Crop cutting machines : suitable for small farmers

जैसा कि हम जानते हैं अब गांव में पहले की तरह पर्याप्त कृषि मजदूर नहीं मिल पाते हैं क्योंकि ज्यादातर लोग उद्योगों में काम करने के लिए तथा निर्माण स्थलों पर काम करने के लिए पलायन कर गए हैं वह बड़े शहरों में और नए बस रहे औद्योगिक नगरों में जाकर रोजगार तलाशते हैं।जबकि दूसरी तरफ बढ़ती हुई जनसंख्याके कारण भूमि पर जनसंख्या का घनत्व बढ़ता जा रहा है इस कारण जोतें छोटी होती जा रहीं हैं। इसी क्रम में बड़े किसान मध्यम में मध्यम किसान लघु में और लघु किसान सीमांत किसान के रूप में तब्दील होते जा रहे हैं जिसका परिणाम यह हुआ कि खेती में बड़े यंत्रों जिनकी कीमत बहुत अधिक है का उपयोग भौतिक एवं आर्थिक रूप से व्यवहारिक नहीं रह गया है। बढ़ी हुई श्रम लागत और मजदूरों की कमी के कारण बहुत से किसानों ने खेती करना छोड़ दिया है और वे जमीनों को बँटाई या किराये पर उठाना पसंद करते हैं अथवा परती छोड़ देते हैं। यह सारी बातें तो केवल समस्या से संबंधित है किंतु जरूरी है इसका समाधान।अन्यथा भारत में कृषि का विकास होने की बजाय पूरी तरह विनाश हो जाएगा।
 समाधान : बदलते परिदृश्य में कॉस्ट एफिशिएंट विकल्प उपलब्ध है बस जरूरत है उनके बारे में जानने की और उनका खेती में सही ढंग से उपयोग करने की। यदि सकारात्मक सोच के साथ उपयुक्त कृषि यंत्रों का चयन कर इस्तेमाल किया जाए तो उत्पादन लागत में प्रभावीरूप से कमी आएगी और खेती मुनाफे का सौदा बन सकेगा। 
   

 फसल काटने वाली मशीनें छोटे किसानों के लिए फसल कटाई के श्रम-गहन कार्य को काफी आसान बना सकती हैं। छोटे पैमाने पर खेती के लिए उपयुक्त फसल काटने की मशीन का चयन करते समय, आपके द्वारा उगाई जाने वाली फसलों के प्रकार, आपके खेत का आकार, आपका बजट और आपके क्षेत्र में स्पेयर पार्ट्स और सेवा की उपलब्धता जैसे कारकों पर विचार करना महत्वपूर्ण है। यहां छोटे किसानों के लिए उपयुक्त कुछ फसल काटने वाली मशीनें दी गई हैं:

 मिनी हार्वेस्टर: मिनी हार्वेस्टर छोटी, हल्की मशीनें हैं जिन्हें छोटे खेतों के लिए डिज़ाइन किया गया है। वे बहुमुखी हैं और उनका उपयोग चावल, गेहूं, मक्का और अन्य विभिन्न फसलों को काटने के लिए किया जा सकता है। कुछ लोकप्रिय ब्रांडों में कुबोटा, यानमार और महिंद्रा शामिल हैं।13 से 15 लाख रुपए के बजट में मध्य किसानों के लिए 74 एचपी का मिनी कंबाइन हार्वेस्टर पंजाब के नाभा में उपलब्ध है जिससे फसल कटाई और अनाज निकालना के लिए लागत ₹1200 प्रति बीघा आती है।


 रीपर बाइंडर: रीपर बाइंडर गेहूं, जौ और जई जैसी फसलों की कटाई और बांधने के लिए उपयुक्त हैं। वे फसल काटते हैं और स्वचालित रूप से उसे बंडलों में बांध देते हैं, जिससे किसानों के लिए इसे संभालना आसान हो जाता है।ये दो तरह के होते हैं : ट्रैक्टर माउंटेड रीपर बाइंडर और रीपर बाइंडर मशीन। जिन किसानों के पास पहले से ट्रैक्टर है वे 2.6 से 3 लाख रूपये की लागत से रीपर बाइंडर इक्विपमेंट ले सकते हैं जो ट्रैक्टर से जुड़ कर संचालित होता है।जबकि सवा लाख से 5 लाख रुपये के निवेश से ऐसा रीपर बाइंडर ले सकते हैं जिसके उपयोग के लिए ट्रैक्टर की जरूरत नहीं है।इन में इंजन लगे हुए हैं जो किफायती भी हैं , उपयोग में आसान भी।

 सिकल बार घास काटने की मशीन: छोटे पैमाने पर घास या चारा फसल उगाने वाले किसानों के लिए सिकल बार घास काटने की मशीन लागत प्रभावी उपकरण हैं। वे मैनुअल या ट्रैक्टर-चालित हैं और घास और अन्य चारा फसलों को कुशलतापूर्वक काट सकते हैं।
हैंडहेल्ड ब्रश कटर: ये सीमित बजट और छोटे खेतों वाले छोटे पैमाने के किसानों के लिए आदर्श हैं। हैंडहेल्ड ब्रश कटर का उपयोग घास, खरपतवार और छोटी झाड़ियों को काटने के लिए किया जा सकता है।

 

चारा काटने की मशीन: यदि आपके पास पशुधन है और आपको चारा काटने की जरूरत है, तो चारा काटने की मशीन एक मूल्यवान अतिरिक्त उपकरण हो सकता है। यह पुआल, घास और अन्य चारे को छोटे टुकड़ों में काटने और काटने में मदद करता है।

 मिनी कंबाइन हार्वेस्टर: कुछ छोटे पैमाने के किसान मिनी-कंबाइन हार्वेस्टर में निवेश करने पर विचार कर सकते हैं जो छोटे खेतों के लिए डिज़ाइन किए गए हैं और कई फसलों की कटाई कर सकते हैं। प्रीत और फील्डकिंग जैसे ब्रांड ऐसी मशीनें पेश करते हैं।यदि बजट कुछअच्छा होतो किर्लोस्कर का 15 एचपी वाला मेगा टी मिनी कंबाइन हार्वेस्टर जिसकी कीमत लगभग 9 लख रुपए है एक अच्छा विकल्प हो सकता है।


अनुकूलित स्थानीय मशीनें: आपकी विशिष्ट फसल और क्षेत्र के आधार पर, आपको स्थानीय रूप से निर्मित फसल काटने वाली मशीनें या मौजूदा मशीनरी में संशोधन मिल सकते हैं जो आपकी आवश्यकताओं और बजट के अनुरूप हों।
 मशीन चुनते समय, रखरखाव की आवश्यकताओं, स्पेयर पार्ट्स की उपलब्धता और उपकरण के संचालन और रखरखाव के लिए प्रशिक्षण जैसे कारकों पर विचार करें। इसके अतिरिक्त, अपनी विशिष्ट आवश्यकताओं और परिस्थितियों के आधार पर एक सूचित निर्णय लेने के लिए स्थानीय कृषि विस्तार सेवाओं या अपने क्षेत्र में समान उपकरणों के साथ अनुभव रखने वाले साथी किसानों से सलाह लेना एक अच्छा विचार है।

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कंटोला यानि स्पाइन गौर्ड

 कंटोला, जिसे वैज्ञानिक रूप से मोमोर्डिका डियोइका के नाम से जाना जाता है, कुकुर्बिटेसी परिवार से संबंधित एक उष्णकटिबंधीय बेल का पौधा है। इसे टीसेल लौकी, स्पाइनी लौकी और चठैल जैसे अन्य नामों से भी जाना जाता है। यह पौधा भारतीय उपमहाद्वीप और दक्षिण पूर्व एशिया का मूल निवासी है और अपने खाद्य फलों (सब्जी) के लिए लोकप्रिय रूप से उगाया जाता है।कुछ लोग इसे सबसे ताकतवर सब्जी कहते हैं तो कुछ इसके स्वाद के दीवाने हैं।फाइबर ,मिनरल्स और एंटीऑक्सीडेंट्स से भरपूर चठैल एक महँगी सब्जी है।सामान्यतः यह एक जंगली या प्राकृतिक रूप से उगने वाली सब्जी है किन्तु पिछले कुछ दशकों से इसकी खेती भी की जाने लगी है। बाजार में इसकी मांग की तुलना में आपूर्ति बहुत कम है।अतः इसकी खेती में व्यावसायिक संभावनाएं बहुत ज्यादा हैं।



स्पाइन लौकी उगाने में आपकी मदद के लिए यहां कुछ दिशानिर्देश दिए गए हैं:


जलवायु: स्पाइन लौकी गर्म और आर्द्र जलवायु में पनपती है। इसके अंकुरण और विकास के लिए न्यूनतम तापमान लगभग 70°F (21°C) की आवश्यकता होती है। यह आमतौर पर उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में बारहमासी के रूप में उगाया जाता है, लेकिन ठंडी जलवायु में इसकी वार्षिक खेती भी की जा सकती है।


मिट्टी: पौधा अच्छी जल निकासी वाली मिट्टी पसंद करता है जो कार्बनिक पदार्थों से भरपूर हो। भात करेला की खेती के लिए थोड़ा अम्लीय से तटस्थ पीएच स्तर (लगभग 6.0-7.0) उपयुक्त है। सुनिश्चित करें कि मिट्टी ढीली और उपजाऊ हो।


सूर्य का प्रकाश: कंटोला को उगने और फल पैदा करने के लिए बहुत अधिक सूर्य के प्रकाश की आवश्यकता होती है। दिन में कम से कम 6-8 घंटे पूर्ण सूर्य के संपर्क में रहने वाला स्थान चुनें।


रोपण: आप कंटोला के बीजों को घर के अंदर बीज ट्रे में बोना शुरू कर सकते हैं या सीधे बगीचे में बो सकते हैं। यदि आप घर के अंदर बीज बोना शुरू कर रहे हैं, तो उन्हें अपने क्षेत्र में आखिरी ठंढ की तारीख से 4-6 सप्ताह पहले बोएं। जब पाला पड़ने की सारी संभावनाएँ समाप्त हो जाएँ तो पौधों को बाहर रोपें। कंटोला के बीज को मिट्टी में लगभग 1 इंच गहराई में लगाना चाहिए।बीजों के बजाए कंटोला को उगाने के लिए इसके कंद का उपयोग भी किया जा सकता है यह अपेक्षाकृत अधिक फायदेमंद तरीका है क्योंकि इससे उगने वाले पौधे जल्दी बढ़ते हैं और इनमें फल भी जल्दी लगते किंतु इनसे खेती करना बड़े पैमाने पर कठिन है। वास्तव में एक पूर्ण विकसित पौधे के नीचे सीमित मात्रा में कंद लगते हैं।अतः बड़े पैमाने पर इसकी खेती के लिए कंद का उपयोग करना संभव नहीं है।बीज कहां उपलब्ध है?यहां क्लिक करें



दूरी: पौधों को फैलने और चढ़ने के लिए पर्याप्त जगह दें। विकास के लिए पर्याप्त जगह प्रदान करने के लिए प्रत्येक पौधे के बीच कम से कम 3-5 फीट का अंतर छोड़ें।


पानी देना: मिट्टी को लगातार नम रखें लेकिन जलभराव न रखें। नियमित रूप से पानी देना महत्वपूर्ण है, खासकर सूखे के दौरान। सावधान रहें कि अधिक पानी न डालें, क्योंकि अत्यधिक नमी से जड़ें सड़ सकती हैं।


जाली और समर्थन: स्पाइन लौकी एक जोरदार पर्वतारोही है, इसलिए जालीदार सपोर्ट, बाड़, या अन्य सहायता संरचनाएं प्रदान करना आवश्यक है। इससे पौधे को लंबवत रूप से बढ़ने में मदद मिलेगी और आपके बगीचे में जगह की बचत होगी। सुनिश्चित करें कि समर्थन लताओं और फलों का वजन सहन करने के लिए पर्याप्त मजबूत है।



उर्वरक: रोपण से पहले मिट्टी को समृद्ध करने के लिए जैविक खाद या अच्छी तरह सड़ी हुई खाद का उपयोग करें। आप स्वस्थ विकास और फलों के विकास को बढ़ावा देने के लिए बढ़ते मौसम के दौरान संतुलित उर्वरक भी डाल सकते हैं।


कीट और रोग नियंत्रण: स्पाइन लौकी कुछ कीटों जैसे एफिड्स, ककड़ी बीटल और व्हाइटफ्लाइज़ के लिए अतिसंवेदनशील होती है। नियमित रूप से अपने पौधों का निरीक्षण करें और कीटों के संक्रमण को नियंत्रित करने के लिए उचित उपाय करें, जैसे कि जैविक कीटनाशकों का उपयोग करना या लाभकारी कीटों को शामिल करना। फंगल रोग स्पाइन लौकी को भी प्रभावित कर सकते हैं, इसलिए जोखिम को कम करने के लिए अच्छा वायु परिसंचरण सुनिश्चित करें और ओवरहेड पानी देने से बचें।


कटाई: स्पाइन लौकी के फल आमतौर पर तब काटे जाते हैं जब वे अभी भी छोटे और कोमल होते हैं, आमतौर पर लंबाई में लगभग 2-3 इंच होते हैं। नियमित रूप से कटाई करने से पौधे को अधिक फल पैदा करने के लिए प्रोत्साहन मिलता है। बेल से फल काटने के लिए तेज़ चाकू या छंटाई वाली कैंची का उपयोग करें।


इन दिशानिर्देशों का पालन करके, आप सफलतापूर्वक स्पाइन लौकी उगा सकते हैं और इसके स्वादिष्ट फलों का आनंद ले सकते हैं। शुभ बागवानी!



टेरेस गार्डनिंग आइडियाज |Terrace Gardening Ideas

 आजकल की शहरी जीवन शैली में स्वच्छ एवं शुद्ध सब्जियां पाना जरा मुश्किल हो गया है। वहीं कंक्रीट के जंगल में प्राकृतिक हरियाली का अभाव है।इस आलेख में हम जानने की कोशिश करेंगे कि कैसे अपने आवासीय परिवेश में नेचर को समाहित करते हुए सुहाना एहसास ले सकते हैं।छत पर बागवानी आपके पास  उपलब्ध स्थान का अधिकतम उपयोग करने और पौधों और सब्जियों को उगाने के लाभों का आनंद लेने का एक शानदार तरीका है। इस के लिए यहां कुछ उपयोगी विचार दिए गए हैं:



अपनी जगह का आकलन करें: अपना टैरेस गार्डन शुरू करने से पहले, उपलब्ध जगह का आकलन करें और सूरज की रोशनी, हवा के पैटर्न और छत की वजन वहन करने की क्षमता जैसे कारकों पर विचार करें। इससे आपको तदनुसार योजना बनाने और उपयुक्त पौधे चुनने में मदद मिलेगी।



कंटेनर बागवानी: कंटेनर बागवानी का विकल्प चुनें क्योंकि यह लचीलेपन और आसान गतिशीलता की अनुमति देता है। जगह का अधिकतम उपयोग करने के लिए विभिन्न आकारों और सामग्रियों के कंटेनरों का उपयोग करें, जैसे बर्तन, हैंगिंग बास्केट और वर्टिकल प्लांटर्स।plant support cage


सही पौधे चुनें: ऐसे पौधों का चयन करें जो आपकी जलवायु में पनपते हों और आपकी छत को मिलने वाली धूप की मात्रा के अनुकूल हों। तुलसी, थाइम और पुदीना जैसी जड़ी-बूटियाँ, साथ ही चेरी टमाटर और सलाद जैसी कॉम्पैक्ट सब्जियाँ, छत के बगीचों के लिए अच्छे विकल्प हैं। दृश्य आकर्षण के लिए रसीले पौधों और फूलों वाले बारहमासी जैसे सजावटी पौधों पर विचार करें।


ऊर्ध्वाधर बागवानी: जाली, दीवार पर लगे प्लांटर्स, या लटकती टोकरियाँ शामिल करके ऊर्ध्वाधर स्थान का उपयोग करें। खीरे, बीन्स, या आइवी जैसी बेलों को लंबवत रूप से बढ़ने, जगह बचाने और आपकी दीवारों पर हरा स्पर्श जोड़ने के लिए प्रशिक्षित किया जा सकता है।


माइक्रॉक्लाइमेट बनाएं: अपने छत के बगीचे में माइक्रॉक्लाइमेट बनाने के लिए बड़े बर्तनों या प्लांटर्स का उपयोग करें। हवा के अवरोध के रूप में कार्य करने के लिए हवा की दिशा में लम्बे पौधे लगाएं और अधिक नाजुक पौधों के लिए छाया प्रदान करें जिन्हें तेज हवाओं या तीव्र धूप से आश्रय की आवश्यकता होती है।


कुशल जल प्रणाली: उचित जल सुनिश्चित करने और पानी की बर्बादी को रोकने के लिए ड्रिप सिंचाई प्रणाली स्थापित करें या स्व-पानी वाले कंटेनरों का उपयोग करें। इसके अतिरिक्त, मिट्टी में नमी बनाए रखने के लिए गीली घास या पानी बनाए रखने वाली सामग्री का उपयोग करने पर विचार करें।

खाद डालना: कंटेनर में उगाए गए पौधों को अक्सर नियमित रूप से खाद देने की आवश्यकता होती है क्योंकि समय के साथ पॉटिंग मिश्रण में पोषक तत्व कम हो सकते हैं। पौधों की विशिष्ट आवश्यकताओं के अनुसार संतुलित, धीमी गति से निकलने वाले उर्वरक या तरल या पानी में घुलनशील उर्वरकों के पूरक का उपयोग करें।

Extra effort

खाद बनाना: रसोई के स्क्रैप को रीसायकल करने और अपने पौधों के लिए पोषक तत्वों से भरपूर खाद बनाने के लिए अपनी छत पर एक कंपोस्टिंग बिन शुरू करें। खाद न केवल मिट्टी को समृद्ध बनाती है बल्कि अपशिष्ट को भी कम करती है।


बैठने के क्षेत्रों को एकीकृत करें: अपनी छत पर एक आरामदायक बैठने का क्षेत्र बनाएं, जिससे आप आराम कर सकें और अपने बगीचे की सुंदरता का आनंद ले सकें। मौसम प्रतिरोधी फर्नीचर का उपयोग करें और छतरियां या पेर्गोलस जैसे छाया तत्व शामिल करें।



सजावटी तत्व जोड़ें: रंगीन प्लांटर्स, गार्डन लाइट्स, विंड चाइम्स या सजावटी पत्थरों जैसे सजावटी तत्वों के साथ अपने टैरेस गार्डन के सौंदर्यशास्त्र को बढ़ाएं। ये आपके स्थान में आकर्षण और व्यक्तिगत स्पर्श जोड़ सकते हैं।


नियमित रखरखाव: कीटों या बीमारियों के लिए नियमित रूप से अपने पौधों का निरीक्षण करें और उचित उपाय करें। पौधों का आकार बनाए रखने और स्वस्थ विकास को बढ़ावा देने के लिए आवश्यकतानुसार उनकी काट-छाँट करें। यह सुनिश्चित करने के लिए कि आपका बगीचा फलता-फूलता रहे, पानी देने, खाद देने और निराई-गुड़ाई के कार्यों में शीर्ष पर रहें।प्रूनिंग और निराई के टूल.


याद रखें, प्रत्येक टैरेस गार्डन अद्वितीय है, और इन विचारों को अपनी विशिष्ट जगह और प्राथमिकताओं के अनुरूप बनाना महत्वपूर्ण है। शुभ बागवानी!


National vegetable of India|भारत की राष्ट्रीय सब्जी|

 भारत की राष्ट्रीय सब्जी कद्दू है। 1 अप्रैल 2021 को इसे भारत की राष्ट्रीय सब्जी घोषित किया गया था। कद्दू भारत में सांस्कृतिक महत्व रखता है और देश भर में विभिन्न क्षेत्रीय व्यंजनों में व्यापक रूप से उपयोग किया जाता है।पके हुए कद्दू को लम्बे समय के लिए स्टोर किया जा सकता है। यहाँ कद्दू से हमारा अभिप्राय है कुम्हड़ा,काशीफल,pumpkin,क़दीमा।लौकी (bottle gourd) को भी कद्दू कहा जाता है किन्तु इसे नेशनल वेजिटेबल का दर्जा नहीं मिला है। 



कद्दू उगाने के लिए, इन सामान्य चरणों का पालन करें:


सही किस्म चुनें: कद्दू की कई किस्में उपलब्ध हैं, इसलिए अपनी जलवायु और बढ़ती परिस्थितियों के अनुकूल एक का चयन करें। सामान्य किस्मों में कनेक्टिकट फील्ड, शुगर पाई और जैक ओ'लैंटर्न शामिल हैं।


मिट्टी तैयार करें: कद्दू अच्छे जल निकास वाली, उपजाऊ मिट्टी में पनपते हैं। सुनिश्चित करें कि खाद या अच्छी तरह से सड़ी हुई खाद डालकर मिट्टी कार्बनिक पदार्थों से समृद्ध है। पीएच स्तर 6.0 और 7.5 के बीच होना चाहिए।


बीज बोएं: आखिरी ठंढ की तारीख के बाद कद्दू के बीज सीधे बगीचे में लगाएं जब मिट्टी गर्म हो जाए. लगभग 2-3 फीट की दूरी पर टीले या पहाड़ियाँ बनाएँ, क्योंकि कद्दू को फैलने के लिए पर्याप्त जगह की आवश्यकता होती है। प्रति टीले में 3-4 बीज लगाएं, लगभग 1 इंच गहरा।



उचित देखभाल प्रदान करें: मिट्टी को लगातार नम रखें, लेकिन अधिक पानी देने से बचें, क्योंकि इससे जड़ सड़ सकती है। एक बार अंकुर उभरने के बाद, उन्हें पतला कर दें, जिससे प्रति टीला सबसे मजबूत पौधा निकल जाए। पौधों के चारों ओर मल्चिंग करने से नमी बनाए रखने और खरपतवारों को नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है।


समर्थन प्रदान करें (वैकल्पिक): यदि आप कद्दू की बड़ी किस्में उगा रहे हैं या उन्हें कीटों और बीमारियों से बचाना चाहते हैं, तो आप जमीन से फलों को उठाने के लिए जाली या समर्थन का उपयोग कर सकते हैं।


कीटों और बीमारियों की निगरानी करें: आम कद्दू कीटों जैसे स्क्वैश बग और ककड़ी बीटल के लिए देखें। यदि आवश्यक हो तो जैविक कीट नियंत्रण विधियों को लागू करें। इसके अतिरिक्त, अच्छा वायु संचार प्रदान करके और पानी देते समय पत्तियों को गीला होने से बचाकर फफूंद जनित रोगों को रोकें।


परागण: कद्दू को फल विकसित करने के लिए परागण की आवश्यकता होती है। मधुमक्खियाँ और अन्य परागणकर्ता आमतौर पर इसका ध्यान रखते हैं, लेकिन अगर आपके क्षेत्र में परागणकों की कमी है, तो आप एक छोटे ब्रश या कपास झाड़ू का उपयोग करके फूलों को हाथ से परागित कर सकते हैं।


कटाई: किस्म के आधार पर कद्दू को परिपक्व होने में लगभग 75-120 दिन लगते हैं। जब त्वचा सख्त हो जाए और वांछित रंग तक पहुंच जाए तो उन्हें काट लें। कुछ इंच के तने को छोड़कर, कद्दू को बेल से काट लें। भंडारण या उपयोग करने से पहले उन्हें लगभग दो सप्ताह तक गर्म, सूखी जगह में ठीक होने दें।


आपके द्वारा चुनी गई कद्दू की किस्म के लिए विशिष्ट आवश्यकताओं की जांच करना याद रखें, क्योंकि उनकी बढ़ती परिस्थितियों में मामूली बदलाव हो सकते हैं।

Zucchini और कद्दू दोनों कुकुर्बिटेसी परिवार के सदस्य हैं और एक ही जीनस, कुकुर्बिता से संबंधित हैं। जबकि वे कुछ समानताएँ साझा करते हैं, तोरी(Zucchini) और कद्दू के बीच कई अंतर हैं:


सूरत: तोरी आमतौर पर कद्दू से छोटी और पतली होती है। तोरी की त्वचा चिकनी, गहरे हरे रंग की होती है, जबकि कद्दू के विभिन्न रंग और आकार हो सकते हैं, छोटे से लेकर बड़े तक।


बनावट और स्वाद: ज़ूकिनी में एक कोमल, हल्का स्वाद होता है जिसमें थोड़ा मीठा और अखरोट जैसा स्वाद होता है। इसमें एक नरम, नम मांस है। दूसरी ओर, कद्दू में सख्त और सघन गूदा होता है। कद्दू का स्वाद आम तौर पर मीठा और अधिक मिट्टी वाला होता है, खासकर जब पकाया जाता है।


पाक संबंधी उपयोग: तोरी बहुपयोगी है और आमतौर पर स्वादिष्ट व्यंजनों जैसे स्टिर-फ्राइज़, सौते, सलाद और ब्रेड या मफिन में एक घटक के रूप में उपयोग की जाती है। इसे अक्सर तब खाया जाता है जब यह अपरिपक्व होता है और त्वचा अभी भी कोमल होती है। दूसरी ओर, कद्दू का उपयोग अक्सर मीठे और नमकीन दोनों तरह के व्यंजनों में किया जाता है, जैसे कि कद्दू पाई, सूप, करी और भुनी हुई सब्जी मेडले। कद्दू आमतौर पर पूरी तरह से परिपक्व होने और मांस के सख्त होने पर काटा जाता है।


पोषण संबंधी प्रोफाइल: तोरी और कद्दू में समान पोषण संबंधी प्रोफाइल होते हैं, लेकिन विशिष्ट किस्म के आधार पर कुछ भिन्नताएं हो सकती हैं। दोनों कैलोरी और वसा में कम हैं, और वे आहार फाइबर, विटामिन ए और सी, और पोटेशियम और मैग्नीशियम जैसे खनिजों के अच्छे स्रोत हैं।


कटाई का समय: तोरी की कटाई आमतौर पर तब की जाती है जब यह युवा और कोमल होती है, आमतौर पर लगभग 6-8 इंच लंबी होती है। तोरी को बहुत बड़ा होने और उसका स्वाद खोने से बचाने के लिए उसे नियमित रूप से काटना महत्वपूर्ण है। दूसरी ओर, कद्दू की कटाई तब की जाती है जब वे पूर्ण परिपक्वता तक पहुँच जाते हैं, जिसमें रोपण के बाद कई महीने लग सकते हैं।


जबकि तोरी और कद्दू की अपनी विशिष्ट विशेषताएं हैं, उन्हें कुछ व्यंजनों में एक दूसरे के स्थान पर इस्तेमाल किया जा सकता है। हालांकि, यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि दोनों के बीच बनावट और स्वाद के अंतर पकवान के अंतिम परिणाम को प्रभावित कर सकते हैं।



घर पर बीयर बनाने का इजी तरीका

 घर पर बीयर बनाना एक मजेदार और फायदेमंद शौक हो सकता है। आरंभ करने के लिए यहां एक बुनियादी मार्गदर्शिका दी गई है:



उपकरण और सामग्री:


एक शराब बनाने की किट (या एक बड़े बर्तन, किण्वन पोत, एयरलॉक, और कैप के साथ बोतलें / डिब्बे जैसे उपकरण के अलग-अलग टुकड़े)

माल्टेड जौ (या अन्य अनाज)

हॉप्स (स्वाद और कड़वाहट के लिए)

खमीर (शराब को शराब में किण्वित करने के लिए)

पानी


स्टेप्स :


  1. अपने सभी उपकरणों को साफ करें, जिसमें आपकी ब्रूइंग किट, किण्वन पात्र , बोतलें/डिब्बे और बीयर के संपर्क में आने वाले सभी बर्तन शामिल हैं। यह संदूषण को रोकने में मदद करेगा और यह सुनिश्चित करेगा कि आपकी बीयर पीने के लिए सुरक्षित है।


  1. एक बड़े बर्तन में लगभग 3 गैलन पानी गरम करें। जब यह लगभग 155-165°F (68-74°C) के तापमान तक पहुँच जाए, तो अपने कुचले हुए माल्टेड जौ (या अन्य अनाज) को पानी में डालें। इस प्रक्रिया को मैशिंग कहा जाता है और यह अनाज से चीनी निकालने में मदद करता है।


  1. लगभग एक घंटे के बाद, अनाज को बर्तन से हटा दें, तरल (जिसे अब वोर्ट कहा जाता है) को पीछे छोड़ दें। स्वाद और कड़वाहट के लिए वोर्ट में हॉप्स मिलाएं । हॉप्स की मात्रा और समय आपके द्वारा बनाई जा रही बीयर के प्रकार पर निर्भर करेगा।


  1. एक बार हॉप्स जुड़ जाने के बाद, लगभग एक घंटे के लिए वोर्ट को उबालें। यह इसे जीवाणुरहित करने और वांछित स्वाद बनाने में मदद करेगा।


  1. एक घंटा बीत जाने के बाद, बर्फ के स्नान या अन्य शीतलन विधि का उपयोग करके जितनी जल्दी हो सके वोर्ट( किण्वन से पहले ग्राउंड माल्ट या अन्य अनाज का मीठा आसव),को ठंडा करें। एक बार जब यह लगभग 70°F (21°C) के तापमान तक पहुँच जाता है, तो इसे एक कीटाणुरहित किण्वन बर्तन में स्थानांतरित करें।


  1. किण्वन पात्र  में खमीर मिलाएं और संदूषण को रोकने के दौरान गैसों को बाहर निकलने की अनुमति देने के लिए इसे एक एयरलॉक के साथ कवर करें। इसे लगभग एक हफ्ते तक या जब तक यीस्ट में बुलबुले बनना बंद न हो जाए, तब तक फरमेंट होने दें।


  1. एक बार जब बीयर का किण्वन समाप्त हो जाए, तो उसे स्वच्छ बोतलों या ढक्कन वाले डिब्बे में स्थानांतरित करें। बीयर को प्राकृतिक रूप से कार्बोनेट करने में मदद करने के लिए प्रत्येक बोतल/कैन में थोड़ी मात्रा में चीनी मिलाएं। बोतलों/डिब्बों को सील कर दें और उन्हें लगभग एक सप्ताह के लिए कमरे के तापमान पर रहने दें।


  1. एक हफ्ते के बाद, कार्बोनेशन प्रक्रिया को रोकने और आनंद लेने के लिए बियर को ठंडा करें!


ध्यान रखें कि बीयर बनाने की प्रक्रिया इस मूल गाइड की तुलना में अधिक जटिल हो सकती है, और कई विविधताएं और तकनीकें हैं जिनका उपयोग आप बियर के विभिन्न स्वादों और शैलियों को बनाने के लिए कर सकते हैं। कुछ अतिरिक्त शोध करना एक अच्छा विचार है और संभवतः अपना पहला बैच शुरू करने से पहले अनुभवी होमब्रेवर से सलाह लें।

हॉप्स क्या है ?


साधारण हॉप (common hops) '​कैनाबेसीए' (Cannabaceae) जीववैज्ञानिक कुल के (ह्युमुलस) वंश की एक जाति है। इसके मादा और नर पौधे अलग होते हैं और मादा पौधे के शंकुनुमा फूलों का प्रयोग बियर बनाने में किया जाता है, जिसे वह स्वाद और ख़ुशबू प्रदान करते हैं, हालांकि इनसे कुछ कड़वाहट भी आ जाती है। इन फूलों का सार कीटाणु-नाशक भी होता है और उस से पेयों को संरक्षित भी किया जाता है। यह विश्व के समशीतोष्ण इलाक़ों में लता के रूप में उगता है और भारत में यह हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में उगाया जाता है। बियर बनाने के लिए मादा पौधों को नर पौधों से दूर रखा जाता है क्योंकि बीज बनने से मादा फूलों का स्वाद बदल जाता है। पारंपरिक रूप से इस पौधा का प्रयोग औषधियों में भी किया जाता है

एक यूएस गैलन 3.785411784 लीटर के बराबर है।

घर पर प्रीमियम क्वालिटी वाइन बनाने का तरीका

 घर पर वाइन बनाना एक मजेदार और पुरसुकून शौक हो सकता है।मगर इसका सही तरीका और जरूरी सामग्री कहाँ से पाएं यह एक बड़ी समस्या है।इसका सटीक समाधान हम इस आलेख में लेकर आये हैं। यहाँ घर पर वाइन बनाने के सामान्य चरण दिए गए हैं:



सामग्री की जरूरत:


फल (अंगूर, जामुन, सेब, आदि)

ख़मीर

चीनी

पानी

एक बड़ा कंटेनर (जैसे कि कारबॉय या बाल्टी)

एयरलॉक और स्टॉपर

साइफन ट्यूबिंग

बोतलें 


स्टेप्स :


  • वह फल चुनें जिसे आप अपनी वाइन के लिए इस्तेमाल करना चाहते हैं। सुनिश्चित करें कि यह पका हुआ और अच्छी गुणवत्ता का है।

  • फलों को क्रश करके कंटेनर में डाल दें। फलों को ढकने के लिए पर्याप्त पानी डालें।

  • मिश्रण में चीनी डालें। आपके द्वारा डाली जाने वाली चीनी की मात्रा आपके द्वारा उपयोग किए जा रहे फल और आपकी व्यक्तिगत पसंद पर निर्भर करेगी। आम तौर पर, आप जो शराब बना रहे हैं उसके प्रत्येक गैलन के लिए आपको लगभग 1-2 पाउंड चीनी की आवश्यकता होगी।

  • मिश्रण में खमीर डालें। खमीर चीनी को किण्वित करेगा और इसे शराब में बदल देगा। कितना उपयोग करना है, इसके लिए यीस्ट पैकेट पर दिए गए निर्देशों का पालन करें।

  • कंटेनर को एयरलॉक और स्टॉपर से ढक दें। यह गैसों को किण्वन के दौरान बाहर निकलने की अनुमति देगा लेकिन ऑक्सीजन को अंदर जाने से रोकेगा।(फर्मेंटेशन के दौरान इस मिश्रण से ऑक्सीजन के संपर्क का परिणाम अल्कोहल के बजाय एसिटिक एसिड के रूप में प्राप्त होगा )

  • नुस्खा और उपयोग किए गए फलों के प्रकार के आधार पर मिश्रण को कई दिनों से लेकर कई हफ्तों तक किण्वन के लिए छोड़ दें। इस समय के दौरान खमीर चीनी का सेवन करेगा और शराब का उत्पादन करेगा।

  • एक बार किण्वन पूरा हो जाने पर, शराब को बोतलों में स्थानांतरित करने के लिए साइफन टयूबिंग का उपयोग करें। विस्तार के लिए और बोतलों को टूटने से बचाने के लिए बोतल के शीर्ष पर कुछ जगह छोड़ना सुनिश्चित करें।

  • बोतलों में कॉर्क लगाएं और उन्हें कई महीनों के लिए एक ठंडी, अंधेरी जगह में स्टोर करें ताकि फ्लेवर विकसित हो सकें।

नोट:(1) संदूषण और खराब होने से बचाने के लिए घर पर वाइन बनाते समय उचित स्वच्छता मापदंडों का पालन करना महत्वपूर्ण है।

(2 )20 लीटर जूस के लिए 5 ग्राम ब्रेवर यीस्ट का प्रयोग करें

(3) एक्टिवेट करने के लिए एक स्टेरलाइज्ड कप में आधा कप गुनगुना पानी लें, इसमें एक चम्मच चीनी और यीस्ट मिलाएं। 30 मिनट के लिए अंधेरी जगह पर रखें।


आप कई होमब्रूइंग सप्लाई स्टोर्स या ऑनलाइन रिटेलर्स पर एयरलॉक और स्टॉपर्स पा सकते हैं। वे अपेक्षाकृत सस्ते हैं और विभिन्न कंटेनरों में फिट होने के लिए विभिन्न आकारों में आते हैं। कुछ सामान्य प्रकार के एयरलॉक में S-आकार के एयरलॉक और थ्री-पीस एयरलॉक शामिल हैं।


एयरलॉक और स्टॉपर्स खरीदते समय, यह जांचना सुनिश्चित करें कि वे आपके कंटेनर के आकार के अनुकूल हैं। कुछ एयरलॉक और स्टॉपर्स विशिष्ट आकार के कंटेनरों के लिए डिज़ाइन किए गए हैं, जबकि अन्य विभिन्न आकारों में फिट होने के लिए समायोज्य हो सकते हैं। कुछ अतिरिक्त एयरलॉक और स्टॉपर खरीदना भी एक अच्छा विचार है, ताकि भविष्य में आपको उनकी आवश्यकता हो।



मिर्च की खेती कैसे करे

   रेड चिल्ली यानी लाल मिर्च सबसे प्रमुख मसाला है। भारतीय मसालों में यह सबसे प्रमुख है। इसका उपयोग खाने को स्वादिष्ट और चटपटा बनाने के लिए भारत ही नहीं विभिन्न देशों में किया जाता है। इसका उत्पादन भारत के अनेक राज्यों में होता है जिनमें आंध्र प्रदेश और तेलंगाना सबसे  प्रमुख हैं। देश के कुल उत्पादन का 57% मिर्च अकेले आंध्र प्रदेश से आता है। अन्य उत्पादक राज्य कर्नाटक,मध्य प्रदेश,पश्चिम बंगाल गुजरात और उत्तर प्रदेश  हैं। वैसे कमोवेश लगभग पूरे भारत में इसे  उगाते हैं। सूखी लाल मिर्च के अतिरिक्त ताजी हरी मिर्च भी उपयोग में लाई जाती है। आंध्र प्रदेश के गुंटूर जिले की ख्याति मिर्च उत्पादन के लिए सबसे अधिक है। 


 

 मिर्च की खेती कैसे करें : 

वैसे तो मिर्च सालों भर मिलती है हरी मिर्च हो या फिर सूखी लाल मिर्च । वर्ष में 3 बार मिर्च की रोपाई होती है किंतु सभी क्षेत्रों में ऐसा नहीं होता है। हल्की दोमट और बलुई मिट्टी इसकी खेती के लिए बहुत उपयुक्त मानी जाती है। ध्यान रहे इसकी खेती के लिए ऐसी  जमीन का चयन करें जिसमें जलजमाव बिल्कुल ना होता हो। जलजमाव की स्थिति में पत्तियां पीली होकर फसल सूख जाती है। 


कब-कब  करें रोपाई 

आमतौर पर मुख्य फसल के रूप में मिर्च की नर्सरी जुलाई से अगस्त तक लगाई जाती है और खेतों में पौधों को अगस्त से सितंबर के बीच  लगाते हैं। जबकि गरमा फसल की नर्सरी जनवरी से फरवरी तक लगाते हैं और नर्सरी से पौधों को उखाड़ कर खेत में फरवरी से मार्च के पहले हफ्ते तक लगाते हैं। 


पौधशाला की तैयारी : मिट्टी को खूब भुरभुरी कर खरपतवार के अवशेष और  मोथा की जड़े यथासंभव निकाल  ले। अच्छी तरह सड़ी हुई गोबर की कंपोस्ट खाल मिट्टी में मिलाएं और 10 सेमी ऊंची 30  सेमी चौड़ी क्यारियां बनाएं और इसमें  फंगीसाइड थीरम (Therum) या कैप्टान से उपचारित बीज  डालें। 


उन्नत बीज  और उसकी मात्रा : एक हेक्टेयर खेती के लिए 1 किलोग्राम बीज सामान्यता पर्याप्त होता है किंतु अंकुरण एवं  प्रभावित करने वाले बाह्य कारकों के संभावित प्रभाव को देखते हुए सवा किलो बीज की अनुशंसा की जाती है। सामान्यतः इसकी निम्नांकित प्रजातियां  प्रचलित है : -  सबौर अंगार,पूसा ज्वाला,कल्याणपुर लाल, पंत-1, भाग्यलक्ष्मी, आंध्र ज्योति, किरण, अपर्णा, एनपी- 46 ए, आरसीएच-1, मथानिया लॉन्ग, चाइना। उत्तर बिहार में सबसे अधिक लाल मिर्च के उत्पादन के लिए चाइना प्रजाति का उपयोग किया जा रहा है। 


खेत की तैयारी : 200 क्विंटल कंपोस्ट प्रति हेक्टेयर की दर से खेत में समान रूप से फैलाकर  जोताई  करें। दो तीन बार जोत कर मिट्टी को नरम और भुरभुरी बना ले। अंतिम जुताई के पहले अनुशंसित मात्रा में रासायनिक उर्वरक भी डाल दें।


उर्वरक : सिंगल सुपर फास्फेट 3 क्विंटल प्रति हेक्टेयर,  म्यूरेट ऑफ पोटाश( MoP) 1 क्विंटल प्रति हेक्टेयर और यूरिया 3 क्विंटल  प्रति हेक्टेयर। इसमें से  फास्फेट और पोटाश  की पूरी मात्रा और यूरिया की एक तिहाई मात्रा अंतिम जुताई के दौरान डालें  । शेष यूरिया 25 दिनों के अंतराल पर दो बार मेंआधा-आधा उपयोग में लाएंगे।

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खेत में पौधारोपण:  सामान्यतः नर्सरी में पौधे 25 दिन से 1 महीने के बीच रोपण करने लायक तैयार हो जाते हैं।रोपण के लिए पौधों को  उखाड़ने के समय ध्यान दें की जड़े न टूटे। पौधों की जड़ों को मोनोक्रोटोफॉस 36 एसएल के एक मिली प्रति 1 लीटर पानी में  सलूशन बनाकर  उपचारित करें।अब इन्हें कतार से कतार 45  सेंटीमीटर और पौधे से पौधे की दूरी 30 सेंटीमीटर रखते हुए खेत में लगाएं। कतार सीधी रखने के लिए रस्सी का उपयोग कर सकते हैं। रोपण के बाद प्रत्येक पौधे के  पास हल्की सिंचाई करें ताकि जड़ों और मिट्टी के बीच सीधा संपर्क बन सके और पौधे  मृत होने से बचे।2 दिन बाद  फिर से हल्की सिंचाई करें।



सामान्य देखभाल :  प्लांटेशन के 10 दिन बाद खुरपी से प्रत्येक पौधे के आसपास मिट्टी भुरभुरी करें और यदि खरपतवार उग रहे हो तो उन्हें निकाल दें। और 25  दिन बाद सामान्य सिंचाई करें तथा बची हुई यूरिया में से आधी मात्रा पूरे खेत में समान रूप से डाल दें। सिंचाई के समय दानेदार दवा  थाईमेट 10 जी 500 ग्राम प्रति कट्ठा डाल दें उससे पौधों में बहुत सारे कीड़े और फफूंद नहीं लगेंगे।ध्यान दें की वायरस से फैलने वाला पत्र संकोचन रोग न फैले अन्यथा फसल की उत्पादकता बाधित हो जाएगी। जैसे ही किसी पौधे पर  करली लीफ अथवा पत्र संकोचन रोग के लक्षण देखें उसे सावधानीपूर्वक उखाड़ कर जलाकर नष्ट कर दें । क्योंकि वायरस रोग को कीड़े मकोड़े फैलाते हैं अतः प्रिकॉशन के तौर पर Dimethoate 30EC 1 ml प्रति लीटर पानी में  मिलाकर छिड़काव करें। 30 से 40 दिन में फूल आने लगते हैं और उत्पादन आरंभ हो जाता है।


फल और  उसका संग्रहण : यदि आपको हरी मिर्च का उत्पादन करना है तो बाजार की मांग के अनुसार पकने से पहले किंतु पूरी तरह विकसित मिर्ची को तोड़कर बेच सकते हैं। यद्यपि हरी मिर्च का मूल्य सूखी मिर्च के मुकाबले  बहुत कम होता है किंतु  वजन कई गुना अधिक होता है। इससे कुल फसल अवधि में अधिक से अधिक बार फलन प्राप्त कर सकते हैं और उत्पादकता बढ़ा सकते हैं। किंतु यदि स्थानीय रूप से हरी मिर्च का भाव और मांग कम हो तो मिर्च को लाल होने के बाद तोड़े और अच्छी तरह  सुखा कर वायु  अवरुद्ध बोरियों में संग्रहित करें।


उत्पादन : सामान्यतः 15 से 20 क्विंटल प्रति हेक्टेयर सुखी लाल मिर्च का उत्पादन होता है। किंतु केवल हरी मिर्च का उत्पादन करें तो यह मात्रा 200 से 250 क्विंटल प्रति हेक्टर हो जाती है। 


उत्पादन लागत : कंपोस्ट 200 क्विंटल का मूल्य ₹15000/-, उर्वरक एवं कीटनाशक 11,000/-, जोताई ₹15000/-, लेबर कंपोनेंट ₹15000/-, सिंचाई 10,000/- बीज 20 से 25000/- अर्थात 1 हेक्टेयर मिर्च की खेती में कुल लागत ₹90000/- आने की संभावना है। स्थानीय बाजार अथवा आपके द्वारा चुने गए  ब्रांड के अनुरूप लागत में परिवर्तन हो सकता है।


आउटपुट : न्यूनतम उत्पादन 15 क्विंटल प्रति हेक्टेयर  ले तो ₹150/- प्रति किलोग्राम के हिसाब से  उत्पादन का कुल मूल्य 225000/- आता है। इस प्रकार लागत के मुकाबले 150% का मुनाफा प्राप्त होता है। 5 महीने में 90000 इन्वेस्ट कर 135000/- का मुनाफा वह भी खेती से मजाक नहीं है। किसान भाई और युवा वर्ग इस खेती में सन्निहित अपार संभावनाओं के द्वार अपनी मेहनत और  व्यवसायिक सोच के सहारे आसानी से  खोल सकते हैं।


पालक घर पर उगाए

पालक एक पत्तेदार सब्जी है जिसे गमलों, बगीचों, बालकनियों, पिछवाड़े और छतों पर उगाया जा सकता है। यह एक बहुपयोगी सब्जी है जिसे सलाद में कच्चा भी परोसा जा सकता है या साइड डिश के रूप में पकाया जा सकता है।पालक-पनीर की लोकप्रियता से तो सभी वाकिफ हैं।



कहाँ उगायें? : गमला

- गमले: पालक अच्छी जल निकासी वाले गमलों और बर्तनों में अच्छी तरह से उगता है जिससे उसमें पानी का जमाव नहीं होता है। पालक लगाने का सबसे अच्छा समय पतझड़ या सर्दियों के महीनों में होता है जब मौसम बहुत गर्म नहीं होता है।

बीज कहाँ से लें?

स्थानीय बीज दुकान जो विश्वसनीय हों अथवा ऑनलाइन मर्चेंट से ले सकते हैं।यहाँ लें

उपयुक्त स्थान 

- गार्डन: पालक को बगीचों की सीमाओं पर अच्छी तरह से लगाया जाता है जहां सूरज की रोशनी और इसके बढ़ने के लिए जगह होती है। इसे काफी गहराई तक लगाने की जरूरत है ताकि इसके आसपास के अन्य पौधों द्वारा परेशान किए बिना इसके बढ़ने के लिए जगह हो।

- बालकनी: अगर आपके घर में जगह सीमित है तो पालक उगाने के लिए बालकनी एक बेहतरीन जगह है क्योंकि आमतौर पर ये काफी छोटी होती हैं। आपको अच्छी धूप प्रदान करने की आवश्यकता है और सुनिश्चित करें कि पौधों को फैलने और ठीक से बढ़ने के लिए पर्याप्त जगह है ताकि वे न हों

घर पर पालक उगाना मुश्किल नहीं है। आपको बस एक बर्तन, थोड़ी मिट्टी और थोड़ा पानी चाहिए।

स्टेप्स:

1) बर्तन को खाद मिट्टी और कोकोपिट से भरें और सुनिश्चित करें कि उसके बीच में एक जल निकासी छेद हो।

2) बीजों को गमले के अंदर डालें, उन्हें मिट्टी और पानी से अच्छी तरह ढक दें।

3) गमले को धूप वाली जगह पर या अपनी बालकनी या छत के ऊपर रखें

4) जैसे ही पालक बढ़ने लगे, इसे स्वस्थ रखने के लिए हर कुछ हफ्तों में खाद डालें और सिंचाई करें।

घर पर पालक उगाने का सबसे आसान तरीका है गमलों में।

पालक को गमलों में उगाने की सबसे अच्छी बात यह है कि आप इसे कहीं भी रख सकते हैं, यहां तक कि बालकनी या पिछवाड़े में भी। और तो और, अगर आपको पौधों को अपने किचन गार्डन में और अपने घर से दूर ले जाने की आवश्यकता है, तो यह काफी आसान काम भी होगा।

सबसे पहले, एक बर्तन चुनें और इसे मिट्टी से भर दें (जैविक खाद का उपयोग करना सबसे अच्छा है)। आकार की बात करें तो पालक के बीज के लिए 10-15 सेमी गहरा बर्तन ठीक रहेगा। बीजों को लगभग 5-6 सेंटीमीटर की दूरी पर रोपें क्योंकि इससे उन्हें अंकुरित होने पर बढ़ने के लिए जगह मिलेगी और फिर भी उनकी पत्तियों को फैलने के लिए पर्याप्त जगह मिल जाएगी। इस बात का ध्यान रखें कि उन्हें कितने पानी की जरूरत है और वाष्पित होने पर और मिलाते रहें।

 अगर आप ताजा पालक की अपनी फसल उगाना चाहते हैं, तो प्रक्रिया शुरू करने से पहले आपको कुछ चीजें जाननी होंगी।

पहली चीज़ जिसकी आपको आवश्यकता होगी वह है पालक उगाने के लिए एक कंटेनर। यह या तो एक बर्तन या मिट्टी के साथ एक उठा हुआ बिस्तर हो सकता है। आपको अपने कंटेनर में मिट्टी डालनी चाहिए और उसके कंटेनर के नीचे एक समान परत बनाने के लिए प्रतीक्षा करनी चाहिए। फिर आपको मिट्टी की परत के ऊपर कुछ खाद डालनी चाहिए और इसे तब तक मिलाना चाहिए जब तक कि यह आपके कंटेनर या उठी हुई क्यारी की सतह पर समान रूप से वितरित न हो जाए- यह आपके पौधों को बढ़ने के साथ पोषक तत्व प्रदान करेगा।

अंत में, आपको अपने बीजों को खाद की परत के ऊपर एक दूसरे से लगभग 2 इंच की दूरी पर छोटी पंक्तियों में लगाना होगा- सुनिश्चित करें कि प्रति वर्ग फुट में 3 से अधिक पंक्तियाँ नहीं हैं, ताकि यह एक दूसरे से अधिक न हो और उनका दम घुटो!

घर में सब्जियां उगाना एक संतुष्टिदायक अनुभव हो सकता है। लेकिन आपको इसके साथ आने वाली चुनौतियों के लिए तैयार रहने की जरूरत है। तो, आप अपना पालक कैसे उगाएंगे?

घर पर सब्जियां उगाने के दो विकल्प हैं: गमले में लगाना या सीधे मिट्टी में लगाना। सबसे अच्छा विकल्प आपकी जीवनशैली और आपके पास किस प्रकार की जगह उपलब्ध है, इस पर निर्भर करता है।

पालक उगाना अपेक्षाकृत आसान और सीधा है, लेकिन घर पर इसकी खेती करते समय कुछ बातों का ध्यान रखना चाहिए। पालक आमतौर पर बर्तनों में उगाए जाते हैं क्योंकि उन्हें बनाए रखना और इधर-उधर ले जाना आसान होता है।

पालक उगाना आसान है, आपको केवल यह जानने की जरूरत है कि क्या आवश्यकताएं हैं। इसका स्वाद मीठा, अखरोट जैसा होता है। इसे सलाद में, या टैकोस या सैंडविच के हिस्से के रूप में सबसे अच्छा खाया जाता है। आप इसे कुछ क्रंच के लिए सूप या चावल के व्यंजन में भी डाल सकते हैं।

घर पर सब्जियाँ उगाना कई तरीकों से और घर के आसपास कई सतहों पर किया जा सकता है जैसे बालकनी पर, आपकी डेस्क पर, कंटेनरों में या आपकी छत पर भी। आप अपने पौधों से क्या चाहते हैं इस पर निर्भर करता है कि आप उन्हें किस तरह से उगाना चाहते हैं!

पालक उगाने के लिए कुछ अच्छी जगहों में आपका किचन गार्डन शामिल है जहाँ उन्हें बहुत सारी रोशनी मिलेगी और साथ ही खाना पकाने के लिए पर्याप्त जगह होगी! पालक के लिए बालकनी भी सही है क्योंकि इसे सुबह की धूप और दोपहर की धूप मिलती है लेकिन हो सकता है कि शाम की धूप ज्यादा न मिले इसलिए इन्हें यहां लगाते समय इस बात का ध्यान रखें!

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