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आर्जीमोन मेक्सिकाना यानि भटकटैया : एक परिचय

 भटकटैया, सत्यानाशी,कन्टैया या मैक्सिकन प्रिक्ली पॉप्पी यह सारे नाम आर्जीमोन मैक्सिकना नामक पौधे के हैं।


 इसके बीज काली सरसों या राई के समान दिखते हैं और विषैले होते हैं। कटीले पत्तों और फलों वाले इस हर्ब का मूल स्थान यद्यपि मेक्सिको है किंतु संसार के विभिन्न भागों सहित भारत में भी हर जगह पाया जाता है। फलों,तने या पत्तों को तोड़ने अथवा काटने पर पारदर्शी पीले दूध जैसा निकलता है इसी कारण आयुर्वेद में इसे स्वर्णक्षीरी कहां गया है।

भावप्रकाश निघंटू नामक आयुर्वेदिक ग्रंथ के अनुसार यह पीला रस घाव, दाद ,कुष्ठ इत्यादि की चिकित्सा में अत्यंत उपयोगी है। विषाणु और कीटाणुओं का नाश करता है। न ठीक होने वाले घाव के इलाज में यह रामबाण औषधि है। मुनाफाखोर,लालची व्यापारी भटकटैया के बीजों का दुरुपयोग करते हैं। वे सरसों के साथ मिलाकर तेल निकालते हैं और मिलावटी सरसों का तेल शुद्ध तेल के नाम पर बेच लेते हैं। या मिलावटी तेल मौत का कारण भी बन सकता है। इससे एपिडेमिक ड्रॉप्सी यानी पेट की झिल्ली में पानी भरने का रोग उत्पन्न हो जाता है।

              चूँकि आर्जीमोन मैक्सिकना के बीज विषैले होते हैं इनसे निकलने वाला तेल मृत्यु अथवा गंभीर रोग का कारण बन सकता है इसलिए इसके अल्प मात्रा में सेवन के परिणाम स्वरूप उत्पन्न होने वाले लक्षणों का संग्रह कर एक होम्योपैथिक दवा के रूप में इसकी प्रूविंग की जा सकती है। इस प्रकार होम्योपैथिक चिकित्सा पद्धति में एक और भारतीय औषधि का समावेश हो सकेगा जो मानवता के कल्याण की दिशा में एक और कदम साबित होगा। इसके अतिरिक्त इसके रस यानी स्वर्णक्षीर के गुणों का अध्ययन आधुनिक वैज्ञानिक विधियों द्वारा किया जाना भी आवश्यक है। प्राचीन आयुर्वेदिक ग्रंथों में दिए गए विवरण के ऊपर मैं प्रश्नचिन्ह नहीं लगा रहा परंतु मेरा मानना है कि किसी चीज पर आंख मूंदकर विश्वास करना अंधविश्वास है। पुरातन को अद्यतन बनाना वास्तव में विज्ञान का एक कर्तव्य है।

   आर्जीमोन मैक्सिकना के साथ एक मिथक भी जुड़ा हुआ है। पुराने जमाने में रसायन वैज्ञानिक जिन्हें कीमियागर या अल्केमिस्ट कहा जाता था अपने अनुसंधान और ज्ञान को काफी गुप्त रखते थे। उनके मुख्यता तीन परम लक्ष्य थे : -  (1) ब्रह्मांड के साथ मनुष्य के संबंधों की खोज और मानवता के हित में इसका लाभ उठाना। (2) अमृत की खोज और (3) सीसा या तांबा जैसे कम मूल्य वाले धातुओं को सोना में परिवर्तित करने का उपाय ढूंढना।

                     भारत में भी कीमियागरों के देसी वर्जन पाए जाते थे जिन्हें रसज्ञ, रस-सिद्ध अथवा रसायनज्ञ कहा जाता था इनमें नागार्जुन का नाम उल्लेखनीय है। कहा जाता है कि उन्होंने सोना बनाने की विधि खोज ली थी जिसमें स्वर्णक्षीरी के उपयोग के विषय में कई स्थानों पर उल्लेख किया गया है। परंतु किसी भी ग्रंथ में सोना बनाने की संपूर्ण विधि लिखी हुई नहीं मिलती है,  केवल संकेत कथाएं और उल्लेख मिलते हैं। मध्यकाल के यूरोप और पश्चिम एशिया के कीमियागर अपने ज्ञान को अत्यंत गुप्त संकेतो में नोट करते थे किंतु आज की तारीख में उन्हें समझने वाला कोई नहीं है। इन संकेतों की कोई सार्वभौमिक भाषा भी नहीं है जिसकी सहायता से इन्हें डिकोड किया जा सके।इन सब तथ्यों की सहायता से हम अंततःइस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि सत्यानाशी का न केवल औषधीय महत्व था बल्कि रासायनिक प्रक्रियाओं में भी उपयोगी था।


कोरोना मरीज की देखभाल होम आइसोलेशन में कैसे करें



 पिछले आलेख में आपने जाना कि होम आइसोलेशन का पालन करते हुए घर में किस प्रकार रहे। रहन-सहन,संयम-नियम,आहार और मानसिकता के संदर्भ में यथा सम्भव संक्षिप्त व सटीक विश्लेषण प्रस्तुत किया गया। दवाओं के दुष्प्रभाव और उनके सेवन से बढने वाली मृत्यु दर को देखते हुए इस नये आलेख के सृजन की आवश्यकता महसूस हुई। 

■ यद्यपि विभिन्न प्रान्तों की सरकारें संक्रमण दर में गिरावट के आंकड़े पेश कर रही हैं जैसे बिहार में मात्र 3.11%  बताया गया है तथापि वास्तविक स्थिति कुछ और ही है। इसीलिए लाकडाऊन बढाने की चर्चा सत्ता के गलियारों में चल रही है। दूसरी तरफ म्यूकर माइकोसिस (ब्लैक फंगस) को भी 22 मई को महामारी अधिनियम 1897 के तहत पैन्डेमिक घोषित कर दिया गया है। इसके मामले न केवल शहरों में बल्कि गावों में भी समान रूप से उजागर हो रहे हैं। अब इसकी मानिटरिंग एकीकृत रोग निगरानी कार्यक्रम ( ISDP) द्वारा की जायेगी। 

■ इसी क्रम में एक दूसरा कोरोना follow up रोग उभरने लगा है,जिसे व्हाइट फंगस कहा जा रहा है। इसका भी मूल कारण कमजोर इम्यूनिटी या कोरोना से कमजोर हुई इम्यूनिटी बताया गया है। वास्तव में यह एस्पर्जिलस जीनस के सैकड़ों फफून्दो(moulds) में से एक का संक्रमण है। डाक्टर लोग इस रोग को एस्पर्जिलोसिस भी कह रहे हैं और कम घातक बताते है। इसके लक्षणों में सबसे प्रमुख है शरीर, जीभ,मुँह पर सफेद चकत्ते उभरना।ब्लैक फंगस जहाँ शरीर के अंदरूनी हिस्से को रुग्ण करता है वहीं व्हाइट फंगस सामान्यतः शरीर के बाहरी हिस्से को प्रभावित करता है। ब्लैक फंगस के इलाज में सर्जरी की आवश्यकता पड सकती है मगर व्हाइट फंगस के इलाज में सर्जरी की आवश्यकता नहीं पड़ती। 

■ एक रोचक तथ्य : संसार के कुल साइट्रिक एसिड उत्पादन का 99% हिस्सा केवल एस्पर्जिलस नाइजर नामक फंगस के द्वारा होता है। केवल 1% उत्पादन नींबू और नींबू वर्गीय(citrus) फलों से होता है। 

■ एक कटु सत्य : आज जो भी महामारी इत्यादि फैल रही है वह मनुष्य द्वारा प्रकृति के साथ की जाने वाली स्वार्थपूर्ण छेडछाड का नतीजा है। 

■ कोरोना सीज़न-1यानि वर्ष 2020 में सोशल मीडिया और व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी के लाइफ टाईम स्टूडेंट्स द्वारा वायरल तथाकथित प्रतिरोधक या होम्योपैथिक वैक्सीन आर्सेनिक था। यह सीज़न-2 में भी वायरल है। यह सब देखकर स्वर्गीय हैनीमैन साहब की आत्मा जरूर रो रही होगी। यह एक गलत सलाह है ।इसके चक्कर में न पड़ें। 

■  होम आइसोलेशन का पालन करते हुए भी स्वच्छता का ध्यान रखें। कमरा, कपड़े, शरीर और खाना-पानी की स्वच्छता का विशेष रूप से ख्याल रखा जाना चाहिए। 

■ कोरोना सीज़न-2 में एस्पिडोस्पर्मा-Q का प्रचार चल रहा है। लोग 60-60 मिली की 4-4,5-5 शीशियाँ खरीद कर स्टाक कर रहे हैं। कालाबाजारी हो रही है,जिस प्रकार ऑक्सीजन सिलेंडर की होती है। दरअसल जिस कोरोना रोगी को सांस लेने में तकलीफ हो,ऑक्सीजन लेवल कम हो गया हो और तत्काल ऑक्सीजन सिलेंडर उपलब्ध न हो तो एस्पिडोस्पर्मा के सेवन से फायदा होता है। यह सांस में खींची गई हवा में से अपनी जरूरत के अनुसार ऑक्सीजन अवशोषित करने की क्षमता को बढ़ाने का काम करती है। इससे रक्त में ऑक्सीजन की मात्रा बढ़ जाती है और रोगी का हाँफना व सांस के लिए छटपटाना बंद हो जाता है। यह एक प्राण रक्षक औषधि है, स्थायी समाधान नहीं। स्थायी समाधान पाना है तो योग्य होम्योपैथ से सम्पर्क कर सकते हैं। 

■ एलोपैथिक पद्धति में अबतक कोरोना या कोविड19 की कोई सटीक (appropriate) दवा नहीं है। यह एक अकाट्य सत्य है। जो कुछ भी इलाज अस्पतालों में किया जा रहा है वह रोग के बजाय अलग-अलग लक्षणों का इलाज है। नतीजा लाखों रुपये खर्च करने के बाद भी जिन्दगी से हाथ धो लेना।हम 2020 से ही रैमडेसीवीर जैसी दवाओं के निरर्थक प्रयोग और जानलेवा प्रभाव के बारे में लोगों को आगाह करते रहे हैं। देर से ही सही बिहार सरकार की आँखे खुली तो सही। पटना के कुछ बडे अस्पतालों की शिकायत पर सरकार ने रैमडेसीवीर दवा की जाँच के आदेश दे दिए हैं।




ऐसी ही सच्चाई बयां करने के बाद अगले ही दिन रामदेव जी को बयान वापस लेना पड़ा है। सुना है सरकार में  कोई मंत्री हैं डाक्टर हरसबरधन,उन्हें घोर आपत्ति है कि एलोपैथी की बेइज्जती हो गई। अरे भाई रोग तो लक्षण समूह से भी गहरी और उँची चीज है। दम है तो रोग का इलाज ढूँढो फिर अधिकारपूर्वक रोगी को घेर कर रखना। लक्षणों के अनुसार ही चिकित्सा करनी है तो क्या होम्योपैथी खराब है। यह तो सम्यक् लक्षणों के आधार पर चयनित दवा से आरोग्य करती है। 

■ याद रखें : 96°F - 98°F शारीरिक तापमान को बुखार नहीं समझा जाता है। यह नार्मल ताप है। 99°F से 100°F के  बीच हल्का ज्वर माना जाता है। इस स्थिति में डाक्टर लोग दिन में 2-3 बार पेरासिटामोल खिला रहे हैं। इस प्रिस्क्रीप्शन को हाई फीवर के लिए बचा कर रखिये, अगर जीवित रहने की चाह है। विश्वास कीजिए नये अनुसंधान कुछ ही दिनों में मेरी सलाह की पुष्टि करेंगे। 

■ अब हम चर्चा करेंगे उन होमियोपैथिक दवाओं की जो सेफ हैं। कोरोना मरीजों के यथार्थ लक्षण समुच्चय से सम्यक् रूप से मेल खाने वाली इन दवाओं का प्रयोग कर सफल चिकित्सा की गई है। 


(1) ब्रायोनिया एल्बा-30 : एक रिसर्च प्रोजेक्ट के तहत आगरा के डाक्टर प्रदीप गुप्ता ने 50 कोरोना पाजिटिव रोगियों को उनके common symptoms के आधार पर  केवल ब्रायोनिया देकर 3-5 दिन में चंगा कर दिया। मगर जरूरी नहीं कि हर रोगी इसी दवा से ठीक हो जाए। परिवर्तनशील लक्षणों के अनुसार अन्य दवाओं की भी जरूरत पड़ सकती है। बुखार आने से पहले नासा-रंध्र शुष्क लगे,छींक आये, गले में खराश या दर्द हो, फिर धीरे-धीरे शरीर का ताप बढ़े,खुली हवा की चाह,हरकत से तकलीफ बढ़े और विश्राम से घटे तो ब्रायोनिया एल्बा की कुछ खुराकें देकर देखें। यह रोग को शान्त कर शरीर को राहत प्रदान करेगी। 

(2) बेलाडोना-30 : इसका प्रयोग तब करें जब आँखे  लाल,सिरदर्द, आँखों से पानी आना,तेज बुखार, जलन,मुँह-गला सूखने पर पानी पीने से घृणा, प्रकाश-शोर-स्पर्श से घृणा, सूखी खाँसी, डिसेन्ट्री इत्यादि लक्षणों का समूह मिले।4-4 घंटे पर एक बूँद दे सकते हैं। 



(3) इपिकाक-30 : उल्टियाँ, जी मिचलाना, सिरदर्द, बुखार, जीभ लाल या साफ,फेफड़ों में बलगम जमा हो और न निकलता हो,सुखी खाँसी हो तब इपिकाक-30 सुबह-शाम दो-तीन दिन तक सेवन करायें। 

(4) मैग्नीशिया म्योर-6 : मुँह-गला सूखता हो,नाक बंद या पनीला स्राव,गंधलोप, स्वादलोप, जुकाम के जैसे अन्य लक्षण, श्वास लेने में परेशानी, मुँह से सांस लेना पडता हो,भूख कम या बिलकुल न लगे,सूखी खाँसी, रात में लक्षण वृद्धि, छाती में दर्द, जलन,पीठ-नितम्बों और बाहों में अंदर की तरफ खीचने जैसा दर्द हो तो मैग म्यूर-6 हर 4 घंटे पर सेवन करायें। शर्तिया लाभ होगा। इसके अलावा भी बहुत सी दवाएं हैं जो लक्षणों के अनुसार अनुभवी चिकित्सकों द्वारा प्रयुक्त की जा सकतीं हैं। 

क्या करें जब कोरोना संक्रमित हो जायें

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0️⃣जब कोरोना हो जाए तो होम आइसोलेशन का पालन करते हुए कैसे रहे,इस विषय पर काफी लेख और वीडियो कंटेंट इन्टरनेट और सोशल मीडिया पर उपलब्ध हैं, मगर उचित आहार-विहार,व्यवहार तथा दिमागी सोंच की दिशा-दशा के संबंध में सही मार्गदर्शन करने वाली सामग्री का सर्वथा अभाव है। अतः हम यहाँ उन्हीं अछूते किन्तु अति आवश्यक विन्दुओं पर फोकस करेंगे जो व्यावहारिक हैं और बेहतर परिणाम दे सकते हैं। 

1️⃣   कैसे पहचाने कि कोरोना संक्रमित हो गये हैं?                ■■ आँखे हल्की लाल,उनसे पानी आना,सिरदर्द, बुखार, कमजोरी, पीठ-कमर-नितम्बों में दर्द, नाक के सबसे अंदरूनी हिस्से में शुष्कता, भूख का अभाव,गंधलोप,स्वादलोप, जी मिचलाना, पेट में ऐंठन, दर्द, डायरिया/डिसेन्ट्री,अन्य गैस्ट्रो-इन्टेस्टीनल दिक्कतें इत्यादि लक्षण हो तो समझ जायें कि आप कोरोना पीड़ित हैं। विश्वास नहीं तो रैपिड टेस्ट करवा कर देख लें। यह टेस्ट आपके नजदीकी स्वास्थ्य केंद्र पर मुफ्त उपलब्ध है। यह जाँच लगभग 80% विश्वसनीय है। लक्षण हो और टेस्ट रिपोर्टें निगेटिव आये तो भी खुशफहमी न पाले बल्कि समझ जायें कि अब खुद को घर के एक कोने में समेट लेने का समय आ गया है। 

2️⃣ कोरोना पाजिटिव कन्फ़र्म हो जाएँ तो क्या करें?

 ■■ याद रहे शरीर को पूर्ण निष्क्रियता से बचाएँ। साफ-सफाई पर ध्यान दें। रोज स्नान करें। कमरे में कुछ धुप आती है तो बहुत अच्छी बात है। गरमी,नमी और अंधेरे से फंगस की उत्पत्ति और वृद्धि होती है। (कोरोना के साथ अब ब्लैक फंगस संक्रमण के द्वारा म्यूकर-माइकोसिस नामक जानलेवा फौलोअप बीमारी भी हो रही है)   



                                               टेस्ट या बिना टेस्ट जब कंफर्म हो जाए कि आप कोरोना पाजिटिव हैं तो पहले दिन ठोस आहार छोड़ दें। दो लीटर से कुछ अधिक विभिन्न ताजे फलों के रस जिसमें नारियल पानी (डाभ),मुसम्बी,नारंगी शामिल हैं अलग-अलग व्यवस्थित कर लें। दिन भर में पूरा जूस पी जायें। दूसरे दिन भी ऐसा ही करें थोड़े परिवर्तन के साथ। आधा लीटर जूस कम कर खीरा और सेव को शामिल करें। तीसरे दिन फ्रूट सलाद या फल की मात्रा बढा लें। यहाँ सलाद से हमारा मतलब केवल फल-सब्जियों के स्लाइस्ड मिक्स से  है। प्याज, हरी मिर्च, सलाद क्रीम,toppings इत्यादि का प्रयोग नहीं करना है । खीरा के साथ नींबू का रस उपयोग किया जाना जरूरी है। काजू,पिस्ता,बादाम,अखरोट इत्यादि ड्राई फ्रूट्स के बारे में तो सोचें भी नहीं। चौथे दिन से धीरे-धीरे सुपाच्य  हल्के ठोस आहार की दिशा में बढ़े। इसमें बार्ली,,दलिया, मूँग दाल +चावल की खिचड़ी को शामिल कर सकते हैं। मगर मुसम्बी, खीरा,नींबू, ताजे फलों का सेवन जारी रखें। आप जल्द ही स्वस्थ्य हो जायेंगे। वो भी बिना किसी दवा के!अगर दवा खाने की तलब परेशान करे तो सुबह शाम चुटकी भर गिलोय चूर्ण शहद या मिस्री के साथ ले सकते हैं अथवा टीनोस्पोरा कार्डिफोलिया मदर टिन्कचर नामक होमियोपैथिक दवा ले सकते हैं। पारासेेटामोल का उपयोग केवल तभी करें जब बुखार 100° फारेनहाइट से बढने लगे ।लाइसेंसधारी मौत के सौदागरों के चंगुल में फंसे तो भैया उपर का टिकट रिजर्व समझो।जेब में पैसा है, दिल में मौत का खौफ है तो अस्पताल जरूर जाना चाहोगे। हमने तो इन्सानी फर्ज समझ कर सच्चाई बयां करी,बाकी आपकी मर्जी। 

3️⃣ मनःस्थिति 

 मेरे जान-पहचान के अनेक लोग जिन्हें कोरोना वायरस रूपी काल अपने गाल में समा चुका है पहले से किसी गंभीर बीमारी से पीड़ित नहीं थे।किन्तु कोरोना के हल्के प्रभाव से ही दुनिया छोड़ गए। उनकी समस्या जिस्मानी कम और दिमागी ज्यादा थी।मौत का डर,घबड़ाहट और टीवी-सोशल मीडिया पर चल रहे भौकाल से अत्यधिक प्रभावित होना ही उनकी जान का दुश्मन बन गया। शायद आप ने भी देखा-सुना होगा कि कई बार पानी के विषहीन ढोरवा सांप के काटने पर भी लोग मर जाते हैं। वे सांप के ज़हर से नहीं, अपनी मानसिकता की वजह से मरते हैं। वही कंडीशन्स आज कोरोना से होने वाली एक तिहाई मौतों के संदर्भ में लागू होती है। 

4️⃣ जिन्दा बचने के उपाय 

■ हौसला बुलंद रखें। 

■ बिल्कुल न घबराये 

■ सोचें यह एक प्रकार का जुकाम है, मेरा कुछ नहीं बिगड़ा सकता। 

■ शरीर को राहत देने वाले आहार-विहार,नियम-संयम का पालन करते रहें। 

 ■ निम्नलिखित मंत्र का जाप दिन में 24 बार करते हुए अपनी भावनाओं को संयत रखें-  " जो डर गया समझो मर गया "


 


वर्तमान परिदृश्य में कैसे जियें

 आधुनिकता के दौड़ में दुनिया सरल से जटिल, सादगी से विलासिता की ओर अग्रसर है। विभिन्न वैज्ञानिक आविष्कारों, तकनीक के उपयोग से जीवन को आरामदेह और सहज बनाने में मदद मिली है। परन्तु किसी भी चीज की अति अच्छी नहीं होती है। विकास के बेलगाम रथ पर सवार तथाकथित सभ्य समाज की जो रोजाना की जीवन शैली संघटित हुई है वो कुछ ज्यादा ही असंतुलनकारी साबित हो रही है। उच्च पोषक मानकों के अनुरूप और अच्छा भोजन गटकने के बावजूद स्वास्थ्य ठीक नहीं रहता। ढीला शरीर, मोटा पेट,झुके कंधे, गंजी खोपड़ी, डायबीटीस-ब्लडप्रेशर से पीड़ित हांफता काँपता शरीर और चिता-तनावयुक्त अन्यमनस्क चिड़चिड़ा दिमाग लिए घूम रहा है आज हर इन्सान।  कैंसर, हृदय रोग, मनोविकार जैसे विरल रोगों से ग्रसित होने वालों की संख्या में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है।

 क्या हैं  इन सब विसंगतियों के मूल में?

क्या आपने कभी सोचा है?

यदि नहीं सोचा तो अब सोंच लीजिए। 

क्योकि सवाल आपकी जिन्दगी का है।

वरना भेड़ और आप के बीच क्या अंतर रह जाएगा?

मेरा मानना है कि चर्चा कीजिए अपने आप से।दूसरों के साथ बिलकुल नहीं। गलतियाँ इनसान से हीं होती हैं। अपने आप से कन्फेस करें और यथासंभव गलतियो को सुधारने की एक इमानदार कोशिश कर के देखें। कोई अन्य हमारी गलतियाँ बताए तो 'ईगो हर्ट' होता है। हमारा मन सीधे तौर पर नाग की भांति व्यवहार करता है। या यूँ कहें कि यहां पर भी न्यूटन के गति का तीसरा नियम लागू होता है -- "प्रत्येक क्रिया के बराबर और विपरीत प्रतिक्रिया होती है "।
                          जीने के सटीक तरीके जानना चाहते हैं तो इस ब्लॉग को सब्सक्राइब करें, कमेन्ट करे।अगला ब्लॉग इसी आलेख का दूसरा भाग है। 

How to survive in current scenario

 In the race for modernity, the world is moving from simple to complex, from simplicity to luxury. The use of various scientific inventions, technology has helped to make life comfortable and comfortable. But nothing is very good. The daily lifestyle of the so-called civilized society riding on the unbridled chariot of development is proving to be more imbalanced. Health is not healthy despite conforming to high nutritional standards and eating good food. Loose body, fat belly, bended shoulders, balmy skull, gasping trembling body suffering from diabetes-blood pressure, and chirpy-absent minded irritable brains, everyone is wandering today.There has been an unprecedented increase in the number of people suffering from rare diseases like cancer, heart disease, dementia.

  What are the origins of all these discrepancies?

Have you ever thought?

If you have not thought, think now.

Otherwise what will be the difference between the sheep and you?

I believe discuss it with yourself. Not at all with others. Mistakes happen only from humans. Confess with yourself and try to make as honest an attempt to correct mistakes as possible. If someone else tells our mistakes, 'Ego hurt' happens. Our mind directly behaves like a snake. Or simply say that Newton's third law of motion applies here - "every action has an equal and opposite reaction".

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कोरोना काल: एक मूल्यांकन


🎯चाइना के वू हान क्षेत्र में वर्ष 2019 के उत्तरार्ध से ही सामान्य फ्लू से भिन्न श्वास संस्थान,शरीर के ताप नियन्त्रण एवम् समन्वय प्रणाली पर तीव्र प्रभाव डालने वाली संक्रामक बीमारी का प्रसार होने लगा था।बड़ी संख्या में मौतें भी होने लगी।पता चला कि यह रोग किसी नये प्रकार के वायरस के कारण उत्पन्न हो रहा है।WHO और चीनी लैब्स के प्रयास से पता चला कि यह नया वायरस एन्फ्लुएंज़ा उत्पन्न करने वाले लगभग 250 से 300 प्रकार के वायरसों के समूह में से ही निकल कर किस न किसी कारण से म्यूटेंट होकर कहर ढा रहा है।चूँकि इसका प्रकोप 2019में हुआ था तो WHO ने नाम दिया COVID-19! इसे वैज्ञानिक शब्दावली में सार्स-कोव 2 या नोवल कोरोना वायरस भी कहते हैं।

                  ✍✍    दर असल कोरोना शब्द लातीनी भाषा का है जिसका अर्थ मुकुट होता है।इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोप से देखने पर इसके इर्द-गिर्द उभरे हुए काँटो जैसे ढाँचे मुकुट का आभास कराते हैं।120 नैनो मीटर व्यास वाले इस वायरस की रासायनिक बनावट RNA,प्रोटीन और लिपिड के तानेबाने में गुथी है।उपरी परत लिपिड यानि वसा से बनी होती है।अन्य भाग प्रोटीन से तथा भीतरी भाग में जेनेटिक मटेरियल RNA से बना है।RNA आधारित वायरस में रूप बदलने की अद्भुत क्षमता होती है।अर्थात् यह सतत म्यूटेशन(उत्परिवर्तन) सक्षम वायरस है।इसीलिये कोरोना वायरसजन्य बीमारी के विरुद्ध  स्थायी समाधान पाना यानि सफल वैक्सीन बनाना सम्भव नहीं है।गरम पानी और साबुन से 1 मिनट तक अच्छी तरह रगड़ कर हाथ धोने की सलाह ड़ी जाती है क्यौंकि साबुन लिपिड अणु से बने वायरस के सुरक्षा परत को तोड़कर इसे नष्ट करने में सक्षम है।

                    🌎✍       2019 के अन्त तक कोरोना काफी हद तक चीन के वूहान प्रांत तक ही सीमित था।परन्तु तब न तो WHO और न चीन को खयाल आया कि संक्रमण क्षेत्र से बाहर आना और भीतर जाना रोक दिया जाय ताकि ग्लोबल स्प्रेड से बचाव सम्भव हो सके।

परिणाम: दिसंबर 2019से जनवरी 2020 तक पहले इटली व ईरान फिर योरोपीय देशों सहित USA ने फैलने लगा।इसी क्रम में भारत-USA जॉइंटवेंचर 'नमस्ते ट्रम्प' इवेंट 24-25 फ़रवरी 2020 आयोजित हुआ।सरदार पटेल स्टेडियम अहमदाबाद गुजरात में सम्पन्न 2 दिवसीय कार्यक्रम में 1 लाख से अधिक लोगों ने भाग लिया।भारत में कम्युनिटी स्प्रेड तो यही से शुरु हो गया।समय रहते रोकथाम के लिए जरूरी उपाय नही किये गये।और जब भारत में कोरोना फैला तो सारी दुनिया की तरह काफी तेजी से फैला।देश की राजधानी दिल्ली में जब हडकंप मचा तो इस विकराल आपदा के समय भी गंदी राजनीति का खेल खेला गया और 1-21मार्च 2020 के बीच निजामुद्दीन औलिया की मजार पर आयोजित हो रही तब्लीग जमात के सालाना अन्तर्राष्ट्रिय कॉन्फ़्रेस पर प्रशासनिक नाकामियों का ठीकरा फोड़ दिया।पूरी समस्या का दोष एक समुदाय विशेष पर थोप कर मीडिया ट्रायल में खलनायक,देशद्रोही और ना जाने क्या क्या साबित कर दिया।

               🙏'नमस्ते ट्रम्प' के ठीक एक माह बाद 24 मार्च 2020 को भारत सरकार ने 21 दिनॉ का प्रथम लॉक डाउन घोषित कर दिया।इसके पहले प्रधानमंत्री के आह्वान पर 22 मार्च को जनता कर्फ़्यू सेलेब्रेट किया गया।इसी दिन शाम को 5 बजे कोरोना के खिलाफ 'महान एतेहासिक' युद्धघोष किय गया 5 मिनट तक पुरे देश में घर-घर ताली-थाली,घंटा-घंटी बजाकर।प्रधानमंत्री ने कहा था कि कोरोना योद्धाओं के सम्मान में घरों की छत, बालकनी,बरामदे,विण्डो पर खड़े होकर ठीक 5 pm पर 5 मिनट के लिए ताली,थाली,घंटी,ड्रम आदि बजाये।यहां तक तो ठीक था पर पर कुछ तथाकथित वैज्ञानिकों ने ध्वनि के अनुनाद,मन्त्र चिकित्सा,विषाणुओं पर इनके प्रभाव इत्यादि को लेकर इस आयोजन के समर्थन में जबर्दस्त वैज्ञानिक एंगल खोज निकाला।इनमे प्रमुख थे IIT व BHU में काम करने वाले प्रो0 बी0एन0 द्विवेदी (भौतिकी) और इलाहाबाद केन्द्रीय विश्वविद्यालय के प्रो0 के0 एन0 उत्तम(भौतिकी)।इनके अनुसार घंटा-घंटी बजाने से वातावरण में कम्पन उत्पन्न होता है जो काफी दूर तक जाता है।इस कम्पन का फायदा यह है कि इसके क्षेत्र में आने वाले सभी जीवाणु,विषाणु और सूक्ष्म जीव आदि नष्ट हो जाते हैं,जिससे आसपास का वातावरण शुद्ध हो जाता है।मेरा तो विचार है कि भारत सरकार के विज्ञान एवम् प्रोद्योगिकी विभाग को इस 'मौलिक अनुसंधान ' के लिए इन वैज्ञानिकों को सम्मानित करते हुए नोबल पुरस्कार के लिए नामित करना चाहिए।कुछ लोगों का कहना है कि PM मोदी जी भी 'अविष्कार' करते रहे हैं।उदहारण के लिए गंदे नाले/गटर की गैस का ईंधन के रूप में इस्तेमाल कर चाय बनाने का मॉड्यूल।

                                     ⚓  लॉकडाउन 1 जो 25मार्च से 14 अप्रैल तक चला आपातकल के साथ कर्फ्यू का भी एहसास आम जनता को करा गया।इसी दरम्यान 5 अप्रैल को फिर PM  को कुछ करने का मन हुआ।'मन की बात' तो वे वैसे भी करते रहते हैं।टेलीविज़न पर प्रकट हुए और जनता से उनके 9 मिनट 9 बजे रात से माँग लिए। पूरे देश में 9 मिनट के लिए बिजली गुल कर के टॉर्च,मोमबत्तियाँ,चिराग,दीपक,मोबाईल से बालकनी,छत,घरों के दरवाज़े,खिड़कियो पर खड़े होकर रोशनी फैलाने की कोशिश की गई ।चैत महीन में दीवाली मना ली गई,वो भी भयानक आपदा,दुख और संकट की घड़ी में! सीता-राम-लक्ष्मण के वनवास पूर्ण कर अयोध्या लौटने की खुशी में मनायी गयी दीवाली को लोग हर साल कार्तिक माह की अमावस्या को परम्परा के रूप में सेलिब्रेट करते रहे हैं।इस लिहाज़ से देखा जाए तो मोदी जी ने अपने इस कार्य से क्रांतिकारी संदेश दिया है।परम्पराओ के नाम पर फिजूलखर्ची  नहीं करनी चाहिए और दुख,निराशा,भय के माहौल में नवीन साहस व उत्साह के सृजन हेतु 9 मिनट वाली दीवाली मनानी चाहिए । मगर अफसोस कि देश समझदार नही निकला।फिजुल्खर्ची बदस्तूर जारी है।फिर मोदी जी ने सोचा- ना रहेगा बांस,न  बजेगी बाँसुरी ।लॉकडाउन 1 से 4 तक 68 दिन और अन्लॉक 1 से 4 अबतक 102 दिन यानि कुल 170 दिन(6 महीने में 10 दिन कम ) ज्यादातर लोगों की कमाई शिफ्फर और जिन्दा रहने को खर्च पूरा होने के कारण जेबेँ खाली हो गई।लो अब कर लो फिजुल्खर्ची!!अगस्त माह में GDP पहली बार निगेटिव हुई।आज यह --23•9%तक गिर गई है।ये तो हालत की एक झलक मात्र है,ट्रेलर है।पिक्चर अभी बाकी है मेरे दोस्त।

How to stay safe from Corona

 Corona is a viral communicable disease declared by the WHO (World Health Organization) and the health regulatory units of various countries as epidemic and, interestingly, the definition of 'epidemic' already given on the WHO website According to this it is not an epidemic. In the guise of an epidemic in India, a type of 'emergency' with special provisions was implemented and named 'Lakadoun'. With the help of police, such protocols were implemented which created an atmosphere of panic, panic and strong insecurity. Gone. Millions of people had to leave their livelihood and migrate thousands of kilometers on foot, bicycle, small trains to their native places thirsty.


Result: - Thousands of people lost their lives at the hands of accidents, odd conditions and heartless governance instead of disease.


 The ICMR stated that the following guidelines must be strictly followed to prevent the spread and infection of the virus until an effective vaccine is available - ● Physical distance / social distance (2 yards)


the use of chewable smokeless tobacco and stay where it is.

 Use of Moscow covering the nose and mouth at workplaces and public places


● Handwashing with soap, handin-rub, sanitizer use


● It is very important to avoid

● Balanced diet, physical activity, exercise is also very important.


Of these measures, maintaining at least 2 yards of distance from person to person is completely scientific and practical. Hands with soap are also necessary when you touch the potential source / surface of the virus. These possible sources could be currency notes, coins, door handles, buses, trains, handcuffs of autos, shop counters, etc. However, the shape of the mask and the size of the virus are somewhat similar in that there is no restriction to the virus. That is, the mask is not practically effective, and ulcers prove to be troublesome for people with slow breath, asthma, cough, chronic broncho-pneumonia, and heart disease. Despite this, the only goal of the police is to get the title of 'Corona Warrior' by killing people with no mask. That means, whether you can save the mask from corona or not, it can definitely protect it from police poles.


           In the end, it is definitely necessary to say that the media, after reading from the social media, should not consume so-called anti-prohibition / drugs at all. Similar measures to avoid Kovid-19 are generally enough. Stay tuned and subscribe to the blog for more and updated information. Corona, Social Distance

E. Coli infection and its Homeopathic solutions

 ई. कोलाई (E. coli) संक्रमण के लक्षण अलग-अलग हो सकते हैं, यह इस बात पर निर्भर करता है कि किस प्रकार का ई. कोलाई बैक्टीरिया संक्रमण कर रहा है...