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Crop cutting machines : suitable for small farmers
कंटोला यानि स्पाइन गौर्ड
कंटोला, जिसे वैज्ञानिक रूप से मोमोर्डिका डियोइका के नाम से जाना जाता है, कुकुर्बिटेसी परिवार से संबंधित एक उष्णकटिबंधीय बेल का पौधा है। इसे टीसेल लौकी, स्पाइनी लौकी और चठैल जैसे अन्य नामों से भी जाना जाता है। यह पौधा भारतीय उपमहाद्वीप और दक्षिण पूर्व एशिया का मूल निवासी है और अपने खाद्य फलों (सब्जी) के लिए लोकप्रिय रूप से उगाया जाता है।कुछ लोग इसे सबसे ताकतवर सब्जी कहते हैं तो कुछ इसके स्वाद के दीवाने हैं।फाइबर ,मिनरल्स और एंटीऑक्सीडेंट्स से भरपूर चठैल एक महँगी सब्जी है।सामान्यतः यह एक जंगली या प्राकृतिक रूप से उगने वाली सब्जी है किन्तु पिछले कुछ दशकों से इसकी खेती भी की जाने लगी है। बाजार में इसकी मांग की तुलना में आपूर्ति बहुत कम है।अतः इसकी खेती में व्यावसायिक संभावनाएं बहुत ज्यादा हैं।
स्पाइन लौकी उगाने में आपकी मदद के लिए यहां कुछ दिशानिर्देश दिए गए हैं:
जलवायु: स्पाइन लौकी गर्म और आर्द्र जलवायु में पनपती है। इसके अंकुरण और विकास के लिए न्यूनतम तापमान लगभग 70°F (21°C) की आवश्यकता होती है। यह आमतौर पर उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में बारहमासी के रूप में उगाया जाता है, लेकिन ठंडी जलवायु में इसकी वार्षिक खेती भी की जा सकती है।
मिट्टी: पौधा अच्छी जल निकासी वाली मिट्टी पसंद करता है जो कार्बनिक पदार्थों से भरपूर हो। भात करेला की खेती के लिए थोड़ा अम्लीय से तटस्थ पीएच स्तर (लगभग 6.0-7.0) उपयुक्त है। सुनिश्चित करें कि मिट्टी ढीली और उपजाऊ हो।
सूर्य का प्रकाश: कंटोला को उगने और फल पैदा करने के लिए बहुत अधिक सूर्य के प्रकाश की आवश्यकता होती है। दिन में कम से कम 6-8 घंटे पूर्ण सूर्य के संपर्क में रहने वाला स्थान चुनें।
रोपण: आप कंटोला के बीजों को घर के अंदर बीज ट्रे में बोना शुरू कर सकते हैं या सीधे बगीचे में बो सकते हैं। यदि आप घर के अंदर बीज बोना शुरू कर रहे हैं, तो उन्हें अपने क्षेत्र में आखिरी ठंढ की तारीख से 4-6 सप्ताह पहले बोएं। जब पाला पड़ने की सारी संभावनाएँ समाप्त हो जाएँ तो पौधों को बाहर रोपें। कंटोला के बीज को मिट्टी में लगभग 1 इंच गहराई में लगाना चाहिए।बीजों के बजाए कंटोला को उगाने के लिए इसके कंद का उपयोग भी किया जा सकता है यह अपेक्षाकृत अधिक फायदेमंद तरीका है क्योंकि इससे उगने वाले पौधे जल्दी बढ़ते हैं और इनमें फल भी जल्दी लगते किंतु इनसे खेती करना बड़े पैमाने पर कठिन है। वास्तव में एक पूर्ण विकसित पौधे के नीचे सीमित मात्रा में कंद लगते हैं।अतः बड़े पैमाने पर इसकी खेती के लिए कंद का उपयोग करना संभव नहीं है।बीज कहां उपलब्ध है?यहां क्लिक करें
दूरी: पौधों को फैलने और चढ़ने के लिए पर्याप्त जगह दें। विकास के लिए पर्याप्त जगह प्रदान करने के लिए प्रत्येक पौधे के बीच कम से कम 3-5 फीट का अंतर छोड़ें।
पानी देना: मिट्टी को लगातार नम रखें लेकिन जलभराव न रखें। नियमित रूप से पानी देना महत्वपूर्ण है, खासकर सूखे के दौरान। सावधान रहें कि अधिक पानी न डालें, क्योंकि अत्यधिक नमी से जड़ें सड़ सकती हैं।
जाली और समर्थन: स्पाइन लौकी एक जोरदार पर्वतारोही है, इसलिए जालीदार सपोर्ट, बाड़, या अन्य सहायता संरचनाएं प्रदान करना आवश्यक है। इससे पौधे को लंबवत रूप से बढ़ने में मदद मिलेगी और आपके बगीचे में जगह की बचत होगी। सुनिश्चित करें कि समर्थन लताओं और फलों का वजन सहन करने के लिए पर्याप्त मजबूत है।
उर्वरक: रोपण से पहले मिट्टी को समृद्ध करने के लिए जैविक खाद या अच्छी तरह सड़ी हुई खाद का उपयोग करें। आप स्वस्थ विकास और फलों के विकास को बढ़ावा देने के लिए बढ़ते मौसम के दौरान संतुलित उर्वरक भी डाल सकते हैं।
कीट और रोग नियंत्रण: स्पाइन लौकी कुछ कीटों जैसे एफिड्स, ककड़ी बीटल और व्हाइटफ्लाइज़ के लिए अतिसंवेदनशील होती है। नियमित रूप से अपने पौधों का निरीक्षण करें और कीटों के संक्रमण को नियंत्रित करने के लिए उचित उपाय करें, जैसे कि जैविक कीटनाशकों का उपयोग करना या लाभकारी कीटों को शामिल करना। फंगल रोग स्पाइन लौकी को भी प्रभावित कर सकते हैं, इसलिए जोखिम को कम करने के लिए अच्छा वायु परिसंचरण सुनिश्चित करें और ओवरहेड पानी देने से बचें।
कटाई: स्पाइन लौकी के फल आमतौर पर तब काटे जाते हैं जब वे अभी भी छोटे और कोमल होते हैं, आमतौर पर लंबाई में लगभग 2-3 इंच होते हैं। नियमित रूप से कटाई करने से पौधे को अधिक फल पैदा करने के लिए प्रोत्साहन मिलता है। बेल से फल काटने के लिए तेज़ चाकू या छंटाई वाली कैंची का उपयोग करें।
इन दिशानिर्देशों का पालन करके, आप सफलतापूर्वक स्पाइन लौकी उगा सकते हैं और इसके स्वादिष्ट फलों का आनंद ले सकते हैं। शुभ बागवानी!
मिर्च की खेती कैसे करे
रेड चिल्ली यानी लाल मिर्च सबसे प्रमुख मसाला है। भारतीय मसालों में यह सबसे प्रमुख है। इसका उपयोग खाने को स्वादिष्ट और चटपटा बनाने के लिए भारत ही नहीं विभिन्न देशों में किया जाता है। इसका उत्पादन भारत के अनेक राज्यों में होता है जिनमें आंध्र प्रदेश और तेलंगाना सबसे प्रमुख हैं। देश के कुल उत्पादन का 57% मिर्च अकेले आंध्र प्रदेश से आता है। अन्य उत्पादक राज्य कर्नाटक,मध्य प्रदेश,पश्चिम बंगाल गुजरात और उत्तर प्रदेश हैं। वैसे कमोवेश लगभग पूरे भारत में इसे उगाते हैं। सूखी लाल मिर्च के अतिरिक्त ताजी हरी मिर्च भी उपयोग में लाई जाती है। आंध्र प्रदेश के गुंटूर जिले की ख्याति मिर्च उत्पादन के लिए सबसे अधिक है।
मिर्च की खेती कैसे करें :
वैसे तो मिर्च सालों भर मिलती है हरी मिर्च हो या फिर सूखी लाल मिर्च । वर्ष में 3 बार मिर्च की रोपाई होती है किंतु सभी क्षेत्रों में ऐसा नहीं होता है। हल्की दोमट और बलुई मिट्टी इसकी खेती के लिए बहुत उपयुक्त मानी जाती है। ध्यान रहे इसकी खेती के लिए ऐसी जमीन का चयन करें जिसमें जलजमाव बिल्कुल ना होता हो। जलजमाव की स्थिति में पत्तियां पीली होकर फसल सूख जाती है।
कब-कब करें रोपाई
आमतौर पर मुख्य फसल के रूप में मिर्च की नर्सरी जुलाई से अगस्त तक लगाई जाती है और खेतों में पौधों को अगस्त से सितंबर के बीच लगाते हैं। जबकि गरमा फसल की नर्सरी जनवरी से फरवरी तक लगाते हैं और नर्सरी से पौधों को उखाड़ कर खेत में फरवरी से मार्च के पहले हफ्ते तक लगाते हैं।
पौधशाला की तैयारी : मिट्टी को खूब भुरभुरी कर खरपतवार के अवशेष और मोथा की जड़े यथासंभव निकाल ले। अच्छी तरह सड़ी हुई गोबर की कंपोस्ट खाल मिट्टी में मिलाएं और 10 सेमी ऊंची 30 सेमी चौड़ी क्यारियां बनाएं और इसमें फंगीसाइड थीरम (Therum) या कैप्टान से उपचारित बीज डालें।
उन्नत बीज और उसकी मात्रा : एक हेक्टेयर खेती के लिए 1 किलोग्राम बीज सामान्यता पर्याप्त होता है किंतु अंकुरण एवं प्रभावित करने वाले बाह्य कारकों के संभावित प्रभाव को देखते हुए सवा किलो बीज की अनुशंसा की जाती है। सामान्यतः इसकी निम्नांकित प्रजातियां प्रचलित है : - सबौर अंगार,पूसा ज्वाला,कल्याणपुर लाल, पंत-1, भाग्यलक्ष्मी, आंध्र ज्योति, किरण, अपर्णा, एनपी- 46 ए, आरसीएच-1, मथानिया लॉन्ग, चाइना। उत्तर बिहार में सबसे अधिक लाल मिर्च के उत्पादन के लिए चाइना प्रजाति का उपयोग किया जा रहा है।
खेत की तैयारी : 200 क्विंटल कंपोस्ट प्रति हेक्टेयर की दर से खेत में समान रूप से फैलाकर जोताई करें। दो तीन बार जोत कर मिट्टी को नरम और भुरभुरी बना ले। अंतिम जुताई के पहले अनुशंसित मात्रा में रासायनिक उर्वरक भी डाल दें।
उर्वरक : सिंगल सुपर फास्फेट 3 क्विंटल प्रति हेक्टेयर, म्यूरेट ऑफ पोटाश( MoP) 1 क्विंटल प्रति हेक्टेयर और यूरिया 3 क्विंटल प्रति हेक्टेयर। इसमें से फास्फेट और पोटाश की पूरी मात्रा और यूरिया की एक तिहाई मात्रा अंतिम जुताई के दौरान डालें । शेष यूरिया 25 दिनों के अंतराल पर दो बार मेंआधा-आधा उपयोग में लाएंगे।
खेत में पौधारोपण: सामान्यतः नर्सरी में पौधे 25 दिन से 1 महीने के बीच रोपण करने लायक तैयार हो जाते हैं।रोपण के लिए पौधों को उखाड़ने के समय ध्यान दें की जड़े न टूटे। पौधों की जड़ों को मोनोक्रोटोफॉस 36 एसएल के एक मिली प्रति 1 लीटर पानी में सलूशन बनाकर उपचारित करें।अब इन्हें कतार से कतार 45 सेंटीमीटर और पौधे से पौधे की दूरी 30 सेंटीमीटर रखते हुए खेत में लगाएं। कतार सीधी रखने के लिए रस्सी का उपयोग कर सकते हैं। रोपण के बाद प्रत्येक पौधे के पास हल्की सिंचाई करें ताकि जड़ों और मिट्टी के बीच सीधा संपर्क बन सके और पौधे मृत होने से बचे।2 दिन बाद फिर से हल्की सिंचाई करें।
सामान्य देखभाल : प्लांटेशन के 10 दिन बाद खुरपी से प्रत्येक पौधे के आसपास मिट्टी भुरभुरी करें और यदि खरपतवार उग रहे हो तो उन्हें निकाल दें। और 25 दिन बाद सामान्य सिंचाई करें तथा बची हुई यूरिया में से आधी मात्रा पूरे खेत में समान रूप से डाल दें। सिंचाई के समय दानेदार दवा थाईमेट 10 जी 500 ग्राम प्रति कट्ठा डाल दें उससे पौधों में बहुत सारे कीड़े और फफूंद नहीं लगेंगे।ध्यान दें की वायरस से फैलने वाला पत्र संकोचन रोग न फैले अन्यथा फसल की उत्पादकता बाधित हो जाएगी। जैसे ही किसी पौधे पर करली लीफ अथवा पत्र संकोचन रोग के लक्षण देखें उसे सावधानीपूर्वक उखाड़ कर जलाकर नष्ट कर दें । क्योंकि वायरस रोग को कीड़े मकोड़े फैलाते हैं अतः प्रिकॉशन के तौर पर Dimethoate 30EC 1 ml प्रति लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करें। 30 से 40 दिन में फूल आने लगते हैं और उत्पादन आरंभ हो जाता है।
फल और उसका संग्रहण : यदि आपको हरी मिर्च का उत्पादन करना है तो बाजार की मांग के अनुसार पकने से पहले किंतु पूरी तरह विकसित मिर्ची को तोड़कर बेच सकते हैं। यद्यपि हरी मिर्च का मूल्य सूखी मिर्च के मुकाबले बहुत कम होता है किंतु वजन कई गुना अधिक होता है। इससे कुल फसल अवधि में अधिक से अधिक बार फलन प्राप्त कर सकते हैं और उत्पादकता बढ़ा सकते हैं। किंतु यदि स्थानीय रूप से हरी मिर्च का भाव और मांग कम हो तो मिर्च को लाल होने के बाद तोड़े और अच्छी तरह सुखा कर वायु अवरुद्ध बोरियों में संग्रहित करें।
उत्पादन : सामान्यतः 15 से 20 क्विंटल प्रति हेक्टेयर सुखी लाल मिर्च का उत्पादन होता है। किंतु केवल हरी मिर्च का उत्पादन करें तो यह मात्रा 200 से 250 क्विंटल प्रति हेक्टर हो जाती है।
उत्पादन लागत : कंपोस्ट 200 क्विंटल का मूल्य ₹15000/-, उर्वरक एवं कीटनाशक 11,000/-, जोताई ₹15000/-, लेबर कंपोनेंट ₹15000/-, सिंचाई 10,000/- बीज 20 से 25000/- अर्थात 1 हेक्टेयर मिर्च की खेती में कुल लागत ₹90000/- आने की संभावना है। स्थानीय बाजार अथवा आपके द्वारा चुने गए ब्रांड के अनुरूप लागत में परिवर्तन हो सकता है।
आउटपुट : न्यूनतम उत्पादन 15 क्विंटल प्रति हेक्टेयर ले तो ₹150/- प्रति किलोग्राम के हिसाब से उत्पादन का कुल मूल्य 225000/- आता है। इस प्रकार लागत के मुकाबले 150% का मुनाफा प्राप्त होता है। 5 महीने में 90000 इन्वेस्ट कर 135000/- का मुनाफा वह भी खेती से मजाक नहीं है। किसान भाई और युवा वर्ग इस खेती में सन्निहित अपार संभावनाओं के द्वार अपनी मेहनत और व्यवसायिक सोच के सहारे आसानी से खोल सकते हैं।
पालक घर पर उगाए
पालक एक पत्तेदार सब्जी है जिसे गमलों, बगीचों, बालकनियों, पिछवाड़े और छतों पर उगाया जा सकता है। यह एक बहुपयोगी सब्जी है जिसे सलाद में कच्चा भी परोसा जा सकता है या साइड डिश के रूप में पकाया जा सकता है।पालक-पनीर की लोकप्रियता से तो सभी वाकिफ हैं।
कहाँ उगायें? : गमला
- गमले: पालक अच्छी जल निकासी वाले गमलों और बर्तनों में अच्छी तरह से उगता है जिससे उसमें पानी का जमाव नहीं होता है। पालक लगाने का सबसे अच्छा समय पतझड़ या सर्दियों के महीनों में होता है जब मौसम बहुत गर्म नहीं होता है।
बीज कहाँ से लें?
स्थानीय बीज दुकान जो विश्वसनीय हों अथवा ऑनलाइन मर्चेंट से ले सकते हैं।यहाँ लें।
उपयुक्त स्थान
- गार्डन: पालक को बगीचों की सीमाओं पर अच्छी तरह से लगाया जाता है जहां सूरज की रोशनी और इसके बढ़ने के लिए जगह होती है। इसे काफी गहराई तक लगाने की जरूरत है ताकि इसके आसपास के अन्य पौधों द्वारा परेशान किए बिना इसके बढ़ने के लिए जगह हो।
- बालकनी: अगर आपके घर में जगह सीमित है तो पालक उगाने के लिए बालकनी एक बेहतरीन जगह है क्योंकि आमतौर पर ये काफी छोटी होती हैं। आपको अच्छी धूप प्रदान करने की आवश्यकता है और सुनिश्चित करें कि पौधों को फैलने और ठीक से बढ़ने के लिए पर्याप्त जगह है ताकि वे न हों
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घर पर पालक उगाना मुश्किल नहीं है। आपको बस एक बर्तन, थोड़ी मिट्टी और थोड़ा पानी चाहिए।
स्टेप्स:
1) बर्तन को खाद मिट्टी और कोकोपिट से भरें और सुनिश्चित करें कि उसके बीच में एक जल निकासी छेद हो।
2) बीजों को गमले के अंदर डालें, उन्हें मिट्टी और पानी से अच्छी तरह ढक दें।
3) गमले को धूप वाली जगह पर या अपनी बालकनी या छत के ऊपर रखें
4) जैसे ही पालक बढ़ने लगे, इसे स्वस्थ रखने के लिए हर कुछ हफ्तों में खाद डालें और सिंचाई करें।
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घर पर पालक उगाने का सबसे आसान तरीका है गमलों में।
पालक को गमलों में उगाने की सबसे अच्छी बात यह है कि आप इसे कहीं भी रख सकते हैं, यहां तक कि बालकनी या पिछवाड़े में भी। और तो और, अगर आपको पौधों को अपने किचन गार्डन में और अपने घर से दूर ले जाने की आवश्यकता है, तो यह काफी आसान काम भी होगा।
सबसे पहले, एक बर्तन चुनें और इसे मिट्टी से भर दें (जैविक खाद का उपयोग करना सबसे अच्छा है)। आकार की बात करें तो पालक के बीज के लिए 10-15 सेमी गहरा बर्तन ठीक रहेगा। बीजों को लगभग 5-6 सेंटीमीटर की दूरी पर रोपें क्योंकि इससे उन्हें अंकुरित होने पर बढ़ने के लिए जगह मिलेगी और फिर भी उनकी पत्तियों को फैलने के लिए पर्याप्त जगह मिल जाएगी। इस बात का ध्यान रखें कि उन्हें कितने पानी की जरूरत है और वाष्पित होने पर और मिलाते रहें।
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अगर आप ताजा पालक की अपनी फसल उगाना चाहते हैं, तो प्रक्रिया शुरू करने से पहले आपको कुछ चीजें जाननी होंगी।
पहली चीज़ जिसकी आपको आवश्यकता होगी वह है पालक उगाने के लिए एक कंटेनर। यह या तो एक बर्तन या मिट्टी के साथ एक उठा हुआ बिस्तर हो सकता है। आपको अपने कंटेनर में मिट्टी डालनी चाहिए और उसके कंटेनर के नीचे एक समान परत बनाने के लिए प्रतीक्षा करनी चाहिए। फिर आपको मिट्टी की परत के ऊपर कुछ खाद डालनी चाहिए और इसे तब तक मिलाना चाहिए जब तक कि यह आपके कंटेनर या उठी हुई क्यारी की सतह पर समान रूप से वितरित न हो जाए- यह आपके पौधों को बढ़ने के साथ पोषक तत्व प्रदान करेगा।
अंत में, आपको अपने बीजों को खाद की परत के ऊपर एक दूसरे से लगभग 2 इंच की दूरी पर छोटी पंक्तियों में लगाना होगा- सुनिश्चित करें कि प्रति वर्ग फुट में 3 से अधिक पंक्तियाँ नहीं हैं, ताकि यह एक दूसरे से अधिक न हो और उनका दम घुटो!
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घर में सब्जियां उगाना एक संतुष्टिदायक अनुभव हो सकता है। लेकिन आपको इसके साथ आने वाली चुनौतियों के लिए तैयार रहने की जरूरत है। तो, आप अपना पालक कैसे उगाएंगे?
घर पर सब्जियां उगाने के दो विकल्प हैं: गमले में लगाना या सीधे मिट्टी में लगाना। सबसे अच्छा विकल्प आपकी जीवनशैली और आपके पास किस प्रकार की जगह उपलब्ध है, इस पर निर्भर करता है।
पालक उगाना अपेक्षाकृत आसान और सीधा है, लेकिन घर पर इसकी खेती करते समय कुछ बातों का ध्यान रखना चाहिए। पालक आमतौर पर बर्तनों में उगाए जाते हैं क्योंकि उन्हें बनाए रखना और इधर-उधर ले जाना आसान होता है।
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पालक उगाना आसान है, आपको केवल यह जानने की जरूरत है कि क्या आवश्यकताएं हैं। इसका स्वाद मीठा, अखरोट जैसा होता है। इसे सलाद में, या टैकोस या सैंडविच के हिस्से के रूप में सबसे अच्छा खाया जाता है। आप इसे कुछ क्रंच के लिए सूप या चावल के व्यंजन में भी डाल सकते हैं।
घर पर सब्जियाँ उगाना कई तरीकों से और घर के आसपास कई सतहों पर किया जा सकता है जैसे बालकनी पर, आपकी डेस्क पर, कंटेनरों में या आपकी छत पर भी। आप अपने पौधों से क्या चाहते हैं इस पर निर्भर करता है कि आप उन्हें किस तरह से उगाना चाहते हैं!
पालक उगाने के लिए कुछ अच्छी जगहों में आपका किचन गार्डन शामिल है जहाँ उन्हें बहुत सारी रोशनी मिलेगी और साथ ही खाना पकाने के लिए पर्याप्त जगह होगी! पालक के लिए बालकनी भी सही है क्योंकि इसे सुबह की धूप और दोपहर की धूप मिलती है लेकिन हो सकता है कि शाम की धूप ज्यादा न मिले इसलिए इन्हें यहां लगाते समय इस बात का ध्यान रखें!
आर्जीमोन मेक्सिकाना यानि भटकटैया : एक परिचय
भटकटैया, सत्यानाशी,कन्टैया या मैक्सिकन प्रिक्ली पॉप्पी यह सारे नाम आर्जीमोन मैक्सिकना नामक पौधे के हैं।
इसके बीज काली सरसों या राई के समान दिखते हैं और विषैले होते हैं। कटीले पत्तों और फलों वाले इस हर्ब का मूल स्थान यद्यपि मेक्सिको है किंतु संसार के विभिन्न भागों सहित भारत में भी हर जगह पाया जाता है। फलों,तने या पत्तों को तोड़ने अथवा काटने पर पारदर्शी पीले दूध जैसा निकलता है इसी कारण आयुर्वेद में इसे स्वर्णक्षीरी कहां गया है।
भावप्रकाश निघंटू नामक आयुर्वेदिक ग्रंथ के अनुसार यह पीला रस घाव, दाद ,कुष्ठ इत्यादि की चिकित्सा में अत्यंत उपयोगी है। विषाणु और कीटाणुओं का नाश करता है। न ठीक होने वाले घाव के इलाज में यह रामबाण औषधि है। मुनाफाखोर,लालची व्यापारी भटकटैया के बीजों का दुरुपयोग करते हैं। वे सरसों के साथ मिलाकर तेल निकालते हैं और मिलावटी सरसों का तेल शुद्ध तेल के नाम पर बेच लेते हैं। या मिलावटी तेल मौत का कारण भी बन सकता है। इससे एपिडेमिक ड्रॉप्सी यानी पेट की झिल्ली में पानी भरने का रोग उत्पन्न हो जाता है।
चूँकि आर्जीमोन मैक्सिकना के बीज विषैले होते हैं इनसे निकलने वाला तेल मृत्यु अथवा गंभीर रोग का कारण बन सकता है इसलिए इसके अल्प मात्रा में सेवन के परिणाम स्वरूप उत्पन्न होने वाले लक्षणों का संग्रह कर एक होम्योपैथिक दवा के रूप में इसकी प्रूविंग की जा सकती है। इस प्रकार होम्योपैथिक चिकित्सा पद्धति में एक और भारतीय औषधि का समावेश हो सकेगा जो मानवता के कल्याण की दिशा में एक और कदम साबित होगा। इसके अतिरिक्त इसके रस यानी स्वर्णक्षीर के गुणों का अध्ययन आधुनिक वैज्ञानिक विधियों द्वारा किया जाना भी आवश्यक है। प्राचीन आयुर्वेदिक ग्रंथों में दिए गए विवरण के ऊपर मैं प्रश्नचिन्ह नहीं लगा रहा परंतु मेरा मानना है कि किसी चीज पर आंख मूंदकर विश्वास करना अंधविश्वास है। पुरातन को अद्यतन बनाना वास्तव में विज्ञान का एक कर्तव्य है।
आर्जीमोन मैक्सिकना के साथ एक मिथक भी जुड़ा हुआ है। पुराने जमाने में रसायन वैज्ञानिक जिन्हें कीमियागर या अल्केमिस्ट कहा जाता था अपने अनुसंधान और ज्ञान को काफी गुप्त रखते थे। उनके मुख्यता तीन परम लक्ष्य थे : - (1) ब्रह्मांड के साथ मनुष्य के संबंधों की खोज और मानवता के हित में इसका लाभ उठाना। (2) अमृत की खोज और (3) सीसा या तांबा जैसे कम मूल्य वाले धातुओं को सोना में परिवर्तित करने का उपाय ढूंढना।
भारत में भी कीमियागरों के देसी वर्जन पाए जाते थे जिन्हें रसज्ञ, रस-सिद्ध अथवा रसायनज्ञ कहा जाता था इनमें नागार्जुन का नाम उल्लेखनीय है। कहा जाता है कि उन्होंने सोना बनाने की विधि खोज ली थी जिसमें स्वर्णक्षीरी के उपयोग के विषय में कई स्थानों पर उल्लेख किया गया है। परंतु किसी भी ग्रंथ में सोना बनाने की संपूर्ण विधि लिखी हुई नहीं मिलती है, केवल संकेत कथाएं और उल्लेख मिलते हैं। मध्यकाल के यूरोप और पश्चिम एशिया के कीमियागर अपने ज्ञान को अत्यंत गुप्त संकेतो में नोट करते थे किंतु आज की तारीख में उन्हें समझने वाला कोई नहीं है। इन संकेतों की कोई सार्वभौमिक भाषा भी नहीं है जिसकी सहायता से इन्हें डिकोड किया जा सके।इन सब तथ्यों की सहायता से हम अंततःइस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि सत्यानाशी का न केवल औषधीय महत्व था बल्कि रासायनिक प्रक्रियाओं में भी उपयोगी था।
साबूदाने का रहस्य
दोस्तों आप सब साबूदाना से तो अवश्य परिचित होंगे। भारत में 40 के दशक से व्रत त्योहार उपवास में फलाहारी एवं पवित्र खाद्य पदार्थ के रूप में इसका उपयोग खूब होता रहा है। इसे सुपाच्य समझकर रोगियों के पथ्याहार में शामिल किया जाता रहा है। परंतु क्या आपने कभी साबूदाने का पेड़ अथवा पौधा देखा है? या फिर इसे जमीन में रोपकर उगाने की कोशिश की है? आप ने भले ही कोशिश ना की हो पर मैंने जरूर की है। मगर मैं असफल रहा। समय के साथ यह 4जिज्ञासा परवान चढ़ती रही और अंततः मैं साबूदाना के रहस्य से परिचित हो गया। क्या आप सब दर्शक भी जानना चाहेंगे?
साबूदाना मुख्यता दो तरीके से फैक्ट्रियों में तैयार किया जाता है। यह किसी पेड़ का फल अथवा बीज नहीं है। सबसे पहले Sago Palm trees के तने से प्राप्त गूदे से बनाया जाता था। मूल रूप से अफ्रीकी उत्पत्ति वाले इस पौधे का तना बहुत मोटा होता है और इस मोटे तने के भीतर से गूदा निकालकर पीसा जाता है और पाउडर बनाया जाता है। इस पाउडर को फिल्टर कर गर्म करते हैं जिससे दाने बनते हैं। साबूदाना बनाने का सबसे मुख्य तरीका जो आज प्रचलित है सर्वथा अलग है। दक्षिण अमेरिकी मूल के कंद कसावा जिसकी खेती अफ्रीका महाद्वीप में सबसे अधिक की जाती है से सबसे अधिक साबूदाना बनाया जाता है। कसावा को टेपियोका रूट भी कहा जाता है। भारत में भी कसावा से ही साबूदाना बनाया जाता है। दक्षिण भारत के तमिल नाडु इत्यादि राज्यों में साबूदाने का उत्पादन होता है। सालेम जिले में कसावा की खेती सबसे ज्यादा होती है और वही सबसे अधिक टेपियोका स्टार्च प्रोसेसिंग प्लांट हैं। इस प्रक्रिया में 4 से 6 महीने लगते हैं। इस दौरान साफ किए गए और पील किए हुए कंदों को मैश कर पानी में सड़ने या फर्मेंटेशन के लिए छोड़ दिया जाता है। बाद में जो लुगदी प्राप्त होती है उससे फाइबर को अलग कर जेली जैसी संरचना वाली स्टार्च एनरिच पदार्थ प्राप्त करते हैं। इसे मशीनों में डालकर दाना बनाया जाता है और सुखा कर ग्लूकोस एवं स्टार्च पाउडर की पॉलिश की जाती है जिससे मोतियों जैसे चमचमाते साबूदाने प्राप्त होते हैं। भारत में 40 के दशक में साबूदाना बनाने का उद्यम कुटीर उद्योग के रूप में शुरू हुआ था। किंतु आश्चर्य की बात है की शेष भारत में ज्यादातर लोग इससे अनभिज्ञ रहे।
यह सब जानने के बाद मेरे दिमाग में एक ही बात बार-बार आती है कि कसावा कंद को सड़ाकर आर्टिफिशियल तरीके से बनाया गया साबूदाना किस प्रकार पवित्र हुआ और उपवास के दौरान फलाहारी भोजन के योग्य माना गया? यदि किसी सुधि पाठक अथवा दर्शक इसका तर्कसंगत उत्तर ढूंढ कर कमेंट कर सकें तो बहुत आभार होगा।
पहले तो साबूदाने की खिचड़ी और खीर बनाई जाती थी किंतु अब इसकी बहुत सारी रेसिपी तैयार की जाती है और लोग मजे से उन्हें खाते हैं। साबूदाने का उपयोग ना केवल उपवास-फलाहार और रोगियों के पथ्याहार मैं बल्कि बहुत सारे फेवरेट रेसिपीज मैं भी किया जा रहा है। पापड़, तिलौड़ी, चाट- पकोड़े और विभिन्न प्रकार के व्यंजन में इसका उपयोग किया जा रहा है। लोग साबूदाने को पवित्र और धार्मिक उपयोग के योग्य मानते हैं। वे नहीं जानते की यह कितने गंदे प्रोसेस से तैयार होता है। यहां हम साबूदाने की पापड़ रेसिपी दे रहे हैं इसका उपयोग आप अगले उपवास के दौरान कर सकते हैं।
विधि
2 लीटर पानी में 100 ग्राम साबूदाना डालकर गर्म करते हैं। इसे तब तक पकाते हैं जब तक थी साबूदाना पूरी तरह से गल कर पानी को जेली जैसी ना बना दे। तब इसे चूल्हे से उतार लेते हैं गैस बंद कर देते हैं और छत पर साफ सूती कपड़ा बिछाकर कलछी से वह द्रव्य लेकर कपड़े के ऊपर छोटे-छोटे गोल धब्बे के रूप में फैलाते हैं और सूखने के लिए छोड़ देते। ऐसा करने से पहले मिश्रण में स्वादानुसार सेंधा नमक और थोड़ी मात्रा में गोल मिर्च पाउडर मिलाते हैं इससे नमकीन और चड़पड़ा स्वाद आता है। उपवास के दौरान कुछ लोग सेंधा नमक का प्रयोग शुद्ध मानते हैं और साधारण नमक का उपयोग अशुद्ध। कई दिनों तक सुखाने के बाद पापड़ तैयार हो जाता है जिसे सावधानीपूर्वक कपड़े से अलग कर लेते हैं और साफ सूखे डब्बे में स्टोर कर लेते हैं। जब भी खाने का मन हो इसे खाद्य तेल गरम कर तल लीजिये और मजे से खाइए। यह पापड़ बनाते समय शुरू में ही सावधानी बरतने की जरूरत होती है । जब साबूदाना पक रहा हो तब ध्यान रखें की इसका टेक्सचर बहुत अधिक गाढ़ा ना हो और ना बहुत ज्यादा ढीला। यदि तिलौड़ी बनानी है तो पानी कुछ कम डालें और मिश्रण को गाढ़ा होने दे तथा कुछ दाने ऐसे हो जो पूरी तरह गले ना हो। इस मिश्रण में स्वादानुसार सेंधा नमक और तिल मिला लें। तिल को पहले हल्का भून लें। जब मिश्रण ठंडा होकर हाथ सहने योग्य हो जाए तब छोटी-छोटी बड़ियों जैसे पिंड साफ कपड़े पर डालते चले जाएं और कई दिनों तक धूप में सुखाएं। जब यह तिलौड़ियाँ खूब सुख जाए तब कपड़े पर से इन्हें अलग कर ले और साफ-सूखे डिब्बे या मर्तबान में स्टोर कर ले। जब भी खाने का मन हो तो कढ़ाई में करू तेल गर्म करें,तिलौड़ियाँ डालें, ब्राउन होने तक तले और खाने का मजा ले।
मिश्रीकंद की खेती
हिंदी भाषी क्षेत्रों में universally मिश्रीकंद और बिहार में केसवर/ केसऊर के नाम से प्रसिद्ध यह कंद मीठा, स्वादिष्ट और स्वास्थ्यवर्धक गुणों से भरपूर होता है। इसमें लो कैलोरी,फाइबर,मिनरल्स और एंटीऑक्सीडेंट प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं। अंग्रेजी भाषा में इसे मैक्सिकन याम बिन(Maxican yam been) कहां जाता है। जीव विज्ञान की भाषा में इसका नाम पैकीराईजस इरोसस (Pachyrhizus erosus) रखा गया है। 17 वी शताब्दी के पहले तक इसका नामोनिशान तक भारत में नहीं था। 'गजरा-केसऊर' वाले सरस्वती माता के भक्तों के लिए यह हार्ट ब्रेकिंग न्यूज़ है कि मिश्रीकंद भारत की मौलिक पैदाइश नहीं है। लगभग 3000 वर्षों से भी पहले से मेक्सिको और लैटिन अमेरिकी देशों में इसका उपयोग खाद्य पदार्थ के रूप में किए जाने के पुरातात्विक प्रमाण उपलब्ध है। 17 वी शताब्दी में कुछ स्पेनिश नाविको और व्यापारियों ने मिश्रीकंद के बीज फिलीपींस में लाकर लगाए और वहीं से धीरे-धीरे लगभग पूरे एशिया में फैल गया। इस प्रकार प्रायः 18 वीं सदी से मिश्रीकंद भारत में प्रचलित हुआ। और तब से पंडे पुजारियों ने सरस्वती माता की पूजा में इसे अनिवार्य प्रसाद अवयव के रूप में शामिल कर लिया। वर्तमान परिदृश्य में इसका व्यापारिक महत्व बढ़ गया है। कभी कौड़ियों के मोल बिकने वाला यह कंद आज बाजार में अच्छी कीमत पर बिकता है। यद्यपि खेती को प्रायः घाटे का सौदा कहा जाता है परंतु फायदे वाली कुछ गिनी चुनी फसलों में से मिश्रीकंद भी अपना महत्वपूर्ण स्थान रखती है। इस आलेख में इसकी खेती के सभी पहलुओं पर प्रकाश डाला जाएगा।
रोपने का उचित समय : 1 जुलाई से 15 सितंबर।
उपयुक्त भूमि : उपजाऊ दोमट एवं बलुई दोमट मिट्टी वाली भूमि मिश्रीकंद की खेती के लिए उपयुक्त मानी जाती है। ध्यान रहे जिस जमीन का चुनाव इसकी खेती के लिए कर रहे हैं उसमें जलजमाव की संभावना ना हो।
उन्नत प्रभेद : राजेंद्र मिश्रीकंद-1 और 2, इनके अतिरिक्त विभिन्न प्रचलित स्थानीय किस्में।
खेत की तैयारी : 200 क्विंटल प्रति हेक्टेयर की दर से कंपोस्ट डालकर गहरी जुताई करें। यह जुताई रोटावेटर से ना करें। 1 सप्ताह बाद दूसरी जोताई करें और पाटा मारकर समतल कर ले। यदि खरपतवार ना हो और मिट्टी हल्की एवं भुरभुरी हो जाए तो दो ही जुताई काफी है अन्यथा तीसरी जुताई की भी जरूरत पड़ सकती है। अनुशंसित मात्रा में रासायनिक उर्वरक डालकर ही अंतिम जुताई करें।
बीज की मात्रा : जुलाई महीने की बुवाई में 15 से 20 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर की दर से लगाएं। अगस्त महीने में बोना है तो बीज की मात्रा बढ कर 30 से 40 किलोग्राम हो जाती है। वही सितंबर माह में रोपने के लिए 50 से 60 किलोग्राम बीज लगता है। यहां स्पष्ट करना जरूरी है कि अगात खेती में बीज कम लगने का मुख्य कारण फसल की समय अवधि अधिक होना है जिससे पौधों के विकास फैलाव और कल्ले निकलने के लिए पर्याप्त समय मिल जाता है। अगस्त सितंबर में बोने से समय कम मिलता है और कल्ले निकलने का पर्याप्त अवसर नहीं मिलता। इसी कमी की पूर्ति के लिए बीज की मात्रा बढ़ाई जाती है।
खाद एवं उर्वरक : यहां सभी मात्राएं एक हेक्टेयर खेती के लिए बताई जा रही हैं। कंपोस्ट 200 क्विंटल, सिंगल सुपर फास्फेट 2.5 क्विंटल, यूरिया 1.75 क्विंटल और म्यूरेट ऑफ पोटाश (एम ओ पी) 1.35 क्विंटल। इसमें से आधी मात्रा यूरिया की बुवाई के समय देनी है और आधी 40 से 50 दिन बाद।
रोपन योजना (Plantation plan) : एकल फसल के रूप में मिश्रीकंद को निम्न प्रकार से रोपा जाता है - जुलाई महीने में कतार से कतार और पौधे से पौधे की दूरी 30 सेंटीमीटर रखी जाती है। अगस्त महीने में कतार से कतार की दूरी 30 सेंटीमीटर और पौधे से पौधों की दूरी 15 सेंटीमीटर रखी जाती है जबकि सितंबर महीने की रोपाई में यह दूरी घटकर 15 * 15 सेंटीमीटर रह जाती है।
खरपतवार नियंत्रण : रोपाई के लगभग 30 दिन बाद निराई गुड़ाई करना जरूरी है। क्योंकि बरसात के कारण अवांछित खरपतवार जल्द ही निकल आते हैं और फसली पौधे को दबाने लगते है। निराई का दूसरा लाभ यह है कि मिट्टी की ऊपरी परत हल्की और वात रंध्र से परिपूर्ण हो जाती है। यदि पुनः घास उग आए तो 50 से 60 दिन बाद फिर से निराई गुड़ाई करें।
अन्य आवश्यक क्रियाकलाप : जब पुष्प कलियाँ निकलने लगे तो यथासंभव उन्हें तोड़ दे। फलियां लग जाएंगी तो कंद बनने की प्रक्रिया बाधित होगी और उपज तीन चौथाई घट जाएगी। किंतु यदि आपका फोकस बीज उत्पादन पर है तो आप पुष्पदंडों को बिल्कुल ना तोड़े और यथासंभव फलन को प्रेरित करने वाला हार्मोन दवा मीराकुलान स्प्रे करें। बड़े पैमाने पर कंद के लिए खेती कर रहे हैं तो हाथ से पुष्पदंड को तोड़ना आसान काम नहीं है। इसके लिए रासायनिक विधि का उपयोग अधिक सुविधाजनक है। ऑक्सीन श्रेणी के हार्मोन 2, 4-डी का छिड़काव करके भी अपेक्षित परिणाम प्राप्त कर सकते हैं। इसके 0.004 % सॉल्यूशन का उपयोग करें।
पादप संरक्षण : मिश्रीकंद की जड़ को छोड़कर अधिकांश हिस्से विषैले होते हैं इसलिए इसकी फसल पर कीट पतंगों का ज्यादा प्रभाव नहीं पड़ता है। किंतु फफूंद जनित बीमारी पत्र लांछन हो सकती है । इसके नियंत्रण के लिए इंडोफिल एम - 45 दो ग्राम प्रति लीटर पानी में घोलकर स्प्रे करें। एक हेक्टेयर में यह दवा लगभग 2 किलोग्राम लगती है। एक हेक्टेयर में 1000 लीटर पानी लगता है।
सिंचाई : आमतौर पर नवंबर महीने तक खेतों में पर्याप्त नमी रहती है किंतु दिसंबर से जनवरी के बीच सिंचाई की आवश्यकता पढ़ सकती है। जब खेत में मिट्टी सूख कर दरारें पड़ने लगे तो सिंचाई कर दें अन्यथा कंद फटने लगते हैं और उपज में भी कमी आ जाती है। किंतु ध्यान रहे कहीं जलजमाव ना हो।
एकल फसल के अलावा मिश्रीकंद की खेती मिश्रित फसल के रूप में भी सफलतापूर्वक की जाती है। कुछ प्रचलित कंबीनेशन निम्नलिखित हैं - मिश्रीकंद + तुवर, मिश्रीकंद + मकई ,मिश्रीकंद + मकई+ अरहर।
लागत : जोताई बीज खाद उर्वरक लेबर कंपोनेंट पेस्टिसाइड्स सिंचाई इत्यादि के ऊपर मुख्य रूप से खर्च होता है जो इस प्रकार है :
जुताई - ₹1,500
खाद एवं उर्वरक - ₹27,000
बीज - ₹18,000
लेबर कंपोनेंट - ₹15,000
हार्मोन फंगीसाइड - ₹2,000
सिंचाई -- ₹3500
------------------------------------
कुल खर्च = ₹81,000
आमदनी(income) : न्यूनतम उपज 400 क्विंटल और न्यूनतम थोक विक्रय दर 1,200 रुपया प्रति क्विंटल लें तो ₹4,80,000 प्राप्त होते हैं। इस प्रक्रिया के दौरान 81,000 रुपए का 8 महीने का ब्याज ग्रामीण महाजनी दर से ₹32,400 होता हैं। और यदि किसान का अपना खेत नहीं है तो एक हेक्टेयर का किराया ₹25,000 लगेगा। इस प्रकार एक हेक्टेयर मिश्रीकंद की खेती पर कुल खर्च बैठता है ₹1,38,400/- । इसे कुल प्राप्ति में से घटाने पर शुद्ध लाभ ₹3,41,600 आता है।
8 महीने में निवेश का लगभग 250% रिटर्न देने वाला यह काम करने को कहा जाए तो क्या आप करना चाहेंगे ?
बरसाती भिण्डी की खेती
भिंडी को लेडीज फिंगर या ओकरा(okra) भी कहते हैं। अपने विशिष्ट गुणों के कारण यह एक लोकप्रिय सब्जी है। साल में भिंडी की दो फसलें उगाई जाती हैं पहली फरवरी-मार्च में गरमा फसल और दूसरी जून-जुलाई में बरसाती। यहां हम बरसाती भिंडी की खेती कैसे करें इस विषय पर सभी जरूरी जानकारियां और व्यवहारिक अनुभव शेयर कर रहे हैं।
खेत की तैयारी : लगभग 200 क्विंटल प्रति हेक्टेयर की दर से कंपोस्ट डालकर गहरी जुताई करें जिससे खरपतवार मिट्टी के नीचे चले जाएं। दूसरी जुताई में रासायनिक उर्वरक अनुशंसित मात्रा में डालें। दूसरी जुताई यथासंभव रोटावेटर से करें।
खेत का चयन : 6.4 से लेकर 7 पीएच मान वाली हल्की दोमट मिट्टी युक्त ऊंची भूमि में बरसाती भिंडी की खेती करें। जलजमाव से छोटे पौधे गल जाते हैं तथा बड़े पौधों की उत्पादकता घट जाती है।
उर्वरक की मात्रा : सिंगल सुपर फास्फेट यानी एसएसपी 3.5 क्विंटल प्रति हेक्टेयर एवं 80 किलोग्राम यूरिया अथवा 1.5 क्विंटल डीएपी प्रति हेक्टेयर और म्यूरेट ऑफ पोटाश 1 क्विंटल प्रति हेक्टेयर प्रयोग करें।
बीज की मात्रा : 8 से 10 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर अथवा 150 ग्राम से 200 ग्राम प्रति कट्ठा।
उन्नत प्रभेद : परभणी क्रांति, केएच- 312, सेलेक्शन- 8 ,सेलेक्शन -10, एचबीएच -142, भवानी, कृष्णा तथा भिन्न-भिन्न कंपनियों के पीतशिरा प्रतिरोधी हाइब्रिड किस्में।
संरचना : 60 सेमी चौड़ी बेड के अंतराल पर 15 सेमी गहरी और 40 सेमी चौड़ी नाली बनाएं यह संरचना यथासंभव पूरब से पश्चिम दिशा में बनाएं इससे क्यारियों में धूप ज्यादा अच्छे से लगेगी। बेड के दोनों किनारों से 5 - 5 सेमी छोड़कर बिजाई करें ताकि पौधों की दो कतारों के बीच 50 सेमी का अंतराल रहे।
बीज का उपचार : यदि सवेरे रोपना है तो बीज रात में भिगो दें। सुबह 5:00 बजे पानी से निकाल ले और थीरम नामक फंगीसाइड के सॉल्यूशन में उपचारित कर छांव में सुखा लें। एक किलोग्राम बीज के उपचार हेतु 2 ग्राम थीरम के साथ 2 ग्राम स्ट्रेप्टोसाइक्लिन का भी व्यवहार करें।
बिजाई : एक कतार में पौधों से पौधों की दूरी 30 से 40 सेमी रखें और एक स्थान पर 3 या 4 बीज रोपें। यदि सभी उग जाएं तब भी कोई दिक्कत नहीं है। बाद में निकोनी के दौरान कमजोर पौधे को हटाया जा सकता है। एक बेड पर दो कतार लगाएं। बरसाती फसल के लिए प्रायः अंकुरित बीज रोपना अनिवार्य नहीं है क्योंकि जमीन और वातावरण में बहुत अधिक आर्द्रता होती है । केवल फफूंद और बैक्टीरिया संक्रमण से बचा कर रखने की जरूरत है।
खरपतवार नियंत्रण : बिजाई के 15 से 20 दिन बाद पहली निराई करें। खरपतवार हटाने के साथ-साथ मिट्टी भुरभुरी करना भी जरूरी है। जड़ों के विकास के लिए यह अति आवश्यक है। खरपतवार फसल को कमजोर कर देते हैं वह पौधों के हिस्से की पोषक सामग्री भी हजम कर जाते हैं। केमिकल तरीकों से यथासंभव बचे रहें। यह तरीका इको फ्रेंडली नहीं है। पहली निकोनी के साथ ही यूरिया 80 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से डालें। दूसरी निकोनी इसके 20 से 30 दिन बाद इतनी ही मात्रा में यूरिया डालकर करें। उत्पादन : 45वे से 60वें दिन के बीच भिंडी की तुराई आरंभ हो जाती है । यह प्रभेद विशेष तथा परिवर्तनशील भौतिक मौसमी घटकों पर निर्भर करता है कि रोपाई के कितने दिन बाद फल प्राप्त होगा। फसल अवधि में कुल उत्पादन औसतन 90 से 100 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होता है।
निवेश एवं आमदनी : उपरोक्त विधि से खेती करने पर सभी खर्चों को जोड़कर 80,000 से 85,000 रुपए प्रति हेक्टेयर निवेश होता है। यदि सब कुछ ठीक-ठाक रहे तो उत्पादन 100 क्विंटल तक हो सकता है। यद्यपि भिंडी का बाजार मूल्य परिवर्तनशील है फिर भी औसत न्यूनतम होलसेल रेट ₹15 प्रति की किलोग्राम रखें तो कुल प्राप्ति ₹1,05,000 हो सकती है। यानी ₹20,000 का न्यूनतम शुद्ध लाभ प्राप्त होगा। किंतु यदि यथासंभव अधिक से अधिक उत्पाद को स्थानीय खुदरा बाजार में किसान सीधे उपभोक्ता को बेचे तब संपूर्ण विक्रय मूल्य दो लाख से अधिक आता है। भिंडी की खेती एक प्रकार का जुआ है।
नोट : -- कुछ अन्य बाह्य कारकों का भी ध्यान रखना पड़ता है। आवारा पशु और नीलगाय इसके सबसे बड़े दुश्मन है। यदि खेत को चारों तरफ से बांस और जाली की सहायता से सुरक्षित कर सकें तो पूरा लाभ उठा सकते हैं।
रोग एवं कीट नियंत्रण : मुख्य रोग पीतशिरा रोग है एक बार संक्रमित होने पर कोई इलाज नहीं है। इसलिए बीज उसी नस्ल का चुने जो वायरस से होने वाले पीतशिरा रोग से प्रभावित नहीं होता है। फल एवं तना छेदक कीड़ों और अन्य हानिकारक कीटों के नियंत्रण के लिए मालाथियान 50 ईसी 20 एमएल दवा 10 लीटर पानी में घोलकर प्रति कट्ठा की दर से छिड़काव करें। मालाथिऑन के स्थान पर इंडोसल्फान 35 ईसी का उपयोग कर सकते हैं। तनाछेदक एवं फलछेदक अधिक परेशान करें तो फुराडॉन 3 जी दानेदार दवा आधा किलोग्राम प्रति कट्ठा की दर से पूरे खेत में छीट दें । यदि पत्तों पर जाल बुनकर क्षति पहुंचाने वाली मकड़ी या रेड माइट का प्रकोप हो तो डाईकोफॉल 18.5 ईसी 1.5 लीटर प्रति हेक्टेयर की दर से 1000 लीटर पानी में डाइल्यूट कर स्प्रे करें। डायकोफॉल के बजाय सॉल्युबल सल्फर का भी प्रयोग कर सकते हैं। रेड माइट नामक मकड़िया बहुत छोटी छोटी होती है जिन्हें बहुत ध्यान से देखने पर ही पता चलता है। इनका प्रकोप बरसाती भिंडी में कम होता है।
सावधानियां : कीटनाशकों अथवा फफूंद नाशी के प्रयोग से पूर्व फल तोड़ ले और स्प्रे के कम से कम 7 दिन बाद ही अगली तुड़ाई करें। क्योंकि यह रसायन जहरीले होते हैं और इनके अवशेष शरीर में उपद्रव मचा देते हैं अतः इनसे बचने के उपायों का सतर्कता से पालन करना चाहिए। इसके अतिरिक्त फलों की तुराई में यह भी सतर्कता बरतनी चाहिए की पूर्ण परिपक्व होने से पहले ही फलों को तोड़ लें। फल की लंबाई तो बढ़ जाए किंतु यह नरम रहे तभी तोड़ ले। रेशे कड़े हो जाने पर बिक्री में परेशानी आती है साथ ही भिंडी के ढेर में कुछ कठोर रेशे वाले परिपक्व फल दिख जाने पर मूल्य कम हो जाता है। फसल से पूरा लाभ लेने के लिए इन छोटी-छोटी बातों का बड़ा ध्यान रखना पड़ता है । फल तोड़ने में पौधे क्षतिग्रस्त ना हो इसके लिए चाकू या ब्लेड से फल का डंठल काटे। बड़े खेतों से फल तुराई के लिए हाथों पर प्लास्टिक के डिस्पोजेबल दस्ताने लगाएं क्योंकि भिंडी के पत्तों और फलों पर खुजली व इरिटेशन उत्पन्न करने वाले रोम होते हैं।
बैंगन की उन्नत खेती

बैंगन (Brinjal) सोलेनेसी (Solanaceae) कुल का एक पौधा है जिसके फल भारत ही नही दुनियाभर में सब्ज़ी के तौर पर लोकप्रिय हैं।इसके कुल वैश्विक उत्पादन में अकेले भारत का योगदान 27% है,जबकि चीन शीर्ष पर है।
गुण(Qualities) : यह शरीर में कोलेस्ट्राल घटाने में मददगार सिद्ध हुआ है।सुपाच्य है और स्वादिष्ट भी।हृदय रोग से बचाता है और उच्च रक्तचाप को नियंत्रित रखने में सहायक है।सब्जियों का राजा कहलाता है।
दोष(Drawbacks) : लोक प्रचलित मान्यता है कि बैंगन खाने से खुजली बढती है। मगर जिसे पहले से खुजली नही है उसे कोई फर्क नही पड़ता।
चूंकी बैंगन हर मौसम में उपलब्ध रहता है तो जाहिर सी बात है कि इसे वर्ष में एक से अधिक बार रोपा जाता होगा। यह खरीफ, रबी और गरमा तीनो मौसम में रोपा जाता है।
●खरीफ : जून-जुलाई में बीजाई कर जुलाई-अगस्त में रोपाई, यह मुख्य फसल है।जब नर्सरी में 5-7 इंच के पौधे हो जाए तब उखाड़ कर खेत में लगाएं।
● रबी : अक्टूबर में बीजाई और नवम्बर माह में रोपाई।
● गरमा : फरवरी मध्य से मार्च तक बीजाई और मार्च-अप्रैल तक रोपाई।
स्थानीय जलवायु की विशिष्टता के अनुरूप उपरोक्त समय से कुछ भिन्न शेड्यूल भी हो सकते हैं।
पौधशाला में बीज गिराकर बिचड़े तैयार करना उन्हीं किसानों के लिए उपयुक्त व व्यवहारिक है जो व्यवसायिक पैमाने पर बैंगन की खेती करना चाहते हैं, अन्यथा छोटे पैमाने पर, टेरेस गार्डन में या बैकयार्ड किचन गार्डन में रोपने के लिए तैयार बिचड़े खरीद लेना सुविधाजनक होता है।परन्तु मनपसंद प्रभेद के लिए स्वयं बीजाई कर पौधे तैयार करना श्रेष्ठ विधि है।
प्रचलित देशी किस्में : -- गुच्छेदार हरा,कचबचिया/सतपुतिया,गुच्छेदार सफेद इत्यादि।
उन्नत किस्में : -- पूसा पर्पल लॉङ्ग (PPL),चाइनीज लॉन्ग पर्पल F-1,ब्रिंजल ब्लैक ब्यूटी,व्हाइट ऑब्लॉङ्ग राउंड, नीलम,राजेन्द्र बैंगन-1,राजेन्द्र बैंगन-2,पूसा क्रांति,पूसा अनमोल, पंत ऋतुराज, पंत सम्राट, कल्याणपुर टी-3, US-1004 हाइब्रिड F-1 इत्यादि। इनमें से पूसा क्रांति और ब्लैक ब्यूटी गोल और वजनदार होते हैं।ये भर्ता/चोखा के लिए ज्यादा उपयुक्त होते हैं तथा बाजार में अपेक्षाकृत महँगे बिकते हैं।PPL,नीलम और राजेन्द्र बैंगन अधिक प्रचलन में हैं।चाइनीज मिर्च की तरह चाइनीज बैंगन भी लोकप्रिय हो रहा है।
खेत की तैयारी - पहली जुताई गहरी होनी चाहिए। जुताई से पहले ही 200 क्विंटल/हेक्टेयर की दर से कम्पोस्ट डाल दें।दूसरी जुताई रोपने से दो-तीन दिन पूर्व करें और अनुशंसित मात्रा में रासायनिक उर्वरक भी डाल दें।
रोपने का तरीका : - गरमा बैंगन (फरवरी-मार्च) 60 सेमी ×45 सेमी के फॉर्मेट में रोपते हैं, जबकि मुख्य फसल (जून-जुलाई) 75 सेमी × 60 सेमी के फॉर्मेट में।प्रति थाला 6 इंच के दायरे में 2-3 बिचड़े लगाएं।ये तो हुई खेतों में बैंगन लगाने की विधि, अब हम शहरी और गार्डेनिंग का शौक रखने वाले पाठकों की रूचि का ध्यान रखते हुए टेरेस एवं लॉन गार्डेनिंग के तहत गमलों, ग्रो बैग्स या बेकार पड़े खाली प्लास्टिक के डिब्बों में बैंगन उपजाने की विधि जानेंगे। जो भी पॉट्स लें उनके बॉटम में जल निकासी के लिए छिद्र होने चाहिए। यदि नही हैं तो कर लें।ग्रो बैग्स जो आजकल चलन में हैं और बाजार या ई-कॉमर्स प्लेटफार्म्स पर उपलब्ध हैं, उनमें जल निकासी की समुचित व्यवस्था बनी होती है। पॉट्स के बॉटम में जो छिद्र हैं उन पर सीधे मिट्टी डालने के बजाए पहले टुटे हुए मिट्टी के बर्तन या खपरों के टुकड़े डालें ताकि मिट्टी से छिद्र बंद न हो। यदि पूरा पॉट केवल खेत या गार्डन की मिट्टी से भर देंगे तो अपेक्षित परिणाम प्राप्त नही होगा।सही बढवार के लिए मिट्टी,खाद और softening agents (मृदुकारक घटक) का उचित मिश्रण जरूरी है। यदि आप पहले से कोई उपयुक्त मिश्रण इस्तेमाल कर रहे हैं तो ठीक है अन्यथा गार्डन स्वाएल, कोको पिट और वर्मी कम्पोस्ट तीनो बराबर मात्रा में मिलाकर पॉट्स को भरें। पौधा रोपें और सिंचाई करें।रोपने से पहले जड़ों पर थीरम 75% पाउडर छिड़कें या बेवेस्टीन के 0.5% घोल में कुछ देर डुबोकर रखें।
अनुशंसित उर्वरक : - प्रति हेक्टेयर 3-3.5 क्विंटल सिंगल सुपर फास्फेट, 1 क्विंटल म्यूरेट ऑफ पोटाश और 0.8 क्विंटल यूरिया अंतिम जुताई में दें।इतनी ही मात्रा यूरिया की रोपने के 30 वें और 60 वें दिन डालें।कम क्षेत्र में बैंगन की खेती करना हो तो इस प्रकार समझें : SSP 6-7 kg,MOP 2kg, यूरिया 1.6 kg प्रति कट्ठा।(10,000 वर्ग मीटर = 1 हेक्टेयर; लगभग 50 कट्ठा = 1 हेक्टेयर)
सिंचाई : - मुख्य फसल के लिए प्रायः सिंचाई की आवश्यकता नही पड़ती।नवम्बर से मई तक आवश्यकतानुसार सिंचाई कर सकते हैं।ध्यान रहे जड़ों के पास जल जमाव न हो।
खरपतवार नियंत्रण : - रासायनिक विधि का प्रयोग न करें।पारंपरिक तरीका अपनाते हुए खुरपी-कुदाल से घास निकालें,मिट्टी भुरभुरी करें।50-60 दिन बाद दूसरी निराई के बाद कतार पर मिट्टी चढायें। बगल के चित्र को जूम कर देखें कि कैसा करना है।
कीट प्रबंधन : - बैंगन की फसल में फल छेदक और तना छेदक कीड़ा ज्यादा लगता है।यह अग्रस्थ कलिकाओं को नष्ट कर फलन को बाधित कर देता है।जो फुनगियां मुरझाई हुई दिखे उन्हें यथासंभव तोड़कर हटा दें और मालाथिऑन 50 EC 20ml दवा प्रति कट्ठा 10 लीटर पानी में घोल कर छिड़काव करें।इसके स्थान पर इंडोसल्फान 35 EC का भी प्रयोग कर सकते हैं।फुराडान 3जी दानेदार दवा 500 ग्राम प्रति कट्ठा की दर से पौधों के पास डालें।
स्पेशल टिप्स : अधिक उपज, शीघ्र फलन और गुणवत्ता वृद्धि के लिए समय-समय पर माईक्रो-न्यूट्रिएन्ट्स और हार्मोन का foliar spray(पर्णीय छिड़काव) कर सकते हैं।
उपज : उपरोक्त तरीके से खेती कर एक सीजन में 250 - 300 क्विंटल/हेक्टेयर उपज प्राप्त कर सकते हैं।
लागत एवं लाभ : वर्तमान दरों के सापेक्ष 1 हेक्टेयर बैंगन की खेती करने में 1 लाख रूपए खर्च होते हैं। कुल न्यूनतम उपज 250 क्विंटल मानें और थोक मूल्य दर 10/- प्रति किलोग्राम लें तो उत्पाद का कुल मूल्य 2,50,000/- ढाई लाख रूपए बनता है।इस प्रकार 100-120 दिन में 1,50,000/- डेढ लाख रूपए शुद्ध लाभ प्राप्त होता है। 150% का लाभ कुछ कम है क्या?तुलना करें ओल की खेती
ओल की खेती

🎃एक बहुवर्षीय भूमिगत रूपांतरित तने या घनकंद के रूप वाली सब्जी जिसे उत्तर भारत में 'ओल','सूरन' या 'जिमीकंद' आदि नामों से जाना जाता है और अंग्रेजी में Elephant Foot कहलाता है,एंटीऑक्सीडेंट्स और औषधीय गुणों से लबालब भरा हुआ है। कुछ लोगों को लगता है कि यह yam है पर वास्तव में रतालू को yam कहा जाता है जो एक लता वर्गीय पौधे के पर्व-संधियों पर और कंद के रूप में प्राप्त होता है। ओल को वैज्ञानिक भाषा में Amorpholus ceompenulatus कहा जाता है।
🥔 ओल न केवल एक लोकप्रिय स्वादिष्ट सब्जी है बल्कि औषधीय गुणों से भरपूर कंद भी है। बवासीर के मरीजों के लिए यह ज्यादा ही फायदेमंद होता है। मिनरल्स और फाईबर्स के साथ-साथ काफी मात्रा में एंटीऑक्सीडेंट का सुलभ प्राकृतिक स्रोत भी है। दो-तीन दशक पहले तक यह आमतौर पर Backyard kitchen-garden का हिस्सा हुआ करता था किन्तु बढती माँग को देखते हुए अब इसकी खेती भी होने लगी है। व्यवसायिक पैमाने पर खेती के लिए इसके उच्च उपज क्षमता वाले प्रजातियों की पहचान की गई है और इन्हीं को रोना जाता है। कम उपज वाले प्रभेद जिनमें ऑक्जेलेट्स अधिक होते हैं और गले में प्रायः तकलीफ़ पहुँचाने का काम करते हैं, अब यूपी-बिहार के बैकयार्ड किचनगार्डन में सीमित रह गए हैं।मगर इनमें औषधीय गुण ज्यादा हैं।
उन्नत प्रभेद -- गजेन्द्र,, त्रिवेन्द्रमी,हैदराबादी, मद्रासी ।
भूमि का चयन :-- हल्की दोमट,बलुई,ह्युमसयुक्त ऊँची जमीन जिसमें बरसात का पानी नहीं रुकता है,ओल के लिए सर्वश्रेष्ठ है। उसर भूमि में भी इसकी खेती की जा सकती है। आम-लीची आदि के बगीचों में छायादार परिस्थितियों में भी यह अच्छी तरह उगती और उपज देती है।
🧭रोपने का सही समय : -- मार्च-अप्रैल या जून।
🎯बीज का आकार :-- 500 ग्राम के आसपास के कंद या कंद के टुकड़े। प्रत्येक टुकड़े में मुख्य अंकुर का कुछ भाग रहना चाहिए। इससे पुष्ट पौधे प्राप्त होते हैं । किन्तु यदि घरेलू प्रभेद का उपयोग करना चाहें तो 200-250 ग्राम के कंद या कंद के टुकड़े आरोप सकते हैं।
💥पौधे से पौधे की दूरी :-- 75 सेमी ×75 सेमी(500 ग्राम के कंद या कंद के टुकड़े रोपने के लिए), बगीचों में यह दूरी 1 मी × 1 मी उपयुक्त है।
👌बीजोपचार :-- बाविस्टिन या इमीसान-6 की मात्रा 2.5 ग्राम/लिटर पानी में घोल कर 15-20 मिनट तक बीज कंद को डुबो कर रखें। इस घोल में स्ट्रेप्टोसाइक्लीन 1/2 ग्राम प्रति लीटर की दर से मिला देना चाहिए।यह एक एंटीबायोटिक है जो पौधों में होने वाले बैक्टीरिया जनित रोगों का निवारण करता है।
🌿बीज की मात्रा : -- 80 से 100 क्विंटल प्रति हेक्टेयर (1 हेक्टेयर =100 मीटर × 100 मीटर =10000 वर्ग मीटर ) प्रयोग के लिए एक कट्ठा में लगाना चाहते हैं तो 1.6 - 2 क्विंटल बीज लगेगा।
🟢खाद एवं उर्वरक : -- जुताई के साथ खाद देने के बजाय प्रत्येक पौधे को लक्षित कर प्रति गड्ढा 3 किलोग्राम सड़ी गोबर अथवा 1 किलोग्राम वर्मी कम्पोस्ट ,38 ग्राम सिंगल सुपर फॉस्फेट, 20 ग्राम अमोनियम सल्फेट या 10 ग्राम यूरिया, 16 ग्राम पोटैशियम सल्फेट मिट्टी में मिलाकर कंद का रोपण करें। इससे उर्वरक का पूरा लाभ तो पौधे को मिलता हीं है लागत खर्च में कमी भी होती है। रोपण के 80-90 दिन बाद नेत्रजनीय उर्वरक से उपरिवेशन करना जरूरी है।
🌵🌾☘निकाई-गुडाई (खरपतवार निकालना एवं मिट्टी की उपरी परत ढीली करना) : -- पहली बार 50-60 दिन की अवस्था में, दूसरी बार 90-100 दिन की अवस्था में। पहली निकौनी के दौराञन पौधे के पास मिट्टी चढाना जरूरी है।
🚰 सिंचाई: -- वैसे तो आमतौर पर ओल की खेती में सिंचाई की जरूरत नहीं पड़ती है किन्तु सूखे की स्थिति में मई-जून के महीने में नमी बहुत कम हो जाने पर हल्की सिंचाई कर सकते हैं पर जल जमाव न हो।
📆 इस फसल की अवधि अन्य फसलों की तुलना में अधिक है । 9-10 माह में कंद खुदाई के लिए तैयार हो जाते हैं
💲💱उपज :-- सामान्यतः रोपे गये कंद के वजन के 8-10 गुणा उपज की अपेक्षा रहती है। विभिन्न कृषि अनुसंधान संस्थानों, कृषि महाविद्यालयों में किये गये परीक्षणों से भिन्न-भिन्न उपज संबंधी आकड़े (data) प्राप्त हुए हैं। पूसा कृषि विश्वविद्यालय समस्तीपुर, बिहार के अनुसार कम से कम 400-500 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उपज होती है।
🔁🏛 आय-व्यय :-- एक हेक्टेयर में अनुमानित लागत =₹ 4,50,000 400 क्विंटल न्यूनतम उपज प्राप्त होने पर फसल का न्यूनतम मूल्य =₹ 8,00,000 शुद्ध लाभ=₹ 3,50,000 ( 77%)
मृदा की गुणवत्ता, मौसम की अनुकूलता एवं उचित देखभाल से उपज और मुनाफे में वृद्धि की अपार संभावनाएं हैं। Tips: रोगों का काल है जिमीकंद, जानें इसके 5 फायदे via zeenews - https://zeenews.india.com/hindi/health/health-benefits-of-jimikand-in-hindi-know-the-five-benefits-of-jimikand-spup/889218
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