई महीने में 2m×1.5m की दूरी पर ऊँची बेड बना कर रोपते हैं।खाद एवं उर्वरक लौकी के समान प्रयोग  करें।यदि 1m चौड़ी व 20cm ऊँचे बेड बना कर रोपें तो बिना मचान बनाए भी उपज ले सकते हैं किन्तु मचान पर फलों की गुणवत्ता और उत्पादकता बढ़ जाती हैं।



तोरई/झिगुनी(RidgeGourd):जून-जलाई  माह में एकल या मिश्रित फसल के रूप में इसे लगाया जाता हैं।( गरमा तोरई फरवरी- मार्च में रोपी जाती हैं।) अरहर+मकई+ तोरई एक प्रचलित  फसल संयोजन हैं।एकल फसल के रूप में नेनुआ की तरह ही बेड बनाकर रोप सकते हैं।मचान बनाकर लताओं को उन पर फैलने दें।इससे उपज की मात्रा एवं गुणवत्ता बढ़ जाती हैं।खाद एवं उर्वरक की मात्रा कद्दू से आधी कर दें।उन्नत प्रभेद पंजाब सदाबहार,पूसा नसदार,सतपुतिया,PKM1,कोयम्बटूर-2 इत्यादि।

 खीरा(Cucumber): बरसाती खीरे की खेती 50 सेमी चौड़ी,20 सेमी ऊँची बेड व 50 सेमी चौड़ी नाली के अंतराल बनाकर 50-50 सेमी की दूरी पर 3-3 बीज रोपते हुए करें।खाद एवं उर्वरक का प्रयोग जुताई के समय ही कर दें।यह सावन-भादो के महीने में फल देता है।इस दौरान सामान्य माँग के अतिरिक्त व्रत-त्योहारों की भरमार होने से अत्यधिक माँग उत्पन्न हो जाती है जिससे मूल्य ज्यादा मिलता है।

करेला (BitterGourd): जून-जुलाई में मुख्यतः दो प्रकार के करेले रोपे जाते हैं - बारहमासी और हाईब्रिड। पुरानी भदई नस्लें अब लुप्तप्राय हैं।इसकी लताएँ जमीन पर फैल कर फल नही देती।मचान बनाकर ही उपज ले सकते हैं। कीटनाशक एवं फफून्दनाशी का आवश्यकतानुसार उपयोग करना पड़ता है। 

बरबटी/बोदी/बोरो(Long Beans): बोने का समय - जून से जुलाई तक। उन्नत प्रभेद - पूसा बरसाती,पूसा दोफसली, पूसा ऋतुराज। पौधे से पौधे की दूरी 15 सेमी,कतार से कतार की दूरी 25 सेमी। खाद एवं उर्वरक - कम्पोस्ट 4 क्विंटल/कट्ठा, यूरिया 1.4 kg/कट्ठा, म्यूरेट ऑफ पोटाश 1.5 kg/कट्ठा और सिंगल सुपर फास्फेट 5 kg/कट्ठा। (1 कट्ठा=1760 वर्ग फीट)

6. बागवानी : - आम,अमरूद, लीची,केला, नींबु, नारियल के पौधे लगाने का सबसे अधिक उपयुक्त समय 15 जून से 31 जुलाई तक है।यदि अप्रैल माह में गड्ढे खोदकर तैयार कर लिए गए हैं तो रोपने से 10-12 दिन पूर्व खाद-उर्वरक और मिट्टी का मिश्रण भरकर दबा दें।

7. वानिकी  : - गम्हार, जल गम्हार,बकाईन, करंज, बबूल, खैर के बीज पौधशाला में लगायें।

Weather patterns and farming






 Different parts of India received more rainfall in the year 2020 than in previous years. Due to which, especially in the alluvial plains of Ganga-Yamuna-Kosi, the farmers had to face problems like flooding and prolonged water logging. As a result, the Kharif crops were ruined, sowing / sowing of rabi crops could not take place in very large arable land. In oilseed crops, the all-important mustard-zucchini-rye was cultivated in a very limited area. That is, there is bound to be a drastic decline in oilseed production.But beyond all these losses, the main highlights are two main things: (1) The fertility of the land got a chance to be revived. (2) The underground water level has been widely improved. During the monsoon, the part of the land that has been submerged during Rabi crops mustard and wheat has dried up by mid-January after the deadline for sowing, farmers are thinking of cultivating moong and sesame in general. It is broadly justified as we

    Chaur (concave land) of Bihar-Uttar Pradesh will probably be available for coral cultivation very little this year. Therefore, the total production of coral will decrease and there is a possibility of price increase. It is noteworthy that for the cultivation of coral, neither irrigation is needed nor much fertilizers. Use of single super phosphate or rock phosphate is sufficient at the time of sowing. Giving single super phosphate 250 kg / hectare gives good yield.

Note: In areas of potash deficiency, 1 kg / katha can also provide muret of potash and 35 kg of urea per hectare is also necessary in case of low humidity. 

Ultimately, the conclusion is that the cost of coral cultivation is low and the benefits are high. Simultaneously, more benefit can be achieved by applying small amounts of sesame or redmi (a type of musk malone) as a concomitant crop. This provides the benefits of biodiversity and reduces outbreaks of pests.

         Seed rate: Large grain advanced strain 400 g / ktha (20 kg / ha) and small grain native strain 250 g / ha. If rhizobium culture is available, treating the seeds before sowing leads to a positive change in yield and soil quality. Under normal conditions, the average yield of native moong is 8 to 10 quintals per hectare. The record of so-called advanced discernment on the ground is not very good.

मौसम के मिज़ाज और खेती




भारत के विभिन्न भागों में वर्ष 2020 में विगत वर्षों की तुलना में अधिक वर्षा हुई। जिससे खास तौर पर गंगा-यमुना-कोसी के जलोढ़ मैदानी इलाकों में बाढ और सामान्य से अधिक समय तक जल जमाव जैसी समस्याओं का सामना किसानों को करना पड़ा। परिणामस्वरूप खरीफ फसल तो बर्बाद हुई हीं, बहुत बड़े कृषि योग्य भू-भाग में रबी फसलों की बोआई/बीजाई न हो सकी। तिलहन फसलों में सर्व-प्रमुख सरसो-तोरी-राई की खेती बहुत ही सीमित क्षेत्र में हो पायी। अर्थात तिलहन उत्पादन में भारी गिरावट होना तय है। किन्तु इन सब हानियों से परे दीर्घकालिक फायदे की बात करें तो दो मुख्य बातें हाईलाईट होती हैं :  (1) भूमि की उर्वराशक्ति को पुनर्जीवित होने का मौका मिला। 

(2) भूमिगत जलस्तर में व्यापक रूप से सुधार हुआ है। 

मानसून के दौरान जलमग्न हुई भूमि का वह भाग जो रबी फसलों सरसो, गेहूं की बुवाई की समय सीमा बीत जाने के बाद जनवरी मध्य तक सूख पाया है, उसके लिए सामान्य तौर पर किसान भाई मूँग और तिल की खेती करने की सोच रहे हैं। मोटे तौर पर यह उचित भी है। 

                            बिहार-उत्तर प्रदेश के चौर(अवतल प्रारूप वाली भूमि) संभवतः मूँग की खेती के लिए इस वर्ष बहुत कम उपलब्ध होंगे। इसलिए मूँग का कुल उत्पादन घटेगा और मूल्य वृद्धि होने की संभावना है। उल्लेखनीय है कि मूँग की खेती के लिए न तो सिंचाई की जरूरत है और न ज्यादा उर्वरकों की। बुवाई के समय केवल सिंगल सुपर फॉस्फेट या राक फॉस्फेट का प्रयोग काफी है। सिंगल सुपर फॉस्फेट 250 किलोग्राम/हेक्टेयर देने से अच्छी उपज प्राप्त होती है ।

नोट : पोटाश की कमी वाले  क्षेत्रों में 1 किलोग्राम/कट्ठा म्यूरेट ऑफ पोटाश भी  दे सकते हैं और कम नमी होने की स्थिति में 35 किलोग्राम यूरिया प्रति हेक्टेयर भी जरूरी है। 

फसल संरक्षण : - सामान्यतः मूंग पर फंगस,वायरस इत्यादि का प्रकोप नही होता है परन्तु कभी-कभी पत्ते खा जाने वाले ग्रास हॉपर,टिड्डी या कैटरपिलर का प्रकोप होता है।इनके नाम के लिए इंडोसल्फान 35EC अथवा मालाथिऑन 50EC का 20 ml 10 लीटर पानी में घोल कर छिड़काव करें।इससे भी काम न चले तो फुराडॉन 3जी आधा किलोग्राम प्रति कट्ठा की दर से व्यवहार करें।

     अंततः निष्कर्ष यही निकलता है कि मूँग की खेती में लागत कम और फायदे ज्यादा हैं। साथ में अल्प मात्रा में तिल या लालमी (एक प्रकार का मस्क मेलोन) सहवर्ती फ़सल के रूप में लगा कर अधिक लाभ प्राप्त किया जा सकता है। इससे जैव विविधता के फायदे मिलते हैं और कीटों का प्रकोप कम होता है। 

बीज दर :  बड़े  दाने वाली उन्नत प्रभेद  400 ग्राम/कट्ठा (20 किलोग्राम/हेक्टेयर) और छोटे दाने वाली देशी प्रभेद 250 ग्राम/कट्ठा।  

यदि राइजोबियम कल्चर उपलब्ध है तो बुवाई के पूर्व बीज़  को उपचारित कर लेने से उपज और मृदा की गुणवत्ता में सकारात्मक परिवर्तन होता है। 

               साधारण स्थितियों में देशी मूँग की औसत उपज 8 से 10 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होती है। धरातल पर तथाकथित उन्नत प्रभेद का रिकार्ड ज्यादा बढिया नहीं है। 




        

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